भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

२३४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

पातञ्जलमहाभाष्यचरकप्रतिसंस्कृतैः । मनोवाक्कायदोषणां हन्त्रेऽहिपतये नमः ।।

चक्रपाणि के इस लेख द्वारा भी चरक ही पतञ्जलि है यह सिद्ध करना कोई शब्दयोजना के अनुकूल नहीं हैं। यहां पर यदि चरक पद उस नाम के व्यक्ति के लिये आया हो तो ‘चरकायाहिपतये’ कहना चाहिये था। चरक शब्द का प्रतिसंस्कृत पद के साथ आना उपयुक्त नहीं है क्योंकि ‘नामैकदेशे नामग्रहणम्’ अर्थात् नाम के एक अंश से सम्पूर्ण नाम का ग्रहण हो जाता है—इसके अनुसार चरक शब्द से यदि चरकसंहिता का ग्रहण किया जाय तो प्रतिसंस्कृत पद के साथ अन्वय हो सकता है। इससे चरक नाम से पूर्वप्रसिद्ध किसी ग्रन्थ विशेष का प्रतिसंस्कर्ता पतञ्जलि है यह प्रतीत होता है न कि चरक ही पतञ्जलि है।

अब हमें देखना है कि ‘इति चरके पतञ्जलिः’¹ नागेशः-चार्य की इस उक्ति का क्या आशय हो सकता है ? ‘चरकसंहिता ग्रन्थ में पतञ्जलि का यह वचन हैं’ यदि ऐसा अर्थ हो तो इस उद्धृत वचन को ‘चरक सहिता’ में मिलना चाहिये परन्तु इस उद्धृत वाक्य का चरक संहिता में न होना इस आशय के विपरीत है। चरकसंहिता के सूत्र स्थान के ११वें अध्याय तथा विमान स्थान के ४ थे अध्याय में आप्त का निर्वचन इसमें उद्धृत रीति से भिन्न ही रीति से किया है। इस प्रकार चरक पर पतञ्जलि यह अर्थ करके चरक की व्याख्या में पतञ्जलि ने ऐसा कहा यह भी अर्थ हो सकता है। इस प्रकार चरक के व्याख्याकार पतञ्जलि की यह उक्ति है, ऐसा समझना चाहिये। इससे प्रतीत होता है कि चरकसंहिता पर पतञ्जलि की व्याख्या अनुपलब्ध होने पर भी, थी अवश्य। कुछ लोग आजकल यह कहने भी लगे हैं कि पतञ्जलि स्वयं चरक न होकर चरक का व्याख्याकार था। कुछ लोग कहते हैं कि पतञ्जलि चरकसंहिता की मञ्जूषा नामक टीका का करने वाला है क्योंकि आर्यप्रदीप नामक आधुनिक पुस्तक में लिखा है कि चरकसंहिता की पतञ्जलिकृत मञ्जूषा व्याख्या थी। नागेश द्वारा रचित मञ्जूषाख्य व्याकरण ग्रन्थ में पूर्वोल्लिखित—‘इति चरके पतञ्जलिः' यह वाक्य दिया हुआ है। मञ्जूषा नागेश द्वारा बनाया हुआ व्याकरण का ग्रन्थ प्रसिद्ध ही है। पतञ्जलिकृत चरक की मञ्जूषा टीका न कहीं दिखाई देती है और न कहीं सुनने में आती है और न चक्रपाणि आदि टीकाकारों ने इसका निर्देश ही किया है। इस प्रकार अन्य साधनों (पक्ष की युक्तियों) के अभाव में निश्चय न कर सकने से ‘चरकप्रतिसंस्कृतैः’ तथा ‘चरके पतञ्जलिः' आदि अस्पष्ट वाक्यों के आधार पर दोनों को एक सिद्ध नहीं किया जा सकता।

इसके अतिरिक्त जो विषय अथवा देश जिसका विशेष रूप से परिचित एवं अभ्यस्त हो वही अनुप्राणित होकर बार-बार उसके हृदय में आता है। उदाहरण के लिये महाभाष्य में पाटलिपुत्र के अनेक बार उल्लेख होने से महाभाष्यकार का उससे विशेष परिचय तथा उनका निवासस्थान प्रतीत होता है। एक व्यक्ति के नाना विषयों में ग्रन्थ निर्माण करने पर एक ग्रन्थ में दूसरे ग्रन्थ से संबन्धित विषय आने पर अमुक ग्रन्थ में इसका प्रतिपादन किया गया है ऐसा कहना तथा दोनों ग्रन्थों में एक ही आशय के वचन देना ग्रन्थकारों का तरीका है। इस प्रकार अनेक ग्रन्थों के रचयिताओं के कुछ विषय, उक्तियां एवं युक्तियां अत्यन्त प्रिय होने से नाना ग्रन्थों में एक ही रूप में प्रायः मिलती है जैसे कि भामती के कर्त्ता वाचस्पतिमिश्र के अपने ग्रन्थ के प्रारंभ में दी हुई व्यापकविरुद्ध तथा उपलब्धि युक्तियां उसके दूसरे दर्शन के निबन्धों में भी थोड़े बहुत अन्तर से प्रायः मिलती हैं। इसी प्रकार चरकाचार्य एवं महाभाष्यकार पतञ्जलि के एक ही होने पर महाभाष्यगत विषय चरकसंहिता में और चरकसंहिता के विषय महाभाष्य में जगह-जगह क्यों नहीं मिलते जब कि दोनों विचारों का उद्गम एक ही हृदय से हुआ हो। यद्यपि इसमें यह कहा जा सकता है कि अग्निवेश संहिता का चरक केवल प्रतिसंस्कर्ता है इस लिये मूल ग्रन्थ के परवशवर्ती होकर उसने संकोच के साथ अपनी लेखनी को चलाया है और इसी


१. आप्तोपदेश रूप शब्द प्रमाण माना जाता है। अनुभव द्वारा वास्तविक तत्त्व का जिसे पूर्ण निश्चय हो तथा जो राजद्वेषादि के कारण भी कभी इससे विपरीत न कहे उसे आप्त कहते हैं—ऐसा चरक में पतञ्जलि ने कहा। (नागेशमञ्जूषायाम्)