भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद | २३५

लिये महाभाष्यकार के भावों को व्यक्त करने वाली उक्तियां, शब्द तथा अन्य विशेषताएं चरकसंहिता में सन्निहित नहीं की हैं परन्तु महाभाष्य में तो केवल सूत्रों की ही परवशता थी उसमें महाभाष्यकार ने जब स्वच्छन्दतापूर्वक अपनी वाग्धारा, उदाहरण साधनोक्ति एवं लोकोक्तियों द्वारा विज्ञान एवं व्याख्यान में अपने कौशल का प्रदर्शन किया है, तब कई स्थलों पर अवसर प्राप्त होने पर भी चरकाचार्य के भावों से आबद्ध (ओतप्रोत) वैद्यक के विषयों को उसने क्यों नहीं प्रविष्ट किया। जहां कहीं सूत्र के परवश होकर उसे वे विषय आवश्यक रूप से कहने पड़े हैं उनमें वे उसके हृदय के विकास नहीं कहे जा सकते हैं। जैसे केवल वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक शब्दों के उदाहरण देना वैद्यक विद्या का जानना नहीं कहा जा सकता। वहां ‘तस्य निमित्तं संयोगात्पातौ’ (५-१-३८) सूत्र पर निमित्त अर्थ के लिये दिये हुये ‘वातपित्तश्लेष्मभ्यः शमनकोपनयोरुपसंख्यानं कर्तव्यं, सन्निपाताच्चेति वक्तव्यम्’ इन वार्तिकों के परवश होकर ही वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपातिक आदि उदाहरण दिये हैं। इसी प्रकार भाष्यकार ने ‘उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य’ (८-४-६१) सूत्र के ‘उदः पूर्वत्वे स्कन्दे च्छन्दस्युपसंख्यानं रोगे’ इस वार्तिक के उदाहरण में लाचारी में ‘उत्कन्दको रोगः’ दिया है। परन्तु जहां उदाहरण देना ग्रन्थकार की अपनी इच्छा पर हो वहां दिया हुआ उदाहरण ही ग्रन्थकार के अन्तर्गत भावों को प्रकट करता है। भाष्यकार ने ‘ह्वः सम्प्रसारणम्’ इस सूत्र की व्याख्या में ‘अन्तरेणापि निमित्तशब्देन निमित्तार्थोऽवगम्यते’ यह लिखकर ज्वरनिमित्तक ‘दधित्रपुसं¹ प्रत्यक्षो ज्वरः पादरोगनिमित्तक ‘नड्वलोदकं² पादरोगः’ तथा आयुर्निमित्तक ‘आयुर्वे घृतम्’³ ये उदाहरण दिये हैं। यहां पर ‘आयुर्वे घृतम्’ के समान ‘दधित्रपुसं प्रत्यक्षो ज्वरः’ तथा ‘नड्वलोदकं पादरोगः’ भी प्राचीन आचार्यों के वाक्यों के ही उद्धरण प्रतीत होते हैं। अन्य भी निमित्त तथा निमित्ति के अभेद को प्रकट करने वाले बहुत से उदाहरणों के संभव होने पर इन्ही पूर्वोक्त उदाहरणों के देने से महाभाष्यकार का वैद्यक विषय का जानना प्रतीत हो सकता है परन्तु केवल इतने मात्र से उसका चरक होना सिद्ध नहीं होता। यदि इन दोनों की एकता हो तो प्रसङ्गवश व्याकरण के ग्रन्थ में आये हुये इस तरह के विषय अपने वैद्यक ग्रन्थ में उसने क्यों नहीं लिखे हैं। दधित्रपुस का ज्वर के हेतु रूप में तथा नड्वलोदक का पादरोग के हेतुरूप में उल्लेख चरक में क्यों नहीं मिलता, और उत्कन्दक नाम का रोग भावप्रकाश में मिलने पर भी चरक में क्यों नहीं मिलता। महाभाष्यकार ने विशेषरूप से परिचय, निवास एवं प्रेम के कारण जिस पाटलिपुत्र का बार-बार उल्लेख किया है चरकसंहिता में उसका वर्णन एक बार भी क्यों नहीं मिलता। गर्गादिगण में आये हुये वैद्याचार्यों के स्मरण कराने वाले अग्निवेश पराशर, जतूकर्ण आदि शब्दों के उदाहरण देना उचित होने पर भी भाष्यकार ने उनके उदाहरण नहीं दिये। अन्यत्र भी ‘आद्यन्तवदेकस्मिन्’ (१-१-२०) ‘स्वरितात्संहितायामनुदात्तानाम्’ (१-२-३९) ‘समासस्य’ (६-१-२२३) आदि सूत्रों की व्याख्याओं में अग्निवेश का उल्लेख होने पर स्वर का विषय होने से ही भाष्यकार ने अग्निवेश का वैद्याचार्य के रूप में कहीं भी परिचय नहीं दिया है। चरक में दिये हुए अन्य प्राचीन वैद्याचार्यों के महाभाष्यकार ने नाम तक भी नहीं दिये हैं।

ऋतूक्थादि सूत्र (४-२-६०) की व्याख्या में उक्थादिगण में आये हुये आयुर्वेद शब्द के ठक् प्रत्यय के रूप का उसने निर्देश नहीं किया है। वहां ‘विद्यालक्षणेत्यादि’ वार्तिक में विद्या के उदाहरण रूप वायसविधिकः, सार्पविधिकः, आङ्गविद्यः, धर्मविद्यः, त्रैविद्यः, आदि देकर भी स्वयं आचार्यरूप से अधिष्ठित आयुर्वेदविद्या का प्रतिष्ठापूर्वक नाम भी न लेना, ‘रोगाख्यायां ण्वुल् बहुलम्’ (३-३-१०८) सूत्र की व्याख्या में रोगवाचक शब्द का उदाहरण न देना, ‘रोगाच्चापनयने’ (५-४-४९) इस सूत्र में चिकित्सा रूप विशेष अर्थ में काशिका की तरह तसिल् प्रत्यय के ‘प्रवाहिकातः कुरु’ आदि किसी एक का भी वर्णन न होने पर भी भाष्यकार को चरक कहना आश्चर्यकारक ही है।


१. दही और खीरे के एक साथ खाने से प्रत्यक्षरूप से ज्वर हो जाता है। (अनुवादक)
२. ‘नड्वलोदकम्’ जिसमें नड या सरकण्डे अधिक हों ऐसे पानी (ठहरा हुआ जोहड़ का पानी) से पादरोग हो जाते हैं। (अनुवादक)
३. आयुर्धृतं नदी पुण्यं भयं चौरः सुखं प्रिया। वैरं द्यूतं गुरुर्ज्ञानं श्रेयो ब्राह्मणपूजनम् ॥ (अनुवादक)