काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २३६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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'चतुर्थ्यर्थ बहुलं छन्दसि' (२-३-६२) सूत्र के 'षष्ठ्यर्थे चतुर्थी वाच्या' इस वार्तिक के उदाहरण के रूप में दिये हुये तैत्तिरीय¹ वाक्य में रजस्वला के पालन करने योग्य धर्मशास्त्र के नियम दिये हैं उनके पालन न करने पर सन्तान की अनिष्टोत्पत्तिरूप फल होते हैं—ऐसा महाभाष्य में विशेषरूप से दिया है। इसी प्रकार सुश्रुत के शारीरस्थान के द्वितीय अध्याय में भी फलनिर्देश सहित इसी प्रकार के नियम दिये हैं। परन्तु पतञ्जलि से अभेद रूप में संभावित चरकाचार्य ने शारीरजातिसूत्राध्याय में महाभाष्य में विशेषरूप से उल्लिखित विषयों को सामान्यरूप से ही कहा है तथा उसके फल नहीं कहे हैं। पात्रांश (बर्तनों) में भी भेद है। यह भी एक विचारणीय विषय है।
भाष्यकार के अनुसार स्त्यै धातु से घनीभाव अर्थ में स्त्री शब्द बनता है। (स्त्यै ष्ट्यै संघाते) तथा 'सू' धातु से प्रवृत्ति अर्थ में पुंस शब्द बनता है। इसी प्रकार घनीभाव रूप अर्थ को लेकर स्त्री शब्द का व्यवहार होता है। चरक के अनुसार घनीभाव को लेकर पुंस् शब्द का व्यवहार होता है। प्रसव माता का धर्म होने से तथा 'षूङ् प्राणिगर्भविमोचने' इस पाणिनीय धातुपाठ के अनुसार व्यवहार में 'स्त्री सूते' 'माता सूते' आदि प्रयोग ही ठीक है। परन्तु भाष्यकार के अनुसार प्रसव पुरुष का धर्म होने से 'पुमान् सूते' यह प्रयोग ठीक है। 'माता सूते' यह प्रयोग दूसरे अर्थ को प्रकट करने से औपचारिक (लाक्षणिक) जानना चाहिये। इस प्रकार चरक तथा भाष्यकार की प्रक्रिया में भेद है। इन पक्ष-प्रतिपक्ष की युक्तियों के आधार पर मेरी दृष्टि में चरक एवं पतञ्जलि के अभेद की अपेक्षा भेद ही अधिक सिद्ध होता है।
इसके अतिरिक्त चरकसंहिता के शारीर स्थान के १ म अध्याय में पुरुष के वर्णन के प्रसङ्ग में आये हुये योग से पातञ्जल योग के विषय की तुलना करने पर भी यही प्रतीत होता है। शारीरस्थान के प्रथम अध्याय में पूर्वोद्दिष्ट २३ प्रश्नों में से षद्धातुसमवायात्मक (खादयश्चेतनाषष्ठा-६ धातुओं के समवायरूप) अथवा चतुर्विंशतितत्त्वसमवायात्मक (मनोदशेन्द्रियाण्यर्याः । प्रकृतिश्चाष्टधातुकी-२४ तत्त्वों के समवायरूप) वेदना तथा योग के निवर्तन के योग्य कर्मपुरुष (चिकित्साधिष्ठित पुरुष) के विषय में २१ प्रश्नों का समाधान करके सब वेदनाएं जिसकी निवृत्त हो गई हैं ऐसे पुरुष के विषय में 'क्व चैता वेदना सर्वा निवृत्तिं यान्त्यशेषतः' इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् आत्रेय कहते हैं कि—
योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवर्तनम् । मोक्षे निवृत्तिर्निःशेषा योगो मोक्षप्रवर्तकः ।।
अर्थात् अन्तःकरण (मन) के विषय के दुर्योंग (मिथ्यायोग) से उत्पन्न सुख-दुःख से रहित होने की अवस्था का जिसमें उदय हो गया है ऐसे योग का वर्णन है। फिर ५वें अध्याय में अग्निवेश के पूछने पर आत्रेय ने प्रवृत्ति तथा निवृत्ति को पृथक्-पृथक् बांटकर निवृत्त्यात्मक अपवर्ग के लिये पूर्वोक्त सत्सङ्ग ब्रह्मचर्य आदि का साधन के रूप में गद्यवाक्यों में विशेषरूप से वर्णन किया है। इन दोनों पूर्वापर अध्यायों में एक ही विषय भङ्गीभेद से आत्रेय ने ही वर्णन किया है। इस प्रकार प्रतिसंस्कर्ता चरक के रूप में संभावित पतञ्जलि से प्राचीन ही यह लेख मालूम पड़ता है।
सुश्रुत में चिकित्सा शास्त्र में उपयोगी होने से चिकित्सा के अधिकरण पंचमहाभूत एवं आत्मा के समवायरूप कर्म पुरुष (चिकित्साधिष्ठित कर्म पुरुष) की, भेडसंहिता में भी उसी प्रकार के षड्धातु एवं चेतना के समवायरूप तथा इस काश्यपसंहिता में भी 'शरीरेन्द्रियात्मसत्त्वसमुदयरूपं पुरुषमाचक्षते आत्मानमेके' (पृष्ठ ६७) के अनुसार शरीर एवं शरीरी के समवायरूप (कर्मपुरुष) का ही वर्णन है। इन्हीं के अनुसार प्राचीन सिद्धान्त को दृष्टि में रखते हुए भगवान् आत्रेय ने भी उतना ही लिखा होगा और मोक्ष के लिए उपयोगी योग का विषय पीछे से इस प्रकरण में प्रतिसंस्कार करते हुए हुए चरक ने प्रविष्ट कर दिया, यह मानें तो चरक तथा पातञ्जल सूत्र में कही हुई योग की प्रक्रिया समान होनी चाहिये थी परन्तु ऐसा नहीं है। पातञ्जल में— 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' (१-२) 'ता एव सबीजः समाधिः' (१-४५) तस्यापि
१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ५० देखें।