भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

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निरोधेन सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः' (१-५०)¹ इत्यादि सूत्रों द्वारा अन्तःकरण की बहिर्वृत्तियों को रोक कर आत्मस्वरूप एक वृत्ति की स्थापना करना और अन्त में आत्माकार वृत्ति को भी रोक कर निवात दीप की तरह अपने आपको स्थिर कर लेना—इस प्रकार संप्रज्ञात और असम्प्रज्ञात भेद से (सबीज तथा निर्बीज भेद से) दो प्रकार का योग दिया है और इस प्रकार के योग के हो जाने पर ऋतम्भरा प्रज्ञा आदि (ऋतं बिभर्ति इति) फल होते हैं। तथा मोक्ष का स्वरूप निम्न है—'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' (१-३) अर्थात् द्रष्टा का अपने स्वरूप में स्थित हो जाना 'पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपनिष्ठा वा चितिशक्तेः' अर्थात् पुरुषार्थशून्य गुणों का उदय होना और विशुद्ध चिकिशक्ति का अपने रूप में स्थिर रहना ही मोक्ष है—इत्यादि द्वारा आत्मा का किसी के साथ न रहना, अपरिवर्तनशीलता, अपने चित् स्वरूप में रहना, यह चरम सिद्धान्त रूप से वर्णन किया है। इसके विपरीत चरकसंहिता में—

आत्मनेन्द्रियमनोर्थानां सन्निकर्षात् प्रवर्तते । सुखदुःखमनारम्भादात्मस्थे मनसि स्थिरे ।।
निवर्तते तदुभयं वशित्वं चोपजायते । सशरीरस्य योगज्ञास्तं योगमृषयो विदुः ।।

अर्थात् इन्द्रियों और मन को बाहरी विषयों से लौटाकर मन को आत्मा में स्थिर करना योग कहलाता है। और

मोक्षो रजस्तमोऽभावाद्वलवत्कर्मसंक्षयात् । वियोगः कर्मसंयोगैरपुनर्भव उच्यते ।।

अर्थात् जब रजोगुण और तमोगुण समाप्त होकर केवल सत्त्वगुण शेष रहे, बलवान प्राक्तन कर्म क्षीण हो जायें तथा शरीर और अन्तःकरण (मन) के साथ आत्मा का स्थायीरूप से वियोग हो जाये उसे मोक्ष कहा है।

इन दोनों की यदि हम तुलना करें तो हम देखते हैं कि चरक में केवल सत्त्वगुण के शेष रह जाने पर आत्मा में अपने अन्तःकरण की वृत्तियों के स्थिर करने को योग तथा त्रैगुण्यावस्था के संपादन के योग्य शरीर तथा अन्तःकरण के वियोग को मोक्ष कहा है। पतञ्जलि ने तो सबीज समाधि के बाद अन्त में निर्बीज समाधि द्वारा अन्तःकरण की सब वृत्तियों के विलय हो जाने पर उनका फिर उदय न हो उसे योग तथा अन्तःकरण (मन) की वृत्तिरूप सुख दुःख की छाया की समाप्ति होकर आत्मा का कूटस्थ (अपरिवर्तनशील) तथा चित्स्वरूप होने को मोक्ष कहा है। अतः मुख्य प्रतिपाद्य विषयों में भेद दीखता है। इस प्रकार चरकोक्त योग 'आत्मस्थे मनसि स्थिरे, रजस्तमोऽभावात्, शुद्धसत्त्वसमाधानात्' इत्यादि (वाक्यों के आधार पर रजोगुण तथा तमोगुण समाप्त होकर शुद्ध सत्त्वगुण के शेष रहने पर सत्त्वगुण प्रधान मन के आत्मा में स्थिर हो जाने के कारण पतञ्जलि के सम्प्रज्ञात श्रेणी में कहे हुए योग में ही अन्तर्निहित हो जाता है। यदि मन के लय होने का प्रतिपादन किया जाता तो सात्त्विकवृत्ति के भी परिहार से ध्येयमात्र प्रकाशावस्था रूप असम्प्रज्ञात योग का बोध होता। पतञ्जलि का योग सम्प्रज्ञात श्रेणी से भी परे असम्प्रज्ञात श्रेणी में जाकर समाप्त होता है तथा उसी अवस्था में ही इष्ट सिद्धि होती है—इस प्रकार योग की मुख्य श्रेणियों में भेद है।

चरक में

आवेशश्चेतसो ज्ञानमर्थानां छन्दतः क्रिया । इष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिरिष्टतश्चाप्यदर्शनम् ।।
इत्यष्टविधमाख्यातं योगिनां बलमैश्वरम् । शुद्धसत्त्वसमाधानात्तत्सर्वमुपजायते ।।


१. चित्तवृत्ति के निरोध, (Concentration of mind) को योग कहते हैं। उसके दो भेद हैं। सबीज और निर्बीज समाधि। अर्थात् जब वासनाओं का कुछ अंश शेष रह जाय तथा आत्मा की सत्ता विद्यमान रहे तो उसे सबीज-समाधि कहते हैं। उस सबीज समाधि के भी निरोध हो जाने पर सब कुछ निरोध हो जाता है उसे निर्बीज समाधि कहते हैं जिसमें आत्मा का भी पृथक् अस्तित्व न रहे। (अनुवादक)