काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २३८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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(इत्यादि द्वारा ८ (आठ) योग की विभूतियां दी हैं। यथा (१) दूसरे के मन में प्रवेश करना (२) सब विषयों का ज्ञान (३) अपनी इच्छानुसार कार्य करना (४) दिव्य दृष्टि (५) दिव्य श्रोत्र (६) दिव्य स्मृति (७) कान्ति (८) अपने आपको तिरोहित कर सकना)—ये सब आत्मा में मन के स्थिर हो जाने पर ही होती हैं तथा उनको केवल ईश्वरीय शक्तियां ही कहा है। इसके अतिरिक्त पतञ्जलि ने आत्मविषयक योग के ऋतम्भरप्रज्ञा आदि फल कहे हैं। उस योग को सिद्ध करने की अवस्था में अभ्यास को बढ़ाने के लिये त्राटकादि की तरह उन-उन विषयों में किये जाने वाले धारणा, ध्यान तथा समाधि रूप योग के अङ्गभूत संयम का, परचित्तज्ञान, सर्वभूतरुतज्ञान (सब प्राणियों के शब्दों का ज्ञान, पूर्वजातिज्ञान, हस्तिबल भुवनज्ञान, ताराव्यूहज्ञान, कायव्यूहज्ञान आदि बहुत सी सिद्धियों का विभूतिपाद में विभूतियों के रूप में वर्णन किया है। इस प्रकार दोनों में हेतुहेतुमद्भाव (भिन्न-भिन्न कारणों से भिन्न-भिन्न कार्यों का होना) विभिन्न है, प्रक्रिया का भेद है, कहीं-कहीं एक ही विषय में भिन्न-भिन्न पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग है तथा विभूतियों की संख्या भी इसमें ८ नहीं है। उन विभूतियों का भी 'ते समाधावुपसर्गाव्युत्थाने' के अनुसार मुख्य योग के मार्ग में व्याघात होने से वर्णन नहीं किया है।
योग और मोक्ष के साधन के वर्णन में कहा है—
सतामुपासनं सम्यगसतां परिवर्जनम्। ब्रह्मचर्योपवासश्च नियमाश्च पृथग्विधाः ।।
धारणं धर्मशास्त्राणां विज्ञानं विजने रतिः । विषयेष्वरतिर्मोक्षे व्यवसायः परा धृतिः ।।
इत्यादि द्वारा सत्सङ्ग असत्सङ्गवर्जन आदि बहुत से उपाय बताये हैं। इनमें ब्रह्मचर्य आदि कुछ उपाय पतञ्जलि के यम-नियमों में भी आते हैं। सत्सङ्ग, उपवास, शास्त्रधारण आदियों को वहां साधनों में नहीं लिखा है। अपितु वहां अभ्यास तथा वैराग्य को जो कि योग के हेतु रूप में लिखे हैं, ओंकार की उपासना, मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा$^१$ आदि चित्तसम्बन्धी कर्म, प्राणायाम तथा आसन आदि, जिनका योग के अङ्गरूप में विशेष उल्लेख किया है उनका चरकसंहिता में उल्लेख नहीं किया। इस प्रकार साधनों में भी पूर्ण समानता नहीं पाई जाती। मुख्य उपादेय अंश में थोड़ी बहुत समानता तो सब जगह मिल सकती है।
इसके अतिरिक्त योग विद्या भी पतञ्जलि की ही आविष्कृत नहीं है, इसके पूर्व महाभारत आदि में भी इसका वर्णन मिलता है। 'हिरण्यगर्भ योग का वक्ता है'—इस वाक्य के अनुसार हिरण्यगर्भ के समय से ही योग विद्या का शाश्वतिक उदय माना गया है। महेञ्जोदारो की खुदाई में योगस्थ पुरुष की मूर्ति के मिलने से भारत में योग का प्रचलन अत्यन्त प्राचीन है—ऐसा सर जान मार्सले ने अपनी पुस्तक (Mohenjodaro and indus civilization Vol I) के ५४ पृष्ठ में अपना मत प्रदर्शित किया है। श्रीयुत सुरेन्द्रनाथदास गुप्त ने अपनी पुस्तक (History of Indian Philosophy Vol I) के २२६ पृष्ठ पर यही लिखा है। इस प्रकार स्वरूप, हेतु, फल, साधन, पारिभाषिक शब्दों की भिन्नता, पातञ्जल योग क्रिया में समय के व्यतिक्रम (व्यवधान) से विषय का विकसित होना तथा दोनों की लेखन शैली में भेद होने से दोनों लेखक भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं।
महाभारत के अश्वमेध के अनुगीता पर्व के १९वें अध्याय में 'अतः$^२$ परं प्रवक्ष्यामि योगशास्त्रमनुत्तमम्' इस वाक्य द्वारा प्रारम्भ करके दी हुई योग विद्या में भी इसी प्रकार इन्द्रियों को रोक कर मन को आत्मा में स्थिर करके मोक्ष के लिये योग करना लिखा है तथा उसके उपाय रूप से योगशास्त्रों का अभ्यास, एकान्त में रह कर संयम तथा इन्द्रियों
१. चरक में यद्यपि मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा आदि इन्हीं नामों से ये शब्द नहीं दिये हैं-फिर भी ये शब्द कुछ थोड़े से अन्तर से अवश्य मिलते हैं, यथा—
मैत्री कारुण्यमार्तेषु शक्ये प्रीतिरुपेक्षणम्। प्रकृतिस्थेषु भूतेषु, वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा ।। (च.सू. ९ अ. २५ श्लोक) (अनु.)
२. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ६५ देखें।