काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 253, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद | २३९ |
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को वश में करना लिखा है। इस प्रकार योग से मनुष्य में इच्छानुसार नाना शरीरों को उपलब्ध करना, देवताओं को वश में करना, निर्भयता, अक्लेश, निस्पृहा आदि उत्पन्न हो जाते हैं—इस प्रकार महाभारत में जिस योग का वर्णन किया है वह पूर्णरूप से न मिलने पर भी इसका कुछ अंश में सान्निध्य चरकसंहितागत योग प्रक्रिया में मिलने से हम कह सकते हैं कि चरक में प्राचीन योग का ही अनुसरण किया गया है न कि पातञ्जल योग का। इस प्रकार इन दोनों आचार्यों की विभिन्न योग प्रक्रियाएँ भी इन दोनों को भिन्न-भिन्न व्यक्ति ही सिद्ध करती हैं।
इसके अतिरिक्त योग सूत्रों के कर्ता पतञ्जलि एवं महाभाष्यकार पतञ्जलि भी एक ही व्यक्ति हैं अथवा भिन्न-भिन्न, इसमें भी विद्वानों में परस्पर मतभेद हैं। महाभाष्यकार पतञ्जलि का समय धातु एवं रसायनों की उन्नति से पूर्व का होने से रसायन शास्त्र का आचार्य पतञ्जलि भी भिन्न-भिन्न ही व्यक्ति है—इनमें केवल नाम का ही साम्य है ऐसा सुरेन्द्रनाथ दास गुप्त ने अपनी पुस्तक (History of indian philosophy Vol I) के २६१ पृष्ठ पर लिखा है। अप्रासङ्गिक होने से इस विषय में हम अधिक विचार नहीं करते।
अल्वेरूनी¹ नामक लेखक तो अग्निवेश तथा चरक में ही अभेद मानता है परन्तु यह मत 'अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते' में तन्त्रकार एवं प्रतिसंस्कर्ता का स्पष्ट भेद दिये होने से खण्डित हो जाता है। परन्तु यद्यपि दोनों आचार्य भिन्न-भिन्न हैं तो भी दोनों के ग्रन्थों का एक ही व्यक्ति द्वारा संकलित किया जाने से तथा उनके नाम मात्र शेष जाने से वर्तमान समय में तो दोनों का अभेद सा ही हो गया है, यह बड़े दुख का विषय है।
वर्तमान में उपलब्ध प्रतिसंस्कृत चरकसंहिता में भी अधिकांश रूप में प्राचीन सांख्य दर्शन को ही लेने से, बौद्ध मत की छाया न होने से तथा प्रतिसंस्कार के समय संभावित रूप से प्रविष्ट लेखों में भी प्राचीन एवं प्रौढ़ रचना के दिखाई देने से प्रतिसंस्कर्ता चरक भी अर्वाचीन प्रतीत नहीं होता। किन्तु भिषग्जितीय अध्याय में न्यायदर्शन के निग्रह स्थान आदि बहुत से पदार्थों की समीक्षा होना, इसके विषय को प्राचीन सिद्ध करने में बाधक होते हैं। श्रौत (वैदिक) दार्शनिक ग्रन्थों में गौतमसूत्र से पूर्व तथा बौद्ध दार्शनिक ग्रन्थों में नागार्जुन के उपायहृदय आदि ग्रन्थों से पूर्व विगृह्यसंभाषा में उपयोगी न्याय, छल, जाति, निग्रहस्थान आदि पदार्थों के न मिलने से प्रतीत होता है कि बौद्धों के महायानिक² विचारों के उदय होने पर दोनों (हीनयान तथा महायान के अनुयायियों) में जब परस्पर संघर्ष हुआ तब पक्ष-प्रतिपक्ष, जय-पराजय, नियम-व्यवस्था आदि के अनुसन्धान करने पर जो वादविवाद का विषय पहले संक्षेप में था उसी को गौतम तथा नागार्जुन ने ग्रन्थनिर्माण के द्वारा परिष्कृत करके उसे नियमित कर दिया, पक्षप्रतिपक्षरूप से होने वाले विवाद के विषय को बाद में होने वाले दिङ्नाग, धर्मकीर्ति आदि बौद्ध आचार्यों द्वारा प्रमाण समुच्चय, प्रमाण वार्तिक वाद, न्यायहेतु बिन्दु आदि ग्रन्थों में, न्यायवैशेषिकाचार्यों द्वारा वात्स्यायन भाष्य, उद्योतकर वार्तिकतात्पर्य टीका तात्पर्य परिशुद्धि आदि ग्रन्थों में, तथा जैनाचार्यों द्वारा तत्त्वसंग्रह आदि अपने ग्रन्थों में मध्यकाल में भी बढ़ाया हुआ हम देखते हैं। इस प्रकार समय-समय पर विमर्श के अवसर के उपस्थित होने पर विमर्दनीय (विचारणीय) पदार्थों का अनुप्रवेश (पीछे से प्रवेश) होता ही रहता है। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थों में सुश्रुत, भेड आदि वादविवाद के विषय में उदासीन ही रहे हैं। कश्यप ने वैद्यों के परस्पर विचारणीय विषयों के उपस्थित होने पर संधायसंभाषा को देकर विगृह्यसंभाषा का विषय विस्तार से न देकर लेशमात्र ही दिया है। इन प्राचीन आचार्यों द्वारा गृहीत मार्ग के अनुसार आत्रेय तथा अग्निवेश को भी अपनी संहिता में सन्धायसंभाषा
१. महमूद गजनवी का समकालीन तथा उसका सभा-कवि। इसने भारत में संस्कृत का अध्ययन करके भारतीय विद्याओं पर पुस्तक लिखी है (समय ११वीं शताब्दी का पूर्वार्ध)—अनुवादक।
२. बौद्ध धर्म का अर्वाचीन रूप महायान है जिसमें भगवान् बुद्ध के मूल उपदेशों में बहुत सा परिवर्तन कर दिया गया है। (अनुवादक)