काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकाश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् २४०
को ही देना चाहिये था क्योंकि चिकित्सा के विषय में विवाद होने पर जब व्यक्ति येन केन प्रकारेण स्वपक्षप्रतिष्ठापन एवं परपक्ष के खण्डन में लगता है तब वस्तुतत्त्व के तिरोहित हो जाने से अनर्थ की संभावना होती है, इसलिये वस्तुतत्त्व के अनुसन्धान के औचित्य को दृष्टि में रखते हुये विगृह्यसंभाषा में उपयोगी छल, जाति, निग्रहस्थान आदि हितकारी मार्ग में बाधक हो जाते हैं।
उपलब्ध चरक संहिता में वादविवाद के प्रकरण में लिखा है—
विगृह्यभाषा तीव्रं हि केषाञ्चिद् द्रोहमावहेत्। कुशला नाभिनन्दन्ति कलहं समितौ सताम्।।
अर्थात् इसमें सन्धायसंभाषा को ही प्रधानता दी है। यहां तक का विषय ही भगवान् आत्रेय का प्रतीत होता है। इसके बाद विगृह्यसंभाषा के विशेष पदार्थों को लेकर प्रवृत्त हुये हैं। वहां पर 'इमानि खलु पदानि भिषग्वादज्ञानार्थमधिगम्यानि भवन्ति' अर्थात् ये पद वैद्यक के विवाद विषयों के ज्ञान के लिये जानने चाहिये, यहां से प्रारम्भ करके 'इति वादमार्गपदानि यथोद्देशमभिनिर्दिष्टानि भवन्ति' अर्थात् इस प्रकार आवश्यकतानुसार वादविवाद के लिये पदों का निर्देश कर दिया। इस प्रकार प्रारंभ एवं उपसंहार (समाप्ति) द्वारा पृथक् प्रतीत होता हुआ ग्रन्थ प्रकरण प्राप्त विषयों से खींचकर पीछे से चरक के समय अनुप्रविष्ट प्रतीत होता है। प्राचीन समय में भी विभिन्न मत वाले भिन्न-भिन्न आचार्यों के होने से परस्पर उनमें विचार विमर्श होता ही होगा। इस विषय में पूर्ण प्रमाणों के अभाव में हम निश्चय से यह भी नहीं कह सकते कि उस समय वादविवाद के नियम नहीं थे। भासकवि के प्रतिमा नाटक$^१$ में प्राचीन शास्त्रों में मेधातिथि का न्यायशास्त्र विशेष प्रतिष्ठित माना जाता था। वहां भी वादविवाद के विषय का उल्लेख है। परन्तु यहां बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र के पृथक् उल्लेख होने के कारण न्यायशास्त्र से शब्दमात्र द्वारा तर्क का ग्रहण है या अन्य विषय का यह नहीं कहा जा सकता। और यदि तर्क शास्त्र का ही ग्रहण हो तो भी उसमें वादविवाद का विषय है या नहीं, और होने पर भी उसका क्या स्वरूप है यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। गौतम तथा नागार्जुन से पूर्व के ग्रन्थों में इस विषय के न मिलने से ऐसा प्रतीत होता है कि गौतम तथा नागार्जुन के समय पक्ष-प्रतिपक्ष भाव के विशेषरूप से प्रबलता धारण कर लेने पर सामान्यरूप से मिलने वाले प्राचीन विषयों का ही विशेष प्रसार हो गया है। इन बातों को दृष्टि में रखते हुये चरक, गौतम तथा नागार्जुन द्वारा निर्दिष्ट वादविवाद के विषयों की यदि हम पौर्वापर्य की दृष्टि से तुलना करें तो हम देखेंगे कि न्याय, प्रतिज्ञा आदि अवयव, तथा सिद्धान्त आदि के विषय में चरक और गोतम की उक्तियों में समानता होने पर भी गौतम ने बाद, जल्प, वितण्डा आदि शास्त्रीय विचारों के कथात्रैविध्य की दृष्टि से संप्राय संभाषा रूपी वाद को तत्त्वज्ञान की दृष्टि से और विगृह्य भाषारूपी जल्प (वितण्डा) को पक्ष-प्रतिपक्ष की दृष्टि से दिये है तथा जल्प में उपयोगी होने की दृष्टि से ही छल, जाति, निग्रहस्थान आदि का निर्देश किया है। परन्तु चरक की अपेक्षा गौतम में छल, जाति, निग्रहस्थान आदि के विभाग तथा संख्या की अधिकता मिलने से गौतम में विकसित अवस्था प्रतीत होती है। नागार्जुन के उपायहृदय में कुछ पदार्थ गौतम और चरक की अपेक्षा भिन्न प्रक्रिया द्वारा कुछ संक्षिप्त होने पर भी अधिकन्यूनत्रैविध्य, दृष्टान्तद्वैविध्य, सिद्धान्तधर्मचातुर्विध्य आदि २० प्रश्नोत्तरसम्बन्धी अनेक विषयों के विकसित अवस्था में दिखाई देने से और विकासवाद (Elevation theory) की दृष्टि से चरक की अपेक्षा गौतम और नागार्जुन के समय में विकसित विचारों के मिलने से प्रतीत होता है कि एक ही वादविवाद के युग में होने पर भी कुछ समय के पौर्वापर्य से चरक का समय गौतम तथा नागार्जुन के समय से प्राचीन प्रतीत होता है। सुरेन्द्रनाथ दास ने भी अपनी (History of Indian Philosophy Vol I) में यही मत प्रकट किया है।
१. साङ्गोपाङ्ग वेद, मनु के धर्मशास्त्र, महेश्वर के योगशास्त्र, बृहस्पति के अर्थशास्त्र, मेधातिथि के न्यायशास्त्र और प्रचेता के श्राद्धकल्प को पढ़ता हूँ। (प्रतिमा नाटक पृष्ठ ७९)।