काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 255, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
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बौद्धत्रिपिटक के चीनी अनुवाद (Chinese Buddhist chronicle) में मिलता है कि चरकनामक वैद्य कनिष्क राजा का राजवैद्य था। उसने उसकी रानी के किसी भयंकर रोग की चिकित्सा की थी। इससे चरकाचार्य कनिष्क के समय होने से प्रथम शताब्दी में हुआ है ऐसा पाश्चात्य लेखक सिल्वान लेभी का मत है। इतिहास के अनुसार दार्शनिक नागार्जुन का कनिष्क के समय होना तथा नागार्जुन के उपायहृदय तथा चरक के लेख में विगृह्यसंभाषा के समानरूप में मिलने से चरक तथा आर्य नागार्जुन दोनों ही कनिष्क के समकालीन सिद्ध होते हैं। परन्तु शिलालेख आदि के द्वारा कनिष्क राजा के बौद्ध होने तथा नागार्जुन का कनिष्क के समकालीन सिद्ध होने पर भी चरकसंहिता का प्रतिसंस्कर्ता चरक ही कनिष्क का राजवैद्य चरक था इसमें विद्वानों का मतभेद है। श्रीयुत कीथ¹ महाशय इसी मत के हैं। यदि चरक कनिष्क² का समकालीन हो तथा उसका राजवैद्य हो तो उसके लेखों में कहीं तो बौद्ध सम्प्रदाय की छाया (झलक) मिलनी चाहिये थी परन्तु इसके विपरीत चरकसंहिता में वैदिक मन्त्रों द्वारा वैदिक प्रक्रिया का ही प्रयोग क्यों किया गया है। कुछ लोग इसके प्रत्युत्तर में कहते हैं कि प्राचीन अग्निवेश संहिता में सांख्य दर्शन तथा वैदिक प्रक्रिया पहले से ही विद्यमान थी, चरक तो इस संहिता का केवल प्रतिसंस्कर्ता मात्र था इसलिये उसमें बौद्ध विचारों का प्रवेश नहीं हो सकता था। केवल इतने से ही चरक को प्राचीन सिद्ध नहीं किया जा सकता। कुछ लोग कहते हैं कि चरक संहिता में कुछ स्थलों पर स्वभाववाद³ का उल्लेख है जिसकी टीका में चक्रपाणि ने बौद्धमत का संकेत किया है इसलिये इसमें बौद्ध मत का प्रवेश है। परन्तु इसके प्रत्युत्तर में कुछ लोग कहते हैं कि इतने मात्र से ही बौद्ध मत का प्रवेश नहीं कहा जा सकता क्योंकि स्वभाववाद् केवल बौद्धों का ही नहीं है। इससे पहले भी विद्यमान था।
यदि चरक को कनिष्क का राजवैद्य मानें तो उपायहृदय में नागार्जुन ने जहां चिकित्सा के प्रसंग में सुश्रुत को स्मरण किया है वहां अपने समकालीन बौद्ध राजा कनिष्क के राजवैद्य एवं इतने प्रसिद्ध विद्वान् चरक का नामोल्लेख तक कैसे भूल गया। यदि इन युक्तियों के आधार पर चरक को नागार्जुन से भी बाद का माना जाय तो चरक का समय नागार्जुन से भी अर्वाचीन प्रतीत होता है।
नागार्जुन द्वारा अपने दार्शनिक ग्रन्थ उपायहृदय में प्रसङ्गवश आये हुये वैद्यक के प्रकरण में पूर्ववर्ती आत्रेय अग्निवेश कश्यप आदि की तरह चरक तथा बौद्ध मतानुयायी जीवक का नामोल्लेख न करना ठीक ही है। चरक के वहां नामोल्लेख न होने मात्र से ही यदि उसे अर्वाचीन मान लें तो इस युक्ति के आधार पर आत्रेय आदि को ही हमें अर्वाचीन मानना पड़ेगा। नागार्जुन के उपायहृदय में सुश्रुत का नाम होने पर भी चरक का नाम न होने का कारण संभवतः यह हो कि सुश्रुत संप्रदाय का प्रादुर्भाव काशी में हुआ था और चरक संप्रदाय का पाञ्चाल, काम्पिल्य आदि पश्चिम प्रदेश में। इसलिये उस प्रदेश में उनकी प्रसिद्धि स्वाभाविक थी। परिणामस्वरूप पूर्व दिशा के देशों में सुश्रुत की अधिक प्रसिद्धि हो गई और इसलिये श्याम, कम्बोडिया आदि देशों के यशोवर्मा तथा जयवर्मा⁴ के शिलालेखों में वैद्य के रूप में सुश्रुत का उल्लेख मिलता
१. चरक परम्परा के अनुसार कनिष्क का चिकित्सक था, उसने उसकी स्त्री की कठिन रोगावस्था में चिकित्सा की थी। परन्तु दुर्भाग्यवश पीछे से जब हम इन कहानियों को सुनते हैं तो हम नहीं कह सकते कि इन कहानियों का कितना मूल्य है (History of Sanskrit literature A. B. Keith P. 406)।
२. कनिष्क का समय ७८ से १०० ईसवी-स्मिथ १२० ईसवी मानता है। (अनुवादक)
३. प्रवृत्तिर्हेतुर्भावानां न निरोधेऽस्ति कारणम् । केचित्तत्रापि मन्यन्ते हेतुं हेतोरवर्तनम् ।। (च.सू.अ. १६ श्लोक २७)
अर्थात् भाव (पदार्थों) की प्रवृत्ति अर्थात् उत्पत्ति में कारण होता है परन्तु विनाश में कोई कारण नहीं। अर्थात् भावों का नाश अकारण ही (स्वभावतः) हो जाता है। (अनुवादक)
४. यशोवर्मा—(कम्बुज का राजा ८८९ से ९०८ ईसवी) तथा जयवर्मा—(यह भी कम्बुज का राजा १२वीं शताब्दी)। (अनुवादक)