काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 256, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २४२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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है। नागार्जुन का संबन्ध विशेषरूप से दक्षिण प्रदेश तथा मगध से था इसलिये पूर्व दिशा में प्रसिद्ध तथा अपने समाज में सम्मानित सुश्रुत का ही नाम उसे ध्यान में आया हो। परन्तु सुश्रुत से भी पहले उसे चरक का नाम याद आना चाहिये था क्योंकि अपने समकालीन राजा कनिष्क के राजवैद्य तथा विद्वान् होने के नाते चरक से उसका परिचय अवश्य होना चाहिये था। इसके अतिरिक्त राजतरंगिणी के लेखक (कल्हण) ने भी कनिष्कवृत्ति में चरक का नाम क्यों नहीं दिया। इनके आधार पर तथा गौतमसूत्र के आविर्भाव से पूर्व भी न्याय वितण्डा आदि विवाद के विषयों के प्रचलित होने और चरक की लेखन शैली में भी प्राचीन ब्राह्मण ग्रन्थों की ही झलक मिलने से सिल आदि विद्वान् चरक को कनिष्क का समकालीन नहीं मानते हैं।
इस प्रकार जब हम चरक के समय का अन्वेषण करते हैं तो हमें बहुत से मत दिखाई देते हैं। इसके समय के पूर्ण निश्चय करने के लिये अभी बहुत से प्रमाणों के खोजने की आवश्यकता है। श्रीयुत प्रफुल्लचन्द्र राय ने भी अपनी पुस्तक (History of Hindu chemistry Vol I) में चरक तथा सुश्रुत के विषय में बहुत से विचार प्रकट किये हैं।
वार्योविद, दारुवाह, नग्नजित् तथा भेड
इस काश्यपसंहिता के रोगाध्याय में काश्यपसम्मत रोगों के द्वैविध्यवाद¹ का उल्लेख होने से तथा वमन विरेचनीयाध्याय में भी ग्रन्थ के त्रुटितं होने से वार्योविद के नाम से किसी अव्यक्त मत के दिये होने से वार्योविद का उल्लेख मिलता है। कुक्कुणक चिकित्सा सम्बन्धी अध्याय के अन्त में वार्योविद नामक राजा को मारीच कश्यप द्वारा बालभैषज्य² के उपदेश का निर्देश मिलता है। उत्तर भाग में अनेक स्थानों पर जीवक द्वारा प्रश्न एवं सम्बोधन के मिलने पर भी बीच-बीच में पार्थिव, विशांपते, नृपोत्तम, नृप तथा नराधिप आदि द्वारा मिलने वाले राजा के सम्बोधन, अन्य किसी दूसरे राजा के सम्भव न होने से तथा एक स्थान पर नामपूर्वक उल्लेख होने से उसी वार्योविद के प्रति किये गये प्रतीत होते हैं। इसी प्रकार देशसात्म्याध्याय में भी 'काशीराजो (काशिराजं) महामुनिः' में काशीराज द्वारा निर्दिष्ट व्यक्ति भी वही वार्योविद प्रतीत होता है। इस प्रकार इस संहिता के अनुसार मारीच कश्यप का शिष्य तथा उसका समकालीन वैद्याचार्य वार्योविद काशी का राजा प्रतीत होता है। आत्रेय संहिता के वातकलाकलीय अध्याय में मारीच तथा वार्योविद का पक्ष-प्रतिपक्ष रूप में निर्देश होने से भी दोनों का सहभाव प्रतीत होता है। वातकलाकलीय³, यज्जः⁴ पुरुषीय तथा आत्रेय भद्रकाष्पीय⁵ अध्यायों में आत्रेय के साथ एकत्रित हुए ऋषियों में वार्योविद का उल्लेख होने से आत्रेय तथा वार्योविद का सहभाव तथा स्थान-स्थान पर उसके मतों का उल्लेख मिलने से वार्योविद का वैद्याचार्य होना भी स्पष्ट है। यज्जःपुरुषीयाध्याय में आत्रेय के सहभाव तथा काशीपति रूप में निर्देश होने से वामक⁶ भी काशीराज तथा वैद्याचार्य प्रतीत होता है। काशीराज रूप में मिलने वाले वैद्याचार्य दिवोदास, वामक तथा वार्योविद आदि तीनों के परस्पर पौर्वापर्य के विषय में अभी तक कुछ ज्ञात नहीं है। यद्यपि आजकल वार्योविद का ग्रन्थ तथा मतोल्लेख नहीं मिलता है तथापि आत्रेय तथा काश्यपसंहिता में उसके मत के उल्लेख मिलने से यह कहा जा सकता है कि यह उस समय कोई प्रसिद्ध आचार्य था। संभवतः यह भी कश्यप से बालभैषज्य के उपदेश को ग्रहण करने वाला कौमारभृत्य का कोई आचार्य हो। इस प्रकार आत्रेय पुनर्वसु तथा मारीच कश्यप के समकालीन रूप में निर्दिष्ट, परस्पर एक दूसरे का उल्लेख करने वाले आत्रेय पुनर्वसु तथा मारीच कश्यप के समान काल वाला ही प्रतीत होता है।
उपास्यमानमृषिभिः कश्यपं वृद्धजीवकः। चोदितो दारुवाहेन वेदनार्थेऽभ्यचोदयत् ।।
१. १ से ६ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ६९ देखें।