भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २४३

काश्यपसंहिता के उपर्युक्त वचन के अनुसार संहिता के पूर्वभाग में वृद्धजीवक को प्रश्न पूछने में प्रेरणा देने वाला दारुवाह प्रतीत होता है। वही रोगाध्याय में 'पञ्चरोगा आगन्तुवातपित्तकफ त्रिदोषजा इति दारुवाहो राजर्षिः' के द्वारा रोगों के पाञ्चविध्यवाद के मत के द्वारा उसका राजर्षि रूप में निर्देश किया गया है। रोगद्वैविध्यवाद के रूप में वार्योविद का तथा रोगपाञ्चविध्यवाद के रूप में दारुवाह का पृथक् निर्देश होने से, ये दोनों विभिन्न व्यक्ति प्रतीत होते हैं। राजर्षि दारुवाह कहां का हैं, यह इससे प्रतीत नहीं होता। किन्तु अष्टाङ्गसंग्रह के उत्तर स्थान में विष के वेगों के विषय में पुनर्वसु, नग्नजित् विदेह, आलम्बायन तथा धन्वन्तरि के मत का उल्लेख मिलने से नग्नजित्¹ नाम का भी कोई वैद्य प्रतीत होता है। उसी की इन्दु² की व्याख्या में 'नग्नजितोदारुवाहिनः' पद द्वारा नग्नजित् तथा दारुवाह दोनों शब्दों को समानाधिकरण के रूप में दिया है। यहां इन्नन्त दारुवाहिन् शब्द का प्रयोग होने पर भी चरक की चक्रपाणि³ व्याख्या में दारुवाह नाम दिया होने से तथा काश्यपसंहिता में भी दारुवाह नाम से ही उल्लेख होने से केवल अन्तिम वर्ण के भेद होने से दोनों एक ही व्यक्ति प्रतीत होते हैं। अन्यत्र कहीं-कहीं मिलने वाला दारुक⁴ भी संभवतः यही दारुवाह हो। दारुवाह तथा नग्नजित् के अभेद को मानकर अनुसन्धान करने पर मुद्रित भेड संहिता में निम्न श्लोक मिलता है—

गान्धारभूमौ राजर्षिममग्रिजित्स्वर्गमार्गदः। संगृह्य पादौ पप्रच्छ चान्द्रभागं पुनर्वसुम् ।।
एवमुक्तस्तथा तस्मै महर्षिः पार्थिवर्षये। विषयोगेषु विज्ञानं प्रोवाच वदतां वरः ।।
(पृष्ठ ३०)

उपर्युक्त श्लोक में 'राजर्षिममग्रिजित्' इस पाठ के मिलने पर भी श्री यादवजी⁵ महाराज द्वारा तञ्जोर पुस्तकालय में मिलने वाली पुस्तक के अनुसार 'राजर्षिर्नग्नजित्स्वर्णमार्गदः' पाठ दिया होने से तथा पूर्वापर वाक्य के अनुसार प्रथमान्त राजर्षि पाठ के ही उचित होने से उस पाठ के अनुसार भेड के समकालीन नग्नजित् नाम वाले किसी गान्धार के राजा द्वारा चन्द्रभागा नाम वाली माता के अनुसार चान्द्रभाग संज्ञा वाले पुनर्वसु आत्रेय से विष के विषय में प्रश्न किये जाने का निर्देश मिलता है। अष्टाङ्गहृदय के 'रसाद्रक्तमित्यादि' की अरुणदत्त की व्याख्या में नग्नजित्⁶ के वचन का उल्लेख मिलने से अष्टाङ्गहृदय में 'इति नग्नजितो मतम्' के मिलने से तथा भेड संहिता में भी इस विषसम्बन्धी प्रश्न के मिलने से यह वही (एक ही) व्यक्ति प्रतीत होता है। दारुवाह तथा नग्नजित् का राजा के रूप में उल्लेख मिलने से, इन्दु की टीका के अनुसार दोनों का समानाधिकरण के रूप में दिया होने से तथा इन दोनों के विषय में उस-उस नाम से मिलने वाले गुणों की समानता होने से इस गान्धार राजर्षि का नाम केवल विष के विषय में अपितु वैद्यक के विषय में भी आचार्य भाव प्रकट होता है। पूर्वनिर्दिष्ट शालिहोत्रोक्त अश्वशास्त्र में भी आयुर्वेद के आचार्यों में विनग्नजित् का नाम मिलता है। यह भी संभवतः वही व्यक्ति हो। मत्स्य⁷ में वास्तुशास्त्र (गृह निर्माणकला) के उपदेशक के रूप में भी नग्नजित् का उल्लेख है। यह नग्नजित् गान्धार का राजा ही है या कोई अन्य व्यक्ति यह नहीं कहा जा सकता।

इसके अतिरिक्त ऐतरेय ब्राह्मण⁸ में क्षत्रिय यज्वाओं के फलचमस भक्षण के साम्प्रदायिकत्व प्रदर्शन में नग्नजित् गान्धार का उल्लेख मिलता है। वहीं क्षत्रिय यजमानों के लिये ही दिग्विजय रूप राष्ट्रसम्पत्ति के फल का उल्लेख होने से फलचमस भक्षण द्वारा ऐश्वर्य को प्राप्त किये हुए, सब शत्रुओं को विजय करने वाले एक नग्नजित् नाम के क्षत्रिय गान्धार के महाराजा का निर्देश मिलता है। इस प्रकार यहां निर्दिष्ट गान्धार का राजा नग्नजित् ही देश तथा नामों की समानता के कारण भेडसंहिता में सम्मानपूर्वक राजर्षिरूप में निर्दिष्ट गान्धार का राजा नग्नजित् ही होना चाहिये। शतपथ ब्राह्मण⁹ में भी चितिशक्ति में प्राणों के उपधान करने के विषय में नग्नजित् के पुत्र स्वर्जित तथा गान्धार के नग्नजित् का उल्लेख मिलता हैं। वहां प्राणों की महिमा का वर्णन करने वाले राजन्य बन्धु का निर्देश होने से इससे भी शारीरविद्या के आचार्य गान्धार


१. १ से ९ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ६९-७० देखें।