भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२४४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

के राजा नग्नजित् का ही निर्देश प्रतीत होता है। यहां उसके पुत्र स्वर्जित् का उल्लेख होने से तथा भेडसंहिता में नग्नजित् के 'स्वर्गमार्गद' इस विशेषण से उसके किसी विजय के वृत्तान्त की सूचना मिलती है। उपर्युक्त वर्णन के अनुसार नग्नजित् को ऐतरेय तथा शतपथ ब्राह्मण के काल का सिद्ध करते हुए 'नग्नजितो दारुवाहिनोऽप्यत्र' इन्दु के इस वाक्य में अपि शब्द के कारण यदि दो पृथक् व्यक्तियों की कल्पना भी का जाय तो भी औपदेशिक सम्बन्ध से नग्नजित् के सम्बन्ध से पुनर्वसु आत्रेय तथा उसके शिष्य भेड का समय भी ऐतरेय तथा शतपथ ब्राह्मण के काल से बाद का नहीं है। इसलिये 'स्वर्णमार्गद' इस पद के आधार पर कहना कि गान्धार के राजा नग्नजित् और भेड दारायस नामक पारसीक राजा के समय (५२१ से ४८५ ईस्वी पूर्व) के हैं—युक्तिसंगत नहीं है।

इसी प्रकार महाभारत¹ में युग के अन्त में अन्तर्हित वेद, इतिहास आदि को अपने तपोबल से प्राप्त करके उस-उस विद्या के प्रकाशक महर्षियों के विवरण में कृष्णात्रेय का चिकित्सक के रूप में उल्लेख मिलता है। यह कृष्णात्रेय ही पुनर्वसु आत्रेय हैं या नहीं, यह एक पृथक् प्रश्न है। तथापि भेड संहिता तथा चरक संहिता में भी कृष्णावेश के उपदेश का उल्लेख होने से उसके सहभावी पुनर्वसु आत्रेय का महाभारत से प्राचीनत्व तो इससे भी प्रकट होता है।

इस प्रकार आत्रेय के सहभावी रूप से मारीच कश्यप का उल्लेख, वार्योविद का आत्रेय पुनर्वसु तथा मारीच कश्यप के साथ सहभाव, कृष्णात्रेय तथा पुनर्वसु आत्रेय का समानाधिकरण (एक व्यक्तित्व) के रूप में निर्देश, महाभारत में चिकित्सा के प्रवर्तक के रूप में कृष्णात्रेय का उल्लेख, आत्रेय के शिष्य रूप में भेड का उल्लेख, भेड के सहभावी तथा आत्रेय पुनर्वसु के शिष्य रूप में गान्धार के राजा नग्नजित् के उल्लेख, नग्नजित् तथा दारुवाह के एक व्यक्तित्व का निर्देश, दारुवाह का काश्यपसंहिता में निर्देश, गान्धार के राजा नग्नजित् का ऐतरेय ब्राह्मण में तथा गान्धार के प्राणतत्त्व के वेत्ता नग्नजित् तथा उसके पुत्र स्वर्जित् का भी शतपथ ब्राह्मण में कीर्तन, दिवोदास का ब्राह्मणग्रन्थों तथा उपनिषदों में उल्लेख तथा धन्वन्तरि का उसके पूर्वपुरुष के रूप में मिलना, इत्यादि बातों को देखकर उसके अनुसार विचार करने का पर ज्ञात होता है कि मारीच कश्यप, पुनर्वसु आत्रेय, भेड, नग्नजित् दारुवाह तथा वार्योविद इत्यादि भैषज्य विद्या के आचार्य ऐतरेय तथा शतपथ ब्राह्मण के समय से बाद के नहीं हैं अपितु धन्वन्तरि तथा दिवोदास के ही समान ब्राह्मण ग्रन्थ तथा उपनिषदों के समय एक साथ अथवा थोड़े बहुत पौर्वापर्य के साथ विद्यमान थे।

इस प्रकार उपर्युक्त वर्णन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वैदिक काल में प्रारंभ हुई यह भारतीय आयुर्वेद विद्या उपनिषदों तथा ब्राह्मण ग्रन्थों के समय भी इसी प्रकार महर्षियों एवं प्राचीन आचार्यों द्वारा भारत में (विशेषकर भारत के पश्चिम प्रदेशों में) उन्नति की चरमसीमा पर पहुंची हुई थी।

रसशास्त्र के ग्रन्थ

यद्यपि भावप्रकाश आदि अर्वाचीन ग्रन्थों में कुछ विदेशी ओषधियों, विदेशी चिकित्सा पद्धति, धातु रस आदि के विशेष प्रयोग, अफीम का उपयोग इत्यादि अर्वाचीन विषय मिलते हैं तथा इससे कुछ प्राचीन काल के सिद्धयोग आदि में पारद तथा धातुओं का सामान्यरूप से प्रयोग मिलता है। तथापि हम देखते हैं कि वाग्भट के समय तक इस प्रकार के अर्वाचीन विषय बहुत कम उपलब्ध होते हैं। सम्भवतः चतुर्थ शताब्दी में लिखित बावर नामक विद्वान् द्वारा उपलब्ध नावनीतक नामक ग्रन्थ में, तथा उससे भी प्राचीन माने जाने वाले हार्नले नामक विद्वान् द्वारा उपलब्ध लेख में भी स्वर्ण आदि धातुओं का उल्लेख होने पर भी उनकी शोधन आदि की विशेष प्रक्रियाओं तथा पारद के उपयोग आदि का विशेष विवरण नहीं मिलता। महावग्ग में जीवक के वृत्तान्त में वनस्पतियों के अन्वेषण के लिये गुरु से नियुक्त जीवक द्वारा


१. १ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ७१ देखें।

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