भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २४५

चिकित्सा में अनुपयोगी एक भी ओषधि के न प्राप्त कर सकने के वर्णन, घृत नस्य आदि ओषधियों अथवा शस्त्रक्रिया द्वारा रोगियों की चिकित्सा तथा रस धातु आदि के कहीं भी न मिलने से प्रतीत होता है कि जीवक के समय तक भी रस धातु आदि ओषधियों का प्रचार नहीं था। चरक¹ तथा सुश्रुत² में भी धातु तथा मणियों का ओषधियों में केवल नाम मात्र का ही उल्लेख मिलता है। उनके शोधन, सिद्धौषध, पारदौषध तथा अहिफेन आदि का वर्णन नहीं मिलता है। काश्यपसंहिता के खिलभाग में आत्रेय तथा भेड के समान शोथरोग में केवल दो तीन बार ही अयोरज (लोहचूर) तथा ताम्ररज का उल्लेख मिलता है। काश्यपसंहिता में यद्यपि उनके शोधन एवं भस्मीकरण का निर्देश नहीं मिलता है तथापि खाने के लिये उनके उपयोग का निर्देश मिलने से यह कहा जा सकता है कि उनका शोधन इत्यादि किया जाता होगा। धातु तथा पारद आदि का उपयोग इसके अतिरिक्त इसमें नहीं मिलता है। तथा अहिफेन आदि अर्वाचीन वस्तुओं का भी इसमें निर्देश नहीं है। इस प्रकार ज्यों-ज्यों प्राचीन ग्रन्थों का अन्वेषण करते हैं त्यों-त्यों हमें ये अर्वाचीन वस्तुएं कम मिलती जाती हैं।

इस रसायन विद्या की उत्पत्ति कब तथा कहां से हुई है इस विषय में विचार करने पर रसायन विद्या में प्रयुक्त होने वाला कैमिस्ट्री (Chemistry) शब्द अल्केमीविज्ञान को सूचित करता है। किसी-किसी व्यक्ति का मत है कि केमिस्ट्रीशब्द मिश्रदेशीय 'क्यामी' शब्द से बना है। इस प्रकार मिश्रदेश से उत्पन्न हुई रसायन विद्या अरब तथा ग्रीस के द्वारा यूरोप में फैली है। परन्तु कुछ विद्वान् कहते हैं कि मिश्रदेश में उस विद्या के अर्थ में 'क्यामी' शब्द मिलता ही नहीं है। तथा वहां रसायन विद्या की प्रागुत्पत्ति के इतिहास के विषय में कोई निर्देश नहीं मिलता है। कुछ लोगों का कहना हैं कि कैमिस्ट्री शब्द तृतीय शताब्दी के अरबदेशीय 'किमाइ' शब्द से बना हुआ है। इस 'किमाइ' शब्द को सिनिस नामक विद्वान् ने अपने अभिधान ग्रन्थ में 'अल्केमी' अर्थ में प्रयुक्त किया है। इससे ज्ञात होता है कि यह विद्या न तो मिश्रदेश में और न तो ग्रीस देश में उत्पन्न हुई है। क्योंकि यदि वहां उत्पन्न होती तो क्या उस देश के हेरोडोटस, डायोडोरश, प्लुचाट तथा प्लीनी आदि प्राचीन लेखक उसके विषय में कुछ भी नहीं लिखते ? तृतीय, चतुर्थ शताब्दी तक मिश्र तथा ग्रीस वालों को तो रसायन विद्या का ज्ञान ही नहीं था। अल्केमी विद्या में पारद का प्रयोग तो पीछे से ही मिलता है। इस प्रकार पाश्चात्य देशों में रसायन विद्या का सबसे प्रथम जानने वाला ग्याबर नामक एक अरबदेशीय विद्वान् था। तथा अरब से ही इस विद्या का अन्य सब देशों में प्रचार हुआ है। कुछ विद्वान् कहते हैं कि वैदिक काल में सोमरस का बहुत अधिक व्यवहार मिलने से ऋग्वेद के कसमय से ही रसायन विद्या भारत में प्रचलित थी। उसी के अनुसार चरक आदि के समय में यूष शरीर के रस आदि के अर्थ में रस शब्द का प्रयोग होता था। इसके बाद रस के समान तरलता के कारण ही पारद तथा अन्य द्रव धातुओं में भी रस शब्द का व्यवहार होने लगा। इस प्रकार भारतीय रसायन शास्त्र का मूल अत्यन्त प्राचीन हैं। यह रसप्रक्रिया सर्वप्रथम रस विषयक तान्त्रिक ग्रन्थों में मिलती है, तथा उसके बाद के रसग्रन्थों में इसका विकसित रूप दिखाई देता है। विद्वानों का यह विचार है कि यह विद्या नागार्जुन द्वारा प्रारम्भ की गई है। लोहशास्त्र का पतञ्जलि द्वारा निर्माण करने का अनेक स्थानों पर निर्देश मिलता है। पारसीक मत के प्रवर्तक जरथुष्ट से पूर्व उस देश के निवासी मागी जाति वालों द्वारा इस गुप्त रसायन विद्या को भारतीय ब्राह्मणों से प्राप्त करने का वृत्तान्त उनके इतिहास से मिलता है। ग्रीस देश के रसायन ग्रन्थों में भी इस विद्या के विषय में पारसीक (पर्शिया) देश का स्थान-स्थान पर निर्देश है। इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि यह रसायन विद्या सबसे पहले भारत में ही आविर्भूत हुई थी। भारतीय वैद्यों के अरब देश में जाने से तथा चरक और सुश्रुत के अरब देश में अनुवाद होने तथा भारतीय चिकित्सा का आदर होने से भारत से ही अरब में इस विद्या के प्रचार की प्रतीति होती है। अरब देश के इतिहास से प्रकट होता है


१. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. पृ. ७१ देखें।