काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
कि ११-१२ वीं शताब्दी में अरब देश में भी रसायन शास्त्र उन्नत अवस्था में था। इसलिये यह कहना निरर्थक है कि पारद के शोधन आदि का ज्ञान भारत ने अरब से सीखा। पी.सी. राय आदि इतिहास लेखक लिखते हैं कि यूरोप आदि पाश्चात्य देश वालों ने रसायन शास्त्र की उपादेयता न जानकर कई शताब्दी तक उसे ग्रहण नहीं किया। पीछे कालक्रम से उसके गुणों को जानने पर बहुत अर्वाचीन काल में ही पाश्चात्य देशों में इसका प्रचलन हुआ है।
रक्तपारद के भारत से ग्रीस तथा रोम में जाने का वर्णन मिलता है। उसके विषय में विवेचन करते हुए जायसवाल जी ने रक्तपारद, शब्द रससिन्दूर के लिये व्यवहृत हुआ बतलाया है। परन्तु रक्तपारद शब्द रससिन्दूर के लिये न मिलकर हिंगुल के पर्यायों में मिलने से रक्तपारद से संभवतः हिंगुल (शिंगरफ) का ग्रहण किया गया है।
^१प्रथमशताब्दी वाले भर्तृहरि के ‘उत्खातं निधिशङ्कया क्षितितलं ध्माता गिरेर्धातवः’ वचन से कुछ^२ लोग कहते हैं कि भारत में रसविद्या के प्राचीन होने की कल्पना दृढ़ होती है।
धातुविज्ञान पहले से ही था यह बात तो आत्रेय, सुश्रुत तथा कश्यप आदि के द्वारा धातुओं का उल्लेख किया होने से स्पष्ट है। कश्यप ने भी सद्योजात शिशु के लिये स्वर्णप्राशन तथा उसके अवलेहनरूप फलों को दिया है। श्रुति एवं स्मृतियों में धातुओं तथा रत्नों के धारण आदि से आयु, आरोग्य एवं श्रेयस् की प्राप्ति का उल्लेख मिलने से प्रतीत होता है कि भारतीयों को इस विद्या के उपयोग का ज्ञान अत्यन्त प्राचीन काल से था। यजुर्वेद में ‘प्रथमो दैव्यो भिषक्’ द्वारा रुद्र को भी प्रधान (आदि) वैद्याचार्य बतलाया है। आत्रेय आदि ने ब्रह्मा के प्राथमिकता दी है, वहां रुद्र का उल्लेख नहीं है। नाथ सम्प्रदाय तथा तर्कशास्त्र में भी स्थान-स्थान पर रसवैद्यक का विषय मिलता है। तन्त्रशास्त्र तथा नाथ सम्प्रदाय में शिव का परम आचार्य के रूप में निर्देश किया है। इसप्रकार तान्त्रिक आदि प्रचलित रसवैद्यक के ग्रन्थों में रुद्र का मूल (प्रधान) आचार्य होना संभव हैं। रसविद्या के प्राचीन तन्त्र ग्रन्थों में मिलने से तथा चरक, सुश्रुत और काश्यप आदि के ग्रन्थों में भी लेशरूप में मिलने से इसे अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता। यह भी कहा जा सकता है कि जिस प्रकार अरबदेश में सातवीं शताब्दी में प्रचलित हुए भी रसायन शास्त्र को यूरोप वालों ने सोलहवीं (१६वीं) शताब्दी में ग्रहण किया था उसी प्रकार पूर्व प्रचलित तन्त्रोक्त रसशास्त्र को वैदिक सम्प्रदाय वाले आत्रेय आदि महर्षियों ने भी अपने समय में लेशरूप में ग्रहण करना प्रारम्भ किया हो।
धातुओं के शोधन एवं योग आदियों के द्वारा तन्त्रोक्त भारतीय रसौषधनिर्माण प्रक्रिया भी प्राचीन काल में गुप्त, अप्रचलित अथवा आंशिकरूप में वर्तमान थी। पीछे से उस विद्या को नागार्जुन आदि भारतीय रसविद्या के आचार्यों ने प्रकाश में लाकर विकसित किया प्रतीत होता है। इसीलिये सम्भवतः प्राचीन ग्रन्थों में रसविद्या का विशेष विवरण नहीं मिलता है।
(३) संस्करणों की तुलना तथा तत्सम्बन्धी विषय
प्रतिसंस्करण
प्राचीन आचार्यों के नाम से मिलने वाली संहिताओं में वृद्धजीवकीय तन्त्ररूप काश्यपसंहिता, चरकसंहितारूप आत्रेय एवं अग्निवेशसंहिता, सुश्रुतसंहितारूप धन्वन्तरि संहिता तथा भेडसंहिता–ये सब प्राचीन संहिताएं हैं। उनमें जहां कहीं अर्वाचीनता का सन्देह उत्पन्न करने वाले पद, वाक्य तथा प्रबन्ध इत्यादि मिलते हैं, वे संभवतः पीछे से संस्करण के समय अनुप्रविष्ट हुए प्रतीत होते हैं।
१. यह विचारणीय प्रश्न है कि भर्तृहरि प्रथम शताब्दी में था या नहीं।
२. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ७२ देखें।