भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २४७

इनमें से काश्यपसंहिता के संक्षिप्तस्वरूप वृद्धजीवकीय तन्त्र के वात्स्य द्वारा प्रतिसंस्करण का उल्लेख इस संहिता के कल्पाध्याय में स्वयं किया हुआ है। आत्रेयसंहितात्मक अग्निवेशतन्त्र के चरक द्वारा प्रतिसंस्करण का निर्देश चरकसंहिता के ‘अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते’ इत्यादि श्लोक द्वारा स्पष्ट है। सुश्रुतसंहिता के प्रतिसंस्करण का यद्यपि ग्रन्थ (सुश्रुतसंहिता) में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है तथापि डल्लन आदि टीकाकार इसे नागार्जुन द्वारा प्रतिसंस्कृत मानते हैं। अस्तु, नागार्जुन इसका प्रतिसंस्कर्ता को चाहे न हो परन्तु यह तो सब विद्वान् स्वीकार करते हैं कि स्थान-स्थान पर अन्य विषयों के मिलने के कारण सुश्रुतसंहिता का वर्तमानरूप प्रतिसंस्कृत ही है। भेड संहिता में ‘चक्षुरिति कश्यपः’ द्वारा दिये हुए कश्यप का चक्षुर्निर्वृत्तिवाद तथा काश्यपसंहिता में भेड के नाम से दिया हुआ ६ वर्ष के बाद विरेचन देने सम्बन्धी मत उपलब्ध भेडसंहिता में न मिलने का उल्लेख पहले किया जा चुका है। ज्वरसमुच्चय में उद्धृत भेड के वचनों में से पचास से अधिक भेड के श्लोकों के मुद्रित भेडसंहिता में आंशिक¹ रूप में मिलने से ज्वर प्रकरण की तरह अन्य प्रकरणों का भी स्थान-स्थान पर खण्डित एवं अधूरा होना, बीच-बीच में अन्य विषयों का होना तथा पुनः किया गया प्रतिसंस्करण स्पष्ट प्रतीत होता है। इस गड़बड़ से सन्देह उत्पन्न होता है। आत्रेय रूप एक ही आचार्य के उपदेश को ग्रहण करके पृथक्-पृथक् ग्रन्थों का निर्माण करने वाले अग्निवेश तथा भेड के ग्रन्थों में अनेक समानताओं एवं संवादों के मिलने से पुनः मतिविभ्रम हो जाता है। इस प्रकार भेडसंहिता में दीखने वाले दोष (कमियां) समय के कारण प्रतीत होते हैं। यद्यपि यहां भी प्रतिसंस्करण का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है तथापि इसमें प्रतिसंस्करण का होना स्पष्ट है।

आत्रेय आदि की संहिताओं को लेकर बनाये हुए अग्निवेशतन्त्र आदि का चरक आदि आचार्यों ने जो संस्करण किया है उसके स्वरूप के विषय में विचार करने पर हम देखते हैं कि दृढ़बल ने चरक द्वारा किये संस्करण का निम्न स्वरूप बताया है—

विस्तारयति² लेशोक्तं संक्षिपत्यति विस्तरम् । संस्कर्ता कुरुते तन्त्रं पुराणं च पुनर्नवम् ।।

अर्थात् संक्षिप्त भाव को विस्तार से कह देना तथा विस्तृत रूप में दिये हुए भावों को संक्षेप में कह देना यह चरक के संस्करण की शैली है। पूर्वोक्त संस्करण आवापोद्वाप अथवा संग्रह-विग्रह प्रक्रिया में से किसी एक द्वारा संभव है। आवापोद्वाप प्रक्रिया का यह अभिप्राय है कि संक्षिप्त पूर्वग्रन्थ के स्थान में दूसरा ही विस्तृत लेख तैयार कर दिया जाय तथा विस्तृत पूर्वग्रन्थ के स्थान में अन्य संक्षिप्त लेख बना दिया जाय। तथा संग्रहविग्रह प्रक्रिया का अभिप्राय यह है कि पूर्व ग्रन्थ में संक्षेप के कारण विषय के स्पष्ट न होने से उसे स्पष्ट करने के लिये विस्तार से दे दिया जाय, तथा,अत्यन्त विस्तार से दिये हुए विषय को सरलतापूर्वक ग्रहण एवं धारण कर सकने के लिये उसके सारांश को लेकर पुनरुक्ति के रूप में संक्षेप से कह दिया जाय। इनमें से यदि प्रथम (आवापोद्वाप) प्रक्रिया द्वारा संस्करण किया गया होता तो आत्रेय एवं अग्निवेश तन्तरूप मूल ग्रन्थ का अधिकांश रूप में स्वरूप ही बदल जाता तथा नई ही रचना बन जाती। तथा उस अवस्था में चरकसंहिता में बीच-बीच में आत्रेय तथा अग्निवेश के प्रतिवचन, प्रश्न आदि नहीं दिये होने चाहिये। परन्तु चरकसंहिता में वक्तव्य विषयों को सामान्य तथा विशेष रूप से न कहकर उसी विषय को संक्षेप एवं विस्तार से तथा वाक्यभेद से बार-बार कहा गया है। इस प्रकार चरकसंहिता का आवापोद्वाप प्रक्रिया द्वारा नवनिबन्धनात्मक संस्करण नहीं किया गया है अपितु मूलग्रन्थ में संक्षेप में आये हुए विषयों को स्पष्ट करने के लिये विस्तार से दे दिया गया है तथा कहीं-कहीं विस्तृत विषयों को ग्रहण एवं धारण के उपयोगी बनाने के लिये संक्षिप्त कर दिया गया है। इस प्रकार चरकाचार्य ने पौनरुक्तय प्रक्रिया द्वारा भी इसका संस्करण किया प्रतीत होता है।


१. १ से २ तक की टि. उपो. संस्कृत पृ. ७३-७४ देखें।

१७ का.सं.