काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 262, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें२४८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
चरकाचार्य उपलब्ध संहिता का स्वतन्त्र रूप से लेखक न होकर आत्रेयसंहितारूप अग्निवेश तन्त्र का प्रतिसंस्कर्ता ही है। इस विषय में निम्न प्रमाण दिये जा सकते हैं।
आत्रेय संहिता के निदान, चिकित्सा आदि स्थानों में प्राय: विषयों के अनुसार ही अध्यायों के नामों का निर्देश किया गया है। इसके विपरीत सूत्र, विमान, शारीर आदि स्थानों में कहीं-कहीं विषयों के अनुसार नाम होने पर भी अध्याय के आदि वाक्य के प्रतीक के अनुसार दीर्घञ्जीवितीय, अपामार्गतण्डुलीय, आरग्वधीय, कतिधापुरुषीय तथा अतुल्यगोत्रीय इत्यादि नाम प्राय: मिलते हैं। आदि-प्रतीक के अनुसार दिये नामों में कई नाम विभक्ति सहित हो दे दिये गये हैं। उन-उन अध्यायों के उपसंहार के संग्रह श्लोकों में भी उन अध्यायों का उन्हीं नामों से उल्लेख किया होने से यह कहा जा सकता है कि इन अध्यायों के नाम पीछे से केवल शिष्य सम्प्रदाय द्वारा ही नहीं रखे गये हैं अपितु मूलग्रन्थकर्ता की लेखनी द्वारा ही लिखे गये हैं। भेडसंहिता में भी सूत्र, विमान, शारीर तथा इन्द्रिय आदि स्थानों में आदिप्रतीक के अनुसार दिये हुए नाम स्वल्प से भेद के साथ इससे समानता रखते हैं। उदाहरणार्थ—
अध्याय के आदि प्रतीक
| अध्याय का नाम | चरक | भेड |
|---|---|---|
| न वेगान्धारणीयः | न वेगान्धारयेद्धीरः | न वेगान्धारयेद्धीमान |
| मात्राशितीयः | मात्राशी स्यादाहारमात्रा | मात्राशी स्याद्विप्रकाशी |
| आत्रेयभद्रकाप्यीयः | आत्रेयो भद्रकाप्यश्च | आत्रेयः खण्डकाप्यश्च |
| यस्य श्यावनिमित्तीयः | यस्य श्यावे परिव्रस्ते | यस्य श्यावे उभे नेत्रे |
| अवाक् शिरसीयः | अवाक्शिरा वा जिह्वा वा | अवाक्शिरा वा जिह्वा बा |
इसी प्रकार आत्रेय तथा भेडसंहिता में इन्द्रियोपक्रमणीय, तिस्रैषणीय, वातकलाकलीय, विधिशोणितीय, दशप्राणायतनीय, दशमूलीय, अष्टोदरीय, रसविमान पुरुषनि(वि)चय, खुड्डिकागर्भाविक्रान्ति तथा जातिसूत्रीय इत्यादि अध्यायों के समान नाम मिलते हैं।
स्नेहन, स्वेदन तथा निदान और चिकित्सा सम्बन्धी अध्यायों के विषयों के अनुसार दिये हुए नामों में अपने आप ही समानता के संभव होने पर भी दोनों ग्रन्थों में एक ही प्रतीक के द्वारा अध्याय के प्रारम्भ होने, विभक्ति युक्त प्रतीक के अनुसार ही अध्यायों के नाम तथा समान नाम वाले अध्यायों में विशेष विषय की समानता होने से एक ही सूत्र के अनुसार (अर्थात् एक ही आचार्य के उपदेश को ग्रहण करके) दो विभिन्न व्यक्तियों द्वारा इनका लिखा जाना संभव है। यदि उन दोनों में परस्पर कोई संबन्ध न हो तथा उन्हें एक ही आचार्य का उपदेश न मिला हो तो दो स्वतन्त्र लेखों में इस प्रकार की समानता सहज नहीं प्रतीत होती। इसलिये ऐसा प्रतीत होता है कि आत्रेय द्वारा उन्हीं प्रतीकों से प्रारम्भ करके उपदिष्ट अध्यायों के वाक्यों एवं विषयों को लेकर अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार उसे बढ़ाकर तथा दूसरे विषयों को सम्मिलित करके भेड तथा अग्निवेश ने पृथक्-पृथक् तन्त्रों का निर्माण किया है। इसीलिये इनमें परस्पर इतनी समानता है। कहीं-कहीं आत्रेय तथा भेडसंहिता में अध्यायों के आदि प्रतीकों के भिन्न होने पर भी अध्यायों के नाम समान ही मिलते हैं। जैसे—
| भेड तथा चरकसंहिता में अध्यायों के नाम | चरक का प्रतीक | भेड का प्रतीक |
|---|---|---|
| व्याधितरूपीयम् | द्वौ पुरुषौ व्याधितरूपौ भवतः | गुरुव्याधिनरः कश्चित् |