काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 263, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद | २४९
| शरीरविचयः | शरीरविचयःशरीरोपकारार्थ | इह खल्वोजस्तेजः |
|---|---|---|
| शरीरसंख्या | 'शरीरख्यामभवयवशः | इह खलुशरीरे षट् त्वचः |
| पूर्वरूपीयम् | पूर्वरूपाण्यसाध्यानां | अन्तर्लोहितकायस्तु |
| गोमयचूर्णीयम् | यस्य गोमयचूर्णाभं | चूर्णं शिरसि यस्यैव |
इनको देखने से प्रतीत होता है कि अग्निवेश ने आत्रेयसंहिता में उन-उन आदि प्रतीकों के अनुसार दिये हुए नाम तथा प्रतीकों को उसी रूप में रखा है तथा भेड ने भी अपने ग्रन्थ में आदि प्रतीक की विभिन्नता होने पर भी अध्यायों के वे ही पूर्वपरम्परागत नाम रखे हैं। दोनों संहिताओं में अध्यायों के नामों या आदि प्रतीकों में जहां समानता मिलती है वह आत्रेय द्वारा दोनों का समान उपदेश दिया जाने के कारण उचित ही है। अग्निवेश संहिता में आये हुए अध्यायों के नाम तथा प्रतीक यदि स्वयं अग्निवेश द्वारा दिये गये हों तो सतीर्थ्य भेड द्वारा उनके अनुसरण किये जाने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता है। और यदि चरकाचार्य ने ही उन प्रतीकों द्वारा प्रारंभ करके चरकसंहिता का स्वयं निर्माण किया हो तो भी उससे प्राचीन समय वाले भेड ने उसका अनुसरण किस प्रकार किया होगा। भेड तथा अग्निवेश दोनों संहिताओं में आठ स्थानों तथा १२० अध्यायों द्वारा संख्या की समानता भी यही प्रकट करती है। भेड संहिता के चतुष्पाद अध्याय में (पृ. १५) 'सिध्यति प्रतिकुर्वाण इत्यात्रेयस्य शासनम्' द्वारा अप्रतीकारवाद का खण्डन करते हुए नामपूर्वक दिये हुए आत्रेय के मत का वर्तमान चरकसंहिता के महाचतुष्पाद अध्याय (सू.अ. १०) में विस्तारपूर्वक मिलने से भी इसकी पुष्टि होती है। इस प्रकार आत्रेय मत के दोनों ग्रन्थों में समानरूप से मिलने से आत्रेय के उपदेश की पूर्वस्थिति स्पष्ट है। चरक तथा भेड दोनों में खुड्डाक चतुष्पाद अध्याय में समानरूप में मिलने वाले मृद्दण्ड चक्र इत्यादि सिद्धान्त श्लोक भी आत्रेय संहिता के ही होने चाहिये। इस प्रकार इन दोनों संहिताओं में समानरूप से मिलने वाले अध्यायों के नाम तथा विषयों को देखकर यह कहा जा सकता है कि इन दोनों में ओतप्रोतरूप में विद्यमान आत्रेयसंहिता इनसे पूर्व ही विद्यमान थी। उसी आत्रेय संहिता तथा उसके विषयों को लेकर आवश्यकतानुसार अपने विचारों से उसे परिवर्धित करके संक्षेपप्रिय भेड ने संक्षिप्त रूप से तथा विस्तारप्रिय अग्निवेश ने विस्तृत रूप से पृथक्-पृथक् तन्त्रों के रूप में उपस्थित किया। भेडसंहिता में चतुष्पाद के विषय में एक ही अध्याय दिया है। इसमें पहले आत्रेय तथा शौनक के विप्रतिपत्तिवाद को देकर आत्रेय के ज्ञानवैशिष्ठ्य का वर्णन किया है। तथा पीछे चतुष्पादों के वर्णन के बाद सिद्धान्तरूप में संक्षेप से भिषक्प्राधान्यवाद का उल्लेख किया है। इसके विपरीत आत्रेयसंहिता में इस विषय में दो अध्याय हैं। इसमें पहले खुड्डाकाध्याय में चतुष्पादों का वर्णन करके भिषक्प्राधान्यवाद को सिद्धान्तरूप से देकर अगले अध्याय (महाचतुष्पाद अध्याय) में मैत्रेय (शौनक) तथा आत्रेय के मतों का पक्ष-प्रतिपक्षरूप से निर्देश किया है। इस प्रकार एक ही विषय एक (भेडसंहिता) में संक्षिप्त रूप में तथा दूसरे (अग्निवेशसंहिता) में विस्तार से दृष्टिगोचर होते हैं। इसी प्रकार अग्निवेश तथा भेडसंहिता में अन्य भी अनेक स्थानों पर कई विषय क्रमशः विस्तार तथा संक्षेप से मिलते हैं।
काश्यप, चरक, भेड तथा सुश्रुत-इस सब संहिताओं में गद्य एवं पद्य दोनों मिलते हैं। टीकाकारों ने क्षारपाणि, जातूकर्ण, पराशर आदि के वाक्यों के भी जहां-जहां उद्धरण दिये हैं वे भी गद्य एवं पद्यमय होने से उनके ग्रन्थ भी गद्य-पद्यमय प्रतीत होते हैं। ज्वरसमुच्चय में केवल एक ज्वर के विषय में काश्यप, आत्रेय, सुश्रुत, हारीत तथा अन्य भी प्राचीन आचार्यों के केवल पद्यमय वाक्य मिलते हैं। इनमें दिये हुए हारीत, क्षारपाणि, जातूकर्ण तथा भेड आदि सतीर्थ्य आचार्यों के वाक्यों को देखने पर प्रतीत होता है कि शब्दों का भेद होने पर भी उनमें एक ही आचार्य का उपदेश समान रूप से झलकता है। भेडसंहिता के समान आत्रेय के अन्य शिष्य जातूकर्ण, हारीत, क्षारपाणि आदियों के भी सम्पूर्ण तन्त्र यदि उपलब्ध हो जायें तथा भेड का भी सम्पूर्ण तन्त्र अखण्डित रूप में मिल जाय तो उन सबकी तुलना करने पर जो अंश एक आचार्य के उपदेशरूप से सब में समान रूप में मिलता हो उतना अंश प्राचीन एवं आत्रेय का समझना चाहिये।