काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
तथा इनमें परस्पर जितना भिन्न अंश है वह उनके अपने-अपने विचार एवं दृष्टिकोण को प्रकट करता है। अथवा संस्कार के कारण प्रतीत होता है। उस अवस्था में अग्निवेश के तन्त्र तथा चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत अंश में भेद करने में भी सुविधा हो जायेगी। इस प्रकार ज्वरसमुच्चय में आये हुए कुछ विषयों में परम्पर समानता को देखकर भी यही प्रतीत होता है कि साथ-साथ अध्ययन करने वाले भिन्न-भिन्न शिष्यों के हृदयों में एक ही आत्रेयरूप आचार्य का उपदेश उन्हें प्रेरणा दे रहा है।
चरकसंहिता के विषय में कुछ लोग कहते हैं कि चरक नाम से प्रसिद्ध संहिता चरकाचार्य की अपनी ही कृति (रचना) है। कुछ लोगों का विचार है कि संक्षेप से विद्यमान पूर्वतन्त्र को पूर्णरूप से परिवर्तित एवं परिवर्धित करके चरकाचार्य ने एक नई ही रचना बना दी है तथा कुछ लोगों का यह भी मत है कि आयुर्वेद के ज्ञाता ऋषियों द्वारा परस्पर एकत्रित होकर किये गये संभाषणों एवं संवादों के सारांश को लेकर चरकाचार्य ने उसे चरकसंहिता के रूप में उपस्थित किया (वसुमती वर्ष ९ पृष्ठ ३७८)—इत्यादि अनेक विभिन्न मत दिखाई देते हैं। परन्तु पूर्वोक्त वर्णन के अनुसार मूलभूत आत्रेयसंहिता तथा उसी के आधार पर बनाये हुए अग्निवेश-तन्त्र की पूर्व स्थिति का स्पष्ट ज्ञान होने से, तथा 'अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते' चरक की इस स्पष्टोक्ति के आधार पर यह कहा जा सकता है कि तन्त्र का रचयिता अग्निवेश ही है तथा चरक ने तो दूसरे तन्त्रों तथा अपने विचार के अनुसार कुछ अन्य उपयोगी विषयों द्वारा उसे बढ़ाकर तथा अन्य भी संस्कारोपयोगी विशेषताओं को उसमें मिलाकर इस अग्निवेशतन्त्र का प्रतिसंस्कार ही किया है। यदि चरक ही स्वयं इस तन्त्र का रचयिता होता तो वह उस रूप में अपने नाम का उल्लेख क्यों न करता। ग्रन्थ में संबोधन आदि के रूप में अग्निवेश का नाम अनेक स्थानों पर मिलता है, परन्तु चरक का नाम 'चरकप्रतिसंस्कृते' इस उल्लेख के अतिरिक्त ग्रन्थ में और कहीं नहीं मिलता है। चरक के उत्तर भाग को पूर्ण करने वाले दृढ़बल ने भी निम्न श्लोक के द्वारा चरक का केवल संस्कर्ता के रूप में तथा द्वादशसाहस्रसंहिता का अग्निवेश की कृति के रूप में स्पष्ट निर्देश किया है—
अतस्तन्त्रोत्तममिदं चरकेणातिबुद्धिना । संस्कृतं तत्तु संसृष्टं विभागेनोपलक्ष्यते ।।
यस्य द्वादशसाहस्री हृदि तिष्ठति संहिता । चिकित्सा वह्निवेशस्य स्वस्थातुरहितं प्रति ।।
यदि चरक ही इस ग्रन्थ का रचयिता होता तो उसके बाद का तथा उसके ग्रन्थ को पूर्ण करने वाला दृढ़बल भी अग्निवेश को ही ग्रन्थकर्ता तथा चरक को संस्कर्ता के रूप में क्यों निर्देश करता। संभवतः सब जगह घूमने फिरने की प्रकृति के कारण अन्वर्थ चरक संज्ञा वाले किसी आचार्य द्वारा इस ग्रन्थ का संस्करण करके उसका प्रचार, प्रवचन, प्रयोगकुशलता तथा लोकोपकार के लिये प्रवृत्त होने के कारण उस संहिता की चरक नाम से प्रसिद्धि हो गई होगी। इसी प्रसिद्धि के कारण चरकाचार्य के विषय में ग्रन्थ का कर्ता होने की भ्रान्ति उत्पन्न हो गई प्रतीत होती है।
इस प्रकार दृढ़बल की संस्करण की पूर्वोक्त परिभाषा के अनुसार स्थान-स्थान पर कुछ पद, वाक्य तथा सन्दर्भ चरकाचार्य की लेखनी से भी अनुप्रविष्ट हो सकते हैं। चरकसंहिता का सामान्यरूप से अनुसन्धान करने पर कुछ इस प्रकार के विषय चरकाचार्य की लेखनी से लिखे गये प्रतीत होते हैं। उदाहरण के लिये चरकसंहिता में निर्दिष्ट वाद-विवाद के विषय में दिखाई देनेवाली अर्वाचीन विकसित अवस्था चरक के समय की प्रतीत होती है जैसा कि पूर्व निर्देश किया जा चुका है।
स्वेदप्रकरण में भेडसंहिता में सङ्करस्वेद, प्रस्तरस्वेद आदि आठ स्वेदों का ही उल्लेख किया गया है। उपलब्ध चरकसंहिता में भेडोल्लिखित आठ भेदों के अतिरिक्त पांच भेद और मिलाकर १३ (तेरह) स्वेदों का निर्देश मिलता है। यदि ये तेरह भेद आत्रेय द्वारा ही उपदिष्ट होते तो आत्रेय की अनुगामी भेडसंहिता में भी ये तेरह भेद ही मिलने चाहिये।