काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २५१
काश्यपसंहिता में भी आठ ही भेदों के मिलने से प्रतीत होता है कि प्राचीन समय में आठ विभाग ही थे। प्राचीन आठ विभागों के साथ जोड़े हुए दूसरे भेदों में जेन्ताक तथा होलाक शब्द के सर्वथा भिन्न प्रतीत होने से पूर्वोक्त आठ भेदों के साथ अन्य पांच भेदों को मिलाकर तेरह भेदों का वर्णन करना चरकाचार्य की विकासदृष्टि को प्रकट करता है।
भेडसंहिता में खुड्डीकागर्भावक्रान्ति के विषय में एक ही अध्याय है। उसमें गर्भ को मातृज तथा पितृज न मानने रूप भरद्वाज के मत का खण्डन करके उस मत की स्थापना करते हुए आत्रेय के मत का निर्देश किया है। चरक के खुड्डीकाध्याय में भी वही विषय है। इस प्रकार दोनों में समानता देखकर यह कहा जा सकता है कि अग्निवेश संहिता में आया हुआ यही आत्रेय का मत है। परन्तु चरक में उसके बाद दूसरा महागर्भावक्रान्त्यध्याय है। उसमें गर्भ संबन्धी अन्य विषयों का निरूपण किया गया है। इन विषयों के भेडसंहिता में न मिलने से इसे बाद में चरक के समय का विकास कहा जा सकता है। अथवा यह भी सम्भावना हो सकती है कि खुड्डीका पद के दिये होने से महागर्भावक्रान्ति अध्याय भी पहले से ही अग्निवेश संहिता में हो तथा भेडसंहिता में वह कालक्रम से खण्डित (लुप्त) हो गया हो।
वर्तमान चरकसंहिता के उपक्रम में ऋषियों के समुदाय में इन्द्र द्वारा प्राप्त आयुर्वेद विद्या के भरद्वाज द्वारा प्रकाशन से तथा आत्रेय द्वारा उस विद्या को भरद्वाज से प्राप्त करने का उल्लेख न होने पर भी आत्रेय के शिष्य अग्निवेश आदि द्वारा तन्त्र के निर्माण तथा उन अग्निवेश आदि के तन्त्रों की लोक में प्रसिद्धि का निर्देश अग्निवेश की अपेक्षा अपने संस्करण की उत्कृष्टता दिखाने के लिये चरक द्वारा अधिक उचित प्रतीत होने से, अग्निवेश द्वारा बाद में कहीं भी भारद्वाज से इस विद्या की प्राप्ति का निर्देश न होने से, प्रत्युत भारद्वाज के मत का खण्डन करने से तथा भारद्वाज के विषय में विशेष कुछ भी निर्देश न करने से प्रतीत होता है कि ‘अथातो दीर्घञ्जीवितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः, इति ह स्माह भगवानात्रेयः’ इन दो वाक्यों के बाद सीधा ‘हिताहितं सुखं दुःखम्’ से अग्निवेशतन्त्र का प्रारम्भ हुआ है तथा इनके बीच का अवतरणिकांश सम्भवतः चरकाचार्य ने पूरा किया है। ‘हिताहितम्’ इत्यादि वाक्य में दीखने वाली प्राचीन ग्रन्थ की प्रौढता का इससे पूर्व के वाक्यों में न मिलना भी इसी बात को प्रकट करता है।
वर्तमान चरकसंहिता तथा भेडसंहिता के ‘नवेगान्नधारणीय’ अध्यायों की तुलना में हम देखते हैं कि चरकसंहिता में वेगों के निरोध के औचित्य एवं अनौचित्य सम्बन्धी विषय को ही दिया है। इसके विपरीत भेडसंहिता में अध्याय के आदि तथा अन्त में उस विषय के होने पर भी बीच में दन्ताधावन, धूमवर्ती आदि अन्य विषय दिये हुए हैं। इस प्रकार अग्निवेश संहिता में सन्दर्भशुद्धि तथा भेडसंहिता में लेख, रचना अथवा उपलब्ध ग्रन्थ की विकृति के कारण अशुद्धि प्रतीत होती है।
नावनीतक नामक ग्रन्थ में आत्रेय के नाम से दिये हुए बहुत से योग एवं ओषधियों के चरकसंहिता में मिलने पर भी दो तीन ओषधियों के न मिलने से तथा चक्रपाणि शिवदास आदि द्वारा अग्निवेश के नाम से उद्धृत कुछ श्लोकों का चरकसंहिता में न मिलने से अग्निवेश संहिता में से संस्करण के अवसर पर कुछ अंश निकाल दिया गया प्रतीत होता है।
इसी प्रकार भेडसंहिता तथा अग्निवेशतन्त्र को सामने रखकर प्रत्येक विषय में तुलना करने पर अन्य भी बहुत से स्थलों पर विभेद दृष्टिगोचर होते हैं।
चरकसंहिता में अध्यायों के बीच-बीच में भी स्थान-स्थान पर आये हुए गद्यवाक्यों के संक्षेप एवं विस्तार के लिये कहीं पद्य तथा कहीं गद्य रूप में भी संग्रह एवं विग्रह रूप मिलता है। बीच-बीच में भी ‘भवन्ति चात्र’ ‘अत्र श्लोकाः’ इत्यादि द्वारा कहीं संक्षेप के लिये तथा कहीं उपपादक अर्थ को सूचित करने के लिये पद्य (श्लोक) दिये हैं तथा प्रत्येक अध्याय के अन्त में भी ‘अत्र श्लोकाः’ द्वारा अध्याय के विषयको श्लोकों में दिया हुआ है। संक्षिप्त लेख के ग्रहण