भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२५२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

सौकर्य (आराम से समझने) के लिये विस्तृत रूप देना तथा विस्तृत लेख के धारणसौकर्य (याद करने) के लिये संक्षिप्त रूप में देने की प्रणाली प्राचीन आचार्यों के लेखों में भी मिलती है। व्याकरण महाभाष्यकार की भी यही शैली है। कुसुमाञ्जलि आदि में कारिकाओं के प्रतिपाद्य विषयों का पूरणिका रूप में गद्यवाक्यों द्वारा विशदीकरण (स्पष्टीकरण) दिया गया है तथा शास्त्रदीपिका भामती आदि में इसके विपरीत विस्तृत भावों को संक्षेप से कारिका रूप में दिया गया है। सुश्रुत तथा काश्यपसंहिता में भी स्थान-स्थान पर संग्रह तथा विग्रह (संक्षेप और विस्तार) से वर्णन मिलता है। इस प्रकार एक ही विषय को संक्षेप एवं विस्तार दोनों प्रकार से निरूपण करना मूल आचार्य के द्वारा भी सम्भव हो सकता है। किसी एक प्रकार से कही हुई पूर्व आचार्य की उक्ति को पीछे संस्कर्ता द्वारा किसी दूसरी प्रकार भी कहा जा सकता है। चरक संहिता के निम्न श्लोक द्वारा यह स्पष्ट कहा गया है कि गहन विषयों का अन्तर्दृष्टि होकर ज्ञान प्राप्त करने के लिये इस प्रकार के संक्षेप एवं विस्ताररूप उक्तिभेद में पुनरुक्ति दोष नहीं होता है—

गद्योक्तो १ यः पुनः श्लोकैरर्थः समनुगीयते। तद्व्यक्तिव्यवसायार्थं द्विरुक्तं तन्न गर्ह्यते ।।

इस प्रकार संक्षेप तथा विस्तार द्वारा की गई रचना “प्रौढिर्व्याससमासौ च” २ के अनुसार पुनरुक्ति दोष नहीं है अपितु गुण है।

इसी प्रकार चरकाचार्य ने अग्निवेश तन्त्र के एक-एक वाक्य को लेकर कहीं उसे पूरा करने के लिये, कहीं संक्षेप एवं विस्तार के लिये तथा कहीं ग्रहण एवं धारण में उपयोगी बनाने के लिये, उसे पूर्ण करने तथा बढ़ाने की दृष्टि से अपने कुछ वाक्य तथा पद आदि सम्मिलित करके मूल आचार्य तथा अपने वाक्यों को तिलतण्डुल रूप में मिलाकर प्रतिसंस्करण किया है। जिस प्रकार भारत ग्रन्थ में अनेक कथानक, वैशम्पायन आदि के प्रश्नोत्तर आदि पूरणिका वाक्य तथा आदि और अन्त में उपक्रम तथा उपसंहार ग्रन्थों को जोड़कर उसे महाभारत का रूप दे दिया गया है इसी प्रकार चरक ने भी ऐसा ही संस्करण करके इसे दूसरे परिमार्जित रूप में उपस्थित कर दिया है। इसलिये मूलग्रन्थ के परवश होने के कारण मूलग्रन्थ में जैसा विषय का पौर्वापर्यक्रम था, प्रतिसंस्कृत ग्रन्थ में भी वैसा हो होने से सुश्रुतसंहिता की अपेक्षा चरकसंहिता में ग्रन्थ का विषय अधिक विशृङ्खलित मिलता है। इस प्रकार चरक ने भी उसे ठीक नहीं किया। यदि वह स्वतन्त्ररूप से चरकसंहिता की रचना करता हो इतना प्रौढ विद्वान् होकर भी क्या इस पौर्वापर्यक्रमरूप सन्दर्भ शुद्धि को ठीक न करता। समास एवं व्यासरूप में पुनरुक्त प्रकीर्ण विषय को संकलित करते हुए भी उसने इस दोष को दूर क्यों नहीं किया। ज्वरसमुच्चय में आश्विन, भारद्वाज आदि के वचनों के मिलने से उनकी संहिताओं से भी विषयों को संग्रह करके इस संस्करण में चरकाचार्य ने संभवतः दिये हों। इस प्रकार बहुत प्रयत्न एवं परिश्रम से प्रतिसंस्कृत करके इस प्राचीन संहिता को चरक ने अनेक विषयों से युक्त कर दिया है। इसीलिये इस संहिता के अन्त में दृढ़बल ने इस संहिता के ज्ञान से ही दूसरे तन्त्रों के ज्ञान तथा इसकी महत्ता का निर्देश करते हुए कहा है कि यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्'। उपर्युक्त गुणों के कारण तथा अन्वर्थक चरक नाम के अनुरूप सब जगह घूम-घूम कर प्रचार करने के कारण अन्तरङ्ग दृष्टि से ग्रन्थ के आत्रेय तथा अग्निवेश संहिता रूप होने पर भी बहिरङ्ग दृष्टि से वर्तमान संहिता की चरक संहिता नाम से ही प्रसिद्धि है।

भेडसंहिता में भी उतने ही अध्यायों के होने से तथा इस ग्रन्थ (चरकसंहिता) में भी एक सौ बीस ३ अध्याय तथा आठ स्थानों का आत्रेय तथा अग्निवेश द्वारा उपदेश किया होने से प्रतीत होता है कि इस सम्पूर्ण ग्रन्थ के अपस्मार प्रकरण से अगले भाग के कालवशात् लुप्त हो जाने से तथा चरक के समय भी उसका संस्करण न होने से पीछे आत्रेय द्वारा उपदिष्ट हारीत आदि के ग्रन्थों से विषयों को लेकर संभवतः दृढ़बल ने इसकी पूर्ति की है। पीछे से पूरा किये हुए उतने अंश में विभिन्न पद्यप्रायः लेख का होना भी इसी का समर्थन करता है।


१. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ७७-७८ देखें।