काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
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अग्निवेश के नाम से चक्रपाणि तथा शिवदास आदि द्वारा उद्धृत वचनों के मिलने से प्रतीत होता है कि संभवतः उस समय तक अग्निवेशतन्त्र उपलब्ध था। परन्तु उस अवस्था में दृढबल के समय भी अग्निवेशतन्त्र से ही शेष भाग की पूर्ति न करके 'शिलोञ्छवृत्ति¹ द्वारा अन्य तन्त्रों से विषयों को एकत्रित करके दृढबल द्वारा चिकित्सास्थान के अन्तिम १७ अध्याय तथा सिद्धि और कल्पस्थान की पूर्ति करने में क्या हेतु है ? अग्निवेशतन्त्र से पूर्ति न करके अन्य तन्त्रों से पूर्ति करने का उल्लेख दृढबल ने स्वयं किया है। लगभग एक हजार वर्ष पूर्व लिखित एवं उससे प्राचीन ज्वरसमुच्चय में चरक के वचनों के मिलने तथा अग्निवेश के वचनों के न मिलने से, वाग्भट आदि द्वारा भी चरक का ही उल्लेख होने से तथा खलीफा हारूंरशीद के समय भी इसी चरकसंहिता का ही अनुवाद होने से प्रतीत होता है कि वाग्भट तथा दृढबल आदि के समय से पूर्व ही अग्निवेश का तन्त्र विलुप्त हो चुका था। चक्रपाणि तथा शिवदास आदि के समय तक यदि अग्निवेशतन्त्र मिलता होता तो भिन्न-भिन्न विषयों में अग्निवेश तथा चरक की समानताओं तथा विषमताओं का अनेक स्थानों पर वर्णन होना चाहिये था। परन्तु इसके विपरीत यहां अग्निवेश के कुछ ही वचनों के उद्धरण दिये होने से प्रतीत होता है कि ये उद्धरण प्राचीन निबन्ध एवं टीकाओं से दिये गये हैं।
सुश्रुतसंहिता के संस्करण के विषय में ग्रन्थ में कहीं भी स्पष्टरूप से उल्लेख नहीं है। केवल 'प्रतिसंस्कर्ताऽपीह नागार्जुनः' डल्हण के इस निर्देश के अनुसार ही कुछ लोग नागार्जुन को इसका प्रतिसंस्कर्ता मानते हैं। नागार्जुन को भी प्रतिसंस्कर्ता मानने पर सुश्रुत उससे प्राचीन सिद्ध होता है। परन्तु नागार्जुन के वर्तमान सुश्रुतसंहिता का प्रतिसंस्कर्ता होने में कोई प्रबल प्रमाण नहीं मिलता है। यदि वह प्रतिसंस्कर्ता होता तो चरक के 'अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते' उल्लेख की तरह वह भी अपना प्रतिसंस्कर्ता के रूप में उल्लेख क्यों न करता ? आर्य नागार्जुन तथा दूसरे किसी नागार्जुन के विषय में भी अन्य ग्रन्थों में शल्यतन्त्र के विषय में कहीं उल्लेख नहीं मिलता। आर्य नागार्जुन के उपायहृदय में सुश्रुत का नाम दिया होने पर भी पूर्वनिर्दिष्ट भैषज्यविद्या के प्रकरण में शल्यतन्त्र का पृथक् निर्देश नहीं मिलता है। तथा यह भी विचारणीय है कि शान्तिप्रधान बौद्धमार्गानुयायी तथा बोधिसत्व विद्वान् होने के कारण शस्त्रसाध्य शल्य चिकित्सा में उसकी रुचि (प्रवृत्ति) किस प्रकार हो सकती थी। आर्य नागार्जुन या तान्त्रिक नागार्जुन द्वारा यदि इसका संस्करण किया जाता तो उसमें स्वाभाविकरूप से बौद्धमत की छाया अवश्य होती। इस ग्रन्थ में कहीं नाम मात्र को भी बौद्ध छाया नहीं मिलती है अपितु निम्न श्लोक के द्वारा स्थान-स्थान पर राम तथा कृष्ण की महिमा, वैदिक मन्त्रों के प्रयोग तथा सांख्य दर्शन के अनुसार अध्यात्म का विषय दिया हुआ है—
महेन्द्ररामकृष्णानां ब्राह्मणानां गवांमपि । तपसा तेजसा वाऽपि प्रशाम्यध्वं शिवाय वै ।।
इस प्रकार नागार्जुन को सुश्रुत का प्रतिसंस्कर्ता सिद्ध करने के लिये अन्य बलवान् प्रमाणों की अपेक्षा है। बहुत से प्राच्य एवं पाश्चात्य विद्वानों की सम्मति है कि वर्तमान समय में सुश्रुत का पुनः संस्करण ही मिलता है। कहीं-कहीं अर्वाचीन विषयों के मिलने से मेरी भी यही राय है कि इसका संस्करण हुआ है। परन्तु इस संस्करण में चरकसंहिता की तरह पुनरुक्तियां नहीं मिलती हैं। इसमें संस्कर्ता तथा उत्तर भाग के लेखक का यद्यपि स्पष्ट उल्लेख नहीं है, परन्तु मेरे पास ६३३ नेवार (नेपाली) संवत् में लिखित ताडपत्रीय सुश्रुत है उसकी पुष्पिका (समाप्ति भाग) में पूर्वभाग में 'सुश्रुते शल्यतन्त्रे' ऐसा उल्लेख है तथा उत्तरतन्त्र के अन्त में 'इति सौश्रुते महोत्तरतन्त्रे चतुःषष्टितमोऽध्यायः, अतो निघण्टुर्भाविष्यति इति' तथा उस निघण्ट भाग के समाप्त होने पर—सौश्रुत्यां संहितायां महोत्तरायां निघण्टुः समाप्तः' उल्लेख मिलता है। यद्यपि 'इदम्' अर्थ प्रत्ययान्त सौश्रुत शब्द से सुश्रुत के ग्रन्थ का भी ग्रहण को सकता
१. जिस प्रकार पक्षी जाति भिन्न-भिन्न स्थानों से छोटे कणों को बीन-बीन कर संग्रह करते हैं उसी प्रकार भिन्न-भिन्न ग्रन्थों से जब थोड़ा-थोड़ा अंश संग्रह करके किसी विषय को पूरा किया जाय तब यह शब्द व्यवहृत होता है। (अनुवादक)