काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
है तथापि पूर्व तथा अपर ग्रन्थ के भाग में लेख की एक ही शैली के औचित्य को दृष्टि में रखते हुए पूर्वभाग में सुश्रुत शब्द तथा उत्तर भाग में भिन्न ही सौश्रुत शब्द से निर्देश होने के कारण पूर्व भाग सुश्रुत-लिखित है तथा उत्तर भाग उसी के वंश वाले किसी अन्य (सौश्रुत) व्यक्ति द्वारा लिखित प्रतीत होता है। निघण्टु भाग के उपक्रम में दिवोदास के उपदेश का उल्लेख होने पर भी मूल आचार्य के एक होने से यह ग्रन्थ भी मूल ग्रन्थ ही है, इसको सिद्ध करने के लिये संभवतः दिवोदास का निर्देश किया हो तथा निघण्टु भाग में आये हुए लेख में कुछ विकसित अवस्था होने से तथा उत्तर भाग के शब्दों के विशेष रूप से मिलने से यह निघण्टु भाग भी संभवतः सौश्रुत का है। अपूर्ण अंश को पूर्ण करने की दृष्टि से इसमें उत्तरतन्त्र सम्मिलित करने वाले सौश्रुताचार्य ने पूर्वभाग में भी संभवतः कुछ संस्करण किया हो। महाभाष्यकार द्वारा सौश्रुतशब्द से युक्त उदाहरण के देने से सौश्रुतों की भी पहले से प्रसिद्धि का बोध होता है। सुश्रुत के वंश वाले शल्यविद्या के पण्डित सौश्रुतों का राजाओं के साथ सम्बन्ध होने के कारण ही अत्यन्त प्राचीन काल से 'सौश्रुतपार्थिवाः' उदाहरण प्रसिद्ध है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सुश्रुत के वंश वाले या उसके किसी शिष्य (सौश्रुताचार्य) ने पूर्वभाग का संस्करण करके उत्तरतन्त्र और निघण्टु भाग उसमें पीछे से सम्मिलित कर दिया है।
पूर्व आचार्य की संहिता के उपलब्ध होने पर भी अन्य आचार्यों के ग्रन्थों में मिलने वाली विशेषताओं को लेकर पूर्व संहिता की कमियों को दूर करके उसे सर्वाङ्ग पूर्ण बनाने की दृष्टि से पीछे से पूर्ववर्ती दिवोदास की संहिता को लेकर उसमें अन्य ग्रन्थों के विषयों की संस्कर्ता ने उत्तरतन्त्र के रूप में सम्मिलित किया प्रतीत होता है। स्वयं ग्रन्थ कर्ता की उक्ति से स्पष्ट है कि उत्तरतन्त्र का विषय विदेहाधिप आदि के शालाक्यतन्त्र से संबन्धित है। सुश्रुतसंहिता के उत्तरभाग में कौमारभृत्य के प्रकरण में अन्य आचार्यों का निर्देश करते हुए मूल में यद्यपि 'कुमाराबाधहेतुभिः' द्वारा सामान्य उल्लेख होने पर भी टीकाकारों द्वारा पार्वतक बन्धक जीव आदि का निर्देश किया जाने से तथा जीवक के इस कौमारभृत्य विषयक ग्रन्थ के मिल जाने से संभवतः उस प्रकरण में काश्यप तथा जीवक के विषयों को भी उत्तरतन्त्र में सम्मिलित कर दिया गया है।
सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में रसभेद विषयक ६४ अध्याय तथा दोषभेदविषयक अन्तिम (६६) अध्याय के बीच में ६५ वां तन्त्रयुक्तियों का अध्याय है। कौटिलीय अर्थशास्त्र में तन्त्रयुक्तियों का अन्तिम अध्याय है। इनकी तुलना करने पर हम देखते हैं कि दोनों में अधिकरण से प्रारंभ करके ऊह्य पर्यन्त ३२ युक्तियां दी हुई है। तथा बीच में भी उद्देश, निर्देश, उपदेश, अपदेश, प्रदेश, अतिदेश आदि तथा अन्य ग्रन्थों में न आये हुए भेदों तथा अन्य भी पदार्थों में (अपने-अपने वैद्यक तथा नैतिक विषयों को छोड़कर) परस्पर समानता को देखकर एक की दूसरे पर छाया प्रतीत होती है। इनमें किसकी किस पर छाया है इस विषय में परस्पर विचार करने पर हम देखते हैं कि कौटिलीय अर्थशास्त्र में औपनिषदाधिकरण की समाप्ति पर ग्रन्थ के अन्त में तन्त्रयुक्तियां दी हुई हैं। इसी प्रकार सुश्रुत के उत्तरतन्त्र में भी साथ-साथ दिये जाने योग्य रसभेद तथा दोषभेद प्रकरण के बीच में तन्त्रयुक्तियों के अध्याय के दिये होने से पूर्वापर सङ्गति को देखकर यह कहा जा सकता है कि यह किसी दूसरे ग्रन्थ को देखकर किया गया है अथवा संस्करण के समय भी यह अनुप्रवेश संभव है। चरक संहिता में भी ग्रन्थ के अन्त में ही तन्त्रयुक्तियों का विषय दिया हुआ है, जो कि दृढ़बल द्वारा पूरित भाग में है। बाद में मिलाये हुए उत्तरतन्त्र में भी पूर्वभाग की तरह इसकी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिये धन्वन्तरि की उक्तिरूप 'यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः' वाक्य लेखक ने संभवतः स्वयं जोड़ दिया है। इस प्रकार सुश्रुत संहिता में पीछे सम्मिलित किये हुए विषयों को मूलग्रन्थ के आगे उत्तरतन्तरूप में पृथक् जोड़ दिया गया है। चरक के समान मूल ग्रन्थ के साथ ही विषय को मिलाकर परस्पर एकाकार नहीं कर दिया गया है। इससे संहिता में संग्रह किये हुए नवीन तथा प्राचीन विषयों में परस्पर सुगमता से भेद किया जा सकता है। मुद्रित सुश्रुतसंहिता में प्रथम अध्याय के अन्त में 'सविंशमध्यायशतं पञ्चसु स्थानेषु संविभज्य उत्तरे तन्त्रे शेषानर्थान् व्याख्यास्यामः' इस पाठ के मिलने से