भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

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पूर्वसंहिता के समय उत्तरतन्त्र की भी उपस्थिति प्रतीत होने से दोनों भाग एक ही समय के होने चाहिये। परन्तु मेरे संग्रहालय में विद्यमान प्राचीनताडपत्र पर लिखे हुए सुश्रुत में स्थान-स्थान पर बहुत से पाठभेद मिलते हैं। यहां भी '..... संविभज्य उत्तरे व्याख्यास्याः' यह पाठ मिलता है। इस पाठ के अनुसार १२० अध्यायों को पांच स्थानों में विभक्त करके फिर आगे व्याख्या करेंगे, इतना ही ग्रन्थ का आशय है। इससे उत्तरतन्त्र का निर्देश नहीं मिलता है। तृतीय अध्याय के प्रारंभ में अध्यायों की गणना करते हुए मुद्रित पुस्तक में दिया हुआ 'तदुत्तरं षट्षष्टिः' यह पाठ भी ताडपुस्तक में नहीं मिलता है। किन्तु उत्तरतन्त्र के अध्यायों के विषयों को सूचित करने वाले 'अतः परं स्वनाम्नैव तन्त्रमुत्तरमुच्यते' से प्रारंभ करके 'विधिनाऽधीत्य युञ्जाना भवन्ति प्राणदा भुवि' इत्यादि श्लोक तो ताडपुस्तक में भी मिलते हैं। पीछे उत्तरतन्त्र के जोड़ने के बाद उसके विषयों की सूची वाले ये श्लोक भी संभवतः पीछे से अनुप्रविष्ट हो गये हों।

वृद्धजीवकीय तन्त्र के विषय में तो यह कहा जा सकता है कि प्राचीन काश्यप संहिता के बहुत विस्तृत होने से वृद्धजीवक द्वारा उसको संक्षिप्त करके तन्त्र बनाने का उल्लेख संहिता के कल्पाध्याय में मिलता है इसलिये जिस रूप में काश्यपसंहिता थी उसी रूप में वृद्धजीवकीय तन्त्र नहीं है अपितु अन्य संक्षिप्त रचना के कारण स्पष्टरूप से उसका रूपान्तर हो चुका है। परन्तु वृद्धजीवक ने भी संक्षेप करते हुए मूलसंहिता की उपेक्षा करके स्वतन्त्र रचना नहीं की हैं अपितु उसीके उपदेशरूप वाक्यों तथा विषयों को ही लेकर विस्तृत अंशों को छोड़कर उसी का केवल संक्षिप्तंरूप कर दिया है जैसा कि उसके लेख से प्रतीत होता है।

काश्यपसंहिता के पूर्वभाग तथा खिलभाग में भी आदि से अन्त तक प्रत्येक अध्याय में इत्याह भगवान् कश्यपः' 'इति ह स्माह भगवान् कश्यपः' इत्यादि वाक्यों के समान रूप से मिलने पर भी ग्रन्थ के अन्दर आये हुए सब विषय कश्यप के ही हों, ऐसी बात नहीं है अपितु सिद्धान्त तथा उपदेश वाक्य ही केवल कश्यप के है तथा बीच में उस विषय के लिये दिये हुए पूरणिका रूप से उपक्रम तथा उपसंहार वाक्य पीछे से वृद्धजीवक द्वारा तन्त्र बनाते समय भी संभवतः दे दिये गये हों। सब अध्यायों के आदि तथा अन्त में 'इत्याह कश्यपः' यह पद तो जीवक ने संभवतः इसलिए दे दिया है कि लोग इस सारे विषय को उसकी कपोलकल्पना न समझकर काश्यपसंहिता के साररूप में ही जानकर इसे प्रामाणिक मानें। काश्यपसंहिता के पूर्वभाग में 'साहसादतिबालस्य सर्वं नेच्छन्ति कश्यपः' 'मज्जवस्योस्तु मण्डं सर्वेषां कश्यपः पूर्वम्' 'अथ कश्यपोऽब्रवीत् सर्वमप्येतदसम्ब्यक्, इत्यादि स्थलों में तथा खिलभाग में भी 'पाययेदिति कश्यपः' 'यथास्वमिति कश्यपः' 'पेय इति ह स्माह कश्यपः' इत्यादि स्थलों में पुनः कश्यप शब्द का उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि जीवक द्वारा कश्यप के सिद्धान्तों का अर्थानुवाद किया गया है अथवा वृद्धजीवक के उपदेशक मारीच कश्यप ने भी प्राचीन कश्यपपरम्परा को सूचित करने के लिये स्थान-स्थान पर 'इति कश्यपः' पद दिया है। अस्तु, 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' के अनुसार इसमें आई हुई सब सिद्धान्त आदि उक्तियां कश्यप की ही प्रतीत होती हैं। मनुस्मृति आदि प्राचीन ग्रन्थों में शिष्य भृगु ने मनु के तथा सामश्रव आदि ने याज्ञवल्क्य के उपदेशों को शब्दरूप तथा भावरूप में ग्रहण करके तथा उसे पूर्ण करके बनाई हुई संहिताओं के मनुसंहिता तथा याज्ञवल्क्यसंहिता आदि नाम रखे हैं। यहां भी इसी प्राचीन आर्ष शैली का अनुसरण किया गया प्रतीत होता है। पूर्वसम्प्रदायों का उल्लेख करते हुए कश्यप के समान उसके पुत्र काश्यपों का निर्देश होने पर भी प्रत्येक अध्याय के उपक्रम तथा उपसंहार में 'इति ह स्माह कश्यपः' तथा ग्रन्थ के मध्य में भी स्थान-स्थान पर 'कश्यपोऽब्रवीत्' 'इति कश्यपः' आदि द्वारा कश्यप शब्द से ही आचार्य का उल्लेख किया है।

इस संहिता में दो भाग हैं। कल्पस्थान तक पूर्वभाग तथा उसके बाद खिलभाग। दोनों ही भागों में प्रत्येक अध्याय के उपक्रम तथा उपसंहार में कश्यप के उपदेश रूप में 'इत्याह कश्यपः' पद मिलता है। ज्वरसमुच्चय में कश्यप नाम से दिये हुए वचन इस संहिता के पूर्वभाग तथा उत्तर भाग दोनों में मिलते हैं। पूर्वभाग में सर्वत्र कश्यप के शिष्य रूप