काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 270, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २५६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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में जीवक का तथा उत्तरभाग में भी अधिकांश रूप में जीवक का तथा कहीं-कहीं किसी अन्य व्यक्ति का भी उल्लेख मिलता है। इसमें पूर्व तथा उत्तर भाग में एक ही उपदेश को सूचित करने वाले परस्पर संयोजक वाक्य दोनों भागों में मिलते$^१$ हैं।
इस प्रकार पूर्व एवं उत्तर दोनों भागों के परस्पर संबद्ध होने से एक से एक शरीर रूप से बना हुआ यह ग्रन्थ आपाततः कश्यसंहिता रूप ही प्रतीत होता है। परन्तु पूर्वभाग के अन्त में पूर्वग्रन्थ के उपसंहार रूप में ग्रन्थ की समाप्ति का निर्देश करने वाला कल्पाध्याय दिया हुआ है। उपसंहार को ग्रन्थ के अन्त में होना चाहिये। आत्रेय तथा भेड की प्राचीन संहिताएँ सूत्र, निदान आदि आठ स्थानों तथा १२० अध्यायों में पूर्ण हुई मिलती हैं। उसी के अनुसार यहां काश्यपसंहिता में भी पूर्वभाग में ही आठ स्थान तथा १२० अध्याय पूरे हो जाते हैं। इस संहिता के कल्पाध्याय के निम्न श्लोक के अनुसार भी इसके आठ विभाग दृष्टिगोचर होते हैं—
सूत्रस्थाननिदानानि विमानान्यात्मनिश्चयः । इन्द्रियाणि चिकित्सा च सिद्धिः कल्पाश्च संहिता ।।
इसके बाद अन्त में 'समाप्ता चेयं संहिता, अतः परं खिलस्थानं भविष्यति' यह संहिता की समाप्ति का सूचक पुष्पिकावाक्य भी दिया हुआ मिलता है। इस प्रकार आठ स्थानों तथा १२० अध्यायों वाला यह पूर्वभाग ही वृद्धजीवक द्वारा संक्षिप्त की हुई काश्यपसंहिता प्रतीत होती है।
उसके बाद पूर्वभाग में अनुक्त विषयों को (तथा पूर्वभाग में आये हुए विषयों को भी विकसित रूप में) इधर-उधर से कुछ आवश्यक एवं प्रकीर्ण विषयों को संग्रह करके पूर्वभागोक्त क्रम को विना ध्यान में रखे ही, सुश्रुत में १२० अध्याय वाली पूर्वसंहिता के बाद उत्तरतन्त्र के समान ८० अध्याय वाला खिलभाग पीछे से जोड़ा गया प्रतीत होता है।
मेघदूत आदि कुछ ग्रन्थों में, स्वयं लेखक द्वारा कथांश को दो भागों में विभक्त करके पूर्व एवं उत्तर भाग के दिये होने से सब जगह यद्यपि ऐसा नियम नहीं बनाया जा सकता तथापि कादम्बरी और दशकुमारचरित आदि में पूर्व एवं उत्तरभाग में रचना का भेद तथा कहीं-कहीं लेखक के भी भेद का स्पष्ट उल्लेख किया है। इन ग्रन्थों में उसके बाद में पूरे किये हुए भाग का केवल उत्तरभाग नाम से ही निर्देश किया गया है। ग्रन्थ का नाम तो सम्पूर्ण ग्रन्थ के अनुसार, कादम्बरी, दशकुमारचरित आदि एक ही है। कुछ विद्वानों का विचार है कि रामायण में भी राम के घर पर कुश तथा लव द्वारा गाये हुए भाग के पश्चात् का अंश बाद में पूरा करके जोड़ा गया है। उस भाग का उत्तरकाण्ड नाम से पृथक् व्यवहार होने पर भी सम्पूर्ण ग्रन्थ का कतो एक ही नाम से व्यवहार मिलता है। ऐसे स्थानों में जहां उत्तरभाग में लेखशैली की भिन्नता प्रतीत होती हो वहां कर्ता एवं समय के भेद से निर्माण के भेद का भी अनुमान किया गया है। सुश्रुत के पूर्वभाग में भी कौमारभृत्य तथा शालाक्य आदि विषयान्तरों के विकसित अवस्था में मिलने के कारण एक ही लेखक की रचना होने से उनका विस्तृत वर्णन मिलना चाहिये परन्तु शल्यतन्त्र की प्रधानता की रक्षा के लिये ये विषय बहुत संक्षेप से दिये गये हैं। उत्तरतन्त्र के रूप में पुनः मिलने वाले विस्तृत प्रसङ्गान्तरीय विषयों का बाद में सम्मिलित किया जाना प्रकट करने के लिये उत्तरतन्त्र नाम से निर्देश किया गया है। लेख की रचना में भेद के द्वारा निर्माण में भी भेद मालूम हो सकता है। इसी प्रकार काश्यपसंहिता का खिलभाग भी यदि पूर्वभाग के साथ ही बनाया गया होता तो पूर्वभाग में दिये हुए ज्वर आदि विषयों के साथ खिलभाग में दिये हुए ज्वर आदि विषयों की समानता को दृष्टि में रखते हुए उसी के अनुसार वर्णन किया जाता परन्तु खिलभाग में पुनः उन्हीं विषयों के देने से तथा उपदेश स्थान, समय और उपदेश्य व्यक्ति का भी भेद दिखाई देने से पूर्वभाग तथा खिलभाग में ग्रन्थ कर्ता, समय तथा रचना का भी भेद प्रतीत होता है। विद्वान् लोग ऋग्वेद में भी खिलरूप से सम्मिलित किये हुए भाग का समय भिन्न मानते हैं। यहां भी खिल नाम से निर्देश
१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ८१ देखें।