काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २५७
किया जाना ही समय तथा कर्ता के भेद को प्रकट करता है। काश्यपसंहिता के कल्पाध्याय में आए हुए 'तन्त्रं सखिलमुच्यते' वाक्य के अनुसार खिलस्थान भी इसी वृद्धजीवकीय तन्त्र का भाग प्रतीत होता है। तथा खिलभाग में आये हुए विषयों के भी काश्यप के ही उपदेश रूप होने से खिलभाग सहित ग्रन्थ ही काश्यपसंहिता प्रतीत होती है। परन्तु इस संहिता के पूर्वभाग के निम्न श्लोक से दारुवाह द्वारा प्रेरित वृद्धजीवक को कश्यप का उपदेश दिया जाना प्रतीत होता है—
उपास्यमानमृषिभिः कश्यपं वृद्धजीवकः । चोदितो दारुवाहेन वेदनार्थेऽभ्यचोदयत् ।।
इस प्रकार पूर्वभाग में प्रायः बहुत से अध्यायों में जीवक का प्रश्न तथा कश्यप द्वारा उत्तर दिया जाना मिलता है। वत्स के भृगु की सन्तान होने से वात्स्य के पूर्वपुरुष के रूप में निर्दिष्ट जीवक को भार्गव शब्द द्वारा सम्बोधन किया जाना उचित होने पर भी “भार्गवास्थीनि” द्वारा केवल एक स्थान पर भार्गव शब्द से सम्बोधन किया गया है। अन्यत्र सब स्थानों पर जीवक शब्द द्वारा ही सम्बोधन किया गया है। इसके विपरीत उत्तरभाग (खिलस्थान) में दारुवाह का उल्लेख नहीं मिलता है तथा जीवक शब्द द्वारा संबोधन भी कहीं-कहीं ही है। प्रायः सब स्थानों पर भार्गव शब्द से ही संबोधन मिलता है। अन्तर्वत्नीचिकित्सा तथा कुक्कुणक आदि अध्याय में भी कहीं-कहीं जीवक तथा भार्गव शब्द द्वारा सम्बोधन तथा जीवक द्वारा प्रश्न न करके 'नृप, नराधिप, विशाम्पते, इत्यादि राजा के सम्बोधन दिये हुए हैं तथा एक स्थान पर 'इति वार्योविदायेदम्' द्वारा वार्योविद को कश्यप के उपदेश का उल्लेख मिलता है। लेख की रचना का अनुसन्धान करने पर पूर्वभाग में प्रायः लेख की प्रौढ़ता आर्षभाव का प्राचुर्य तथा विषय की गम्भीरता दीखती है तथा उत्तरभाग में प्रायः विकसित विषय तथा निरूपण शैली भी स्पष्ट एवं सुन्दर प्रतीत होती है। रेवतीकल्प, चर्मदल, जातकर्मोत्तरीय तथा शूलचिकित्सा आदि अध्यायों में कही-कहीं पूर्वभाग के समान प्रौढ़ एवं आर्ष रचना तथा विषय की गंभीरता दिखाई देती है। उपर्युक्त वर्णन के अनुसार प्रतीत होता है कि मुख्यरूप से दारुवाह द्वारा प्रेरित जीवक ने कश्यप द्वारा दिये गये उपदेशों को लेकर पूर्वभाग का निर्माण किया है जिसमें कि रचना शैली भी प्रौढ़ है तथा अन्यत्र जीवक, वार्योविद तथा अन्य भी व्यक्तियों को समय-समय पर दिये गये कश्यप के उपदेशों को लेकर उत्तरभाग की रचना की गई है जिसमें कि विकसित अवस्था दिखाई देती है। इन उपर्युक्त स्थलों को देखने से दोनों भागों में लेखनी एवं समय का भेद स्पष्ट दिखाई देता है। संहिता के कल्पाध्याय में वृद्धजीवकतन्त्र के कुछ समय तक लुप्त रहने के बाद वात्स्य द्वारा प्राप्ति एवं संस्करण के निर्देश के बाद दिया हुआ निम्न श्लोक भी वात्स्य द्वारा ही कहा जा सकता है—
स्थानेष्वष्टसु शाखायां यद्यन्नोक्तं प्रयोजनम् । तत्तद्भूयः प्रवक्ष्यामि खिलेषु निखिलेन ते ।।
इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि अष्टस्थानात्मक पूर्वतन्त्र ही काश्यपसंहिता का संक्षिप्तस्वरूप वृद्धजीवकीय तन्त्र है। इस पूर्वभाग में न आये हुए आवश्यक विषयों को कश्यप की उपदेश परम्परा तथा अन्य आचार्यों के ग्रन्थों से संग्रह करके वात्स्य द्वारा ही खिलभाग के रूप में अन्त में जोड़ दिया गया प्रतीत होता है। वात्स्य द्वारा ही इस भाग के जोड़े जाने पर भी कश्यप के कुछ उपदेशों को साक्षात् ग्रहण करके तथा कुछ इधर-उधर के ग्रन्थों से एकत्रित करके दिया जाने के कारण ही ग्रन्थ में कहीं प्रौढ़ और कहीं साधारण शैली दृष्टिगोचर होना स्वाभाविक ही है। इसमें वार्योविद, काङ्कायन, भारद्वाज, दारुवाह, हिरण्याक्ष, वैदेह तथा अन्य आचार्यों के मत देकर वृद्धजीवक का मत भी दिया हुआ है। अपने सामयिक एवं शिष्य होने के कारण वृद्धजीवक का मत कश्यप द्वारा अथवा स्वयं जीवक द्वारा भी पूर्वपक्ष के रूप में देकर अन्त में चरम सिद्धान्त रूप में कश्यप का मत दिया जाना यद्यपि संभव हो सकता है परन्तु बाद में वमनविरेचनाध्याय में कौत्स, पाराशर्य, वृद्धकाश्यप, वैदेह, वार्योविद तथा उस समय के अन्य भी आचार्यों के मतों का पूर्वपक्ष के रूप में निर्देश करने के बाद चरमसिद्धान्त के रूप में कश्यप के मत के स्थान पर वात्स्य का मत दिया हुआ है। परन्तु पूर्ववाद