भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 272
२५८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

के कारण बहुत पीछे होनेवाले प्रतिसंस्कर्ता वात्स्य का कश्यप तथा वृद्धजीवक द्वारा निर्देश किया जाना सम्भव न होने से वात्स्य ही इस ग्रन्थ का संस्कर्ता प्रतीत होता है। यहां दिये हुए कौत्स, पाराशर्य आदि सब प्राचीन ही आचार्य हैं। इसलिये उनके समकक्ष आया हुआ वात्स्य भी प्राचीन आचार्य ही होना चाहिये। शतपथ वंश ब्राह्मण में भरद्वाज, पाराशर्य, आग्निवेश्य, हारीत, काप्य, गालव, जातूकर्ण तथा आत्रेय आदि बहुत से प्राचीन ऋषियों का उल्लेख मिलता है। उन्हीं के साथ वात्स्य का भी उल्लेख है। आयुर्वेद के ग्रन्थों से इन नामों वाले आयुर्वेद के आचार्यों का सत्व भी प्रकट होता है। यद्यपि यहाँ ब्रह्मविद्या का निर्देश होने से इनका आयुर्वेदाचार्यत्व सिद्ध नहीं होता है, समान नाम वाले ये अन्य व्यक्ति भी हो सकते हैं तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि ये केवल ब्रह्मविद्या के ही ज्ञाता थे, आयुर्वेद के नहीं। इन्हीं आचार्यों की पूर्वश्रेणी में स्वर्विद्य के रूप में प्रसिद्ध अश्वियों का उल्लेख होने से उसी परम्परा में होने से ये भी आयुर्वेद के आचार्य हो सकते हैं। आयुर्वेद के ग्रन्थों में पूर्वाचार्यों के रूप में दिये हुए बहुत से नामों का इस वंश ब्राह्मण में प्रायः साथ-साथ मिलने से संभवतः ये वे ही व्यक्ति प्रतीत होते हैं।

प्रतिसंस्कर्ता वात्स्य ने केवल खिलभाग ही नहीं जोड़ा है अपितु कल्पाध्याय के 'संस्कृतं तत्पुनस्तन्त्रं वृद्धजीवकनिर्मितम्' इस निर्देश के कारण पूर्वभाग में भी वात्स्य द्वारा संस्करण किया जाना स्पष्ट प्रतीत होता है। परन्तु वात्स्य द्वारा अपने विचारों को मिलाकर अनेक विषयों से युक्त खिलभाग को पृथक् रूप से जोड़ने से प्रतीत होता है कि उसने पूर्वभाग में मूल ग्रन्थ के विपर्यास रूप कोई विशेष प्रतिसंस्कार नहीं किया है अपितु पूर्वग्रन्थ में ही केवल कहीं-कहीं पूरणिका वाक्य, कहीं अपना विशेष वक्तव्य तथा तात्कालिक विषयों को देकर प्रायः उसी रूप में ही रखा है।

प्रतिसंस्कार का उद्देश्य जिस किसी भी वस्तु अथवा निबन्ध में गुणाधान द्वारा उसे उज्ज्वल करना होता है। इस उपर्युक्त प्रक्रिया द्वारा संस्कार करने से उन प्राचीन संहिताओं के लेख अथवा विषय को संक्षिप्त एवं विस्तृत करके नये विषयों के प्रवेश करने से तथा अनुपयोगी अंश को परिवर्तित करके तथा निकाल करके उनका रूपान्तर कर देने का प्रतिसंस्कर्ताओं का प्रयत्न संभवतः उचित हो परन्तु इस प्रकार पुनः संस्करण होकर प्राचीन संहिता के लेख तथा प्रतिसंस्कर्ताओं के लेख परस्पर नीर-क्षीर (दूध और पानी) की तरह मिल जाने से प्राचीन संहिता के लेखों का प्रतिसंस्कर्ताओं के लेखों में ही अन्तर्भाव हो गया है। इसीलिये प्राचीन आत्रेय संहिता का अग्निवेश द्वारा विस्तार तथा उस अग्निवेश संहिता के चरक द्वारा किये गये प्रतिसंस्करण में तथा इसी प्रकार काश्यपसंहिता के वृद्धजीवक द्वारा किये गये संक्षेप तथा उसके वात्स्य द्वारा किये गये प्रतिसंस्करणों में यह कहना कठिन है कि इनमें कितना अंश किसका है। जिस प्रकार प्राचीन मूल नावनीतक ग्रन्थ में नवीन विषयों के प्रवेश द्वारा अपूर्ण विषयों को पूर्ण करके लाहौर से प्रकाशित करवाकर प्रतिसंस्कर्ता ने बहुत उपकार किया है तथा यह भी सन्तोष का विषय है कि वाग्भट, नागेन्द्रनाथ आदि बहुत से अर्वाचीन विद्वानों के अनुभव सिद्ध ओषधियों को इसमें प्रविष्ट करके इसे और विस्तृत कर दिया है। परन्तु इस प्रकाशन में यदि नवीन पूरित (प्रतिसंस्कृत) अंश को लिपि के भेद द्वारा अथवा कोष्ठक में देकर पृथक् प्रकाशित कर दिया जाता तो यह मालूम करने में सुविधा रहती कि ग्रन्थ का कितना अंश प्राचीन (मूल ग्रन्थ) है तथा कितना अंश प्रतिसंस्कार में नया प्रविष्ट किया गया है। इस समय लाहौर तथा यूरोप से मूल नावनीतक पृथक् मुद्रित हुआ उपलब्ध होता है इसलिये उन दोनों (मूल तथा प्रतिसंस्कृत) ग्रन्थों की तुलना करने पर प्राचीन एवं अर्वाचीन अंश में यद्यपि भेद किया जा सकता हैं, परन्तु कालक्रम से यदि कभी मूल ग्रन्थ की उपलब्धि न हो सके तो केवल प्रतिसंस्कृत पुस्तक को देखकर यह भेद करना संभव नहीं होगा। इसमें वाग्भट तथा नागेन्द्रनाथ आदि का उल्लेख होने से कभी बाद में यह सन्देह हो सकता है कि नागेन्द्रनाथ के बाद में मूल नावनीतक ग्रन्थ का निर्माण हुआ है। इसी प्रकार किसी समय चरक तथा वात्स्य द्वारा प्रतिसंस्कृत ग्रन्थों से काश्यपसंहिता, आत्रेयसंहिता, वृद्धजीवकीय तन्त्र तथा अग्निवेश तन्त्रों की पृथक् स्थिति अवश्य रही होगी। रूपान्तर प्रतिसंस्कारों के प्रचार के कारण प्राचीन ग्रन्थों का प्रचार कम हो गया और इसीलिये पीछे से वे लुप्त