भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

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हो गये। प्रतिसंस्करणों में कुछ अंश छोड़ दिया जाता है, कुछ नवीन अंश प्रविष्ट कर दिया जाता है तथा कुछ अंश का रूपान्तर हो जाता है। इस प्रकार ग्रन्थ के उस-उस अंश के साथ आचार्य के काल का निर्णय करना भी कठिन हो जाता है।

मस्तिष्क में उदय होनेवाले नाना प्रकार के विचारों तथा अन्य आचार्यों के उपदेशों के अनुसन्धान से नये-नये विचार उत्पन्न हो जाते हैं। प्रतिसंस्करण के अवसर पर प्राचीन आचार्यों के सिद्धान्तों का भी अर्वाचीन आचार्यों के विचारों से सामंजस्य न होने पर रूपान्तर हो सकता है तथा उनको बिलकुल निकाला भी जा सकता है। कहीं-कहीं बिलकुल निर्मल सिद्धान्त भी पुरुष सुलभ दोषों के कारण संस्करण के समय दूषित हो जाते हैं। चरकसंहिता में चिकित्सास्थान के अन्तिम १७ अध्याय तथा सिद्धि और कल्पस्थान के लुप्त हो जाने से पुनः दृढ़बल द्वारा पूरित किया जाने से उतना अंश यदि दृढ़बल की ही रचना मानी जाय तो उसमें आत्रेय, अग्निवेश तथा चरक में से किसी की भी लेखनी का प्रवेश न होने से उस भाग की अच्छाई या बुराई का उत्तरदायित्व दृढ़बल पर ही होना चाहिये। इस प्रकार यदि अग्निवेश और चरक ने भी पूर्वग्रन्थ के अन्त में परिच्छेद के रूप से अपने-अपने विचार पृथक् दिये होते अथवा आजकल अग्निवेश तन्त्र पृथक् उपलब्ध होता तो उन-उन ग्रन्थों में उस-उस भाग में आये हुए अच्छे या बुरे विचारों का उत्तरदायित्व उन-उन पर हो सकता था। परन्तु इसके विपरीत प्राचीन एवं अर्वाचीन आचार्यों के लेख गङ्गा-यमुना की तरह परस्पर मिले हुए होने से तथा पूर्व ग्रन्थों के पृथक् उपलब्ध न होने से स्थान-स्थान पर आये हुए अच्छे या बुरे विचारों का उत्तरदायित्व किस पर है यह नहीं कहा जा सकता। इस अवस्था में अर्वाचीन आचार्य के समय सम्मिलित हुई त्रुटियों का दोष भी प्राचीन आचार्यों पर पड़ सकता है। यह बात केवल चरक के विषय में ही नहीं है अपितु सुश्रुतसंहिता तथा काश्यपसंहिता में भी बाद में संस्करण के समय प्रविष्ट हुए कुछ विकार तथा अर्वाचीन विषयों के सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक यह नहीं कहा जा सकने के कारण कि ये किसके हैं, मूलसंहिता के आचार्यों के विषय में भी अर्वाचीनता तथा उन विकारों की शङ्का उत्पन्न हो जाती है। किस प्रकार भारत के विस्तृत होकर महाभारत का रूप धारण कर लेने पर अथवा पुनः-पुनः हुए संस्करणों के अवसर पर प्रविष्ट हुए शब्दों के प्रवेश के समय का निश्चय न होने से मूलमहाभारत को भी लोग अर्वाचीन सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। चरकसंहिता में आया हुआ विकसित निग्रहस्थान आदि का विषय भी आत्रेय, अग्निवेश अथवा चरक में से किसी की लेखनी द्वारा प्रविष्ट किया गया है इसका निश्चय न होने से आत्रेय के विषय में भी अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न हो जाती है। इसी प्रकार काश्यपसंहिता में आये हुए उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी आदि शब्दों का भी वात्स्य के प्रतिसंस्करण में ही होना सम्भव होने पर भी, निश्चय न होने से प्राचीनता के साधक बहुत से प्रमाणों के जागरूक होने पर भी कश्यप तथा वृद्धजीवक की अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न कर देते हैं।

प्राचीन ग्रन्थों में ही नये विचारों को पीछे से प्रविष्ट करके पुनःसंस्करण करने की प्रथा केवल भारतीय ग्रन्थों में ही नहीं मिलती है अपितु अन्य देशों में भी यही प्रक्रिया विद्यमान थी। ग्रीस देश की प्राचीन चिकित्सा के आचार्य हिपोक्रिटस के ग्रन्थ में भी इसी प्रकार प्राचीन एवं नवीन विषयों को एकत्र तिलतण्डुल रूप से मिलाकर पुनः पुनः संस्करण होने से उसके विषय में भी कुछ विवेचन नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार मिश्र देश में भी एवर्टसप्येयिरस¹ नामक प्राचीन ग्रन्थ के भी अनेक संस्करण हो चुके हैं। पूर्व ग्रन्थों में ही नवीन विचारों के उदय होने पर उन विचारों का भी उसीके अन्दर अनुप्रवेश, कहीं पुस्तक के एक प्रान्त पर देना तथा कहीं टीका टिप्पणी के रूप में सम्पूर्ण नये विचारों को ग्रन्थ के मध्य में भी संस्करण के समय दिया जा सकता है। प्राचीन ग्रन्थों का सारांश भी वहां दिया जा सकता है। तथा स्थान भेद से मिले हुए पाठ भेद भी उसी में दिये जा सकते हैं। इस प्रकार यह भेद करना कठिन हो जाता है कि प्राचीन ग्रन्थ


१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ८३ देखें।