काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
में कितना अंश प्राचीन है तथा कितना अंश सस्करण के समय प्रविष्ट किया गया है। समय-समय पर नये-नये विचारों के एकत्र अनुप्रवेश होते जाने से पूर्वापर ग्रन्थलेख में कहीं-कहीं परस्पर विरोध तथा व्याघात भी दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार प्राचीन एवं अर्वाचीन विचारों के परस्पर एकत्र सम्मिलित करने से समयान्तर में सब जगह गड़बड़ी होती आई है। पूर्वोक्त युक्तियों तथा महावग्ग, पालीजातक और तिब्बतीय गाथाओं के आधार पर भी प्राचीन सिद्ध किए हुए धन्वन्तरि, कश्यप, जीवक तथा उसी न्याय से आत्रेय सुश्रुत आदि के ग्रन्थों में भी संस्कार के कारण आये हुए अर्वाचीन विषयों के सूचक किसी-किसी पद, वाक्य या विषय, के दर्शन मात्र से ही यदि मूलग्रन्थ को अर्वाचीन सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाय तो २३०० वर्ष पूर्व अशोक द्वारा सब स्थानों पर उद्घाटित सर्वसाधारण के चिकित्सालयों में सुविचार पूर्ण तथा सर्वाङ्ग सम्पन्न ग्रन्थों, उनके ज्ञाता चिकित्सकों, अनुभूत ओषधियों तथा सुन्दर चिकित्साप्रणालियों के होने का जो उल्लेख मिलता है उसका क्या आधार हो सकता है। कश्यप, आत्रेय, सुश्रुत आदि प्राचीन प्रौढ़ विद्वानों तथा उनके ग्रन्थों को यदि अर्वाचीन सिद्ध करें तो इनमें पूर्व के ग्रन्थ उस समय प्रसिद्ध नहीं थे। ४०१ ईस्वी पूर्व में मेयून नामक पारसी राजा का राजवैद्य टी. सी. यस. नामक एक यूनानी वैद्य था। इस प्रकार के उसके इतिहास के समान भारत में उस समय किसी भी विदेशी चिकित्सक के यहां के चिकित्सालय में आने का वृत्तान्त नहीं मिलता है। ईसा से पूर्व का महावग्ग नामक प्राचीन बौद्ध वैद्यक ग्रन्थ भी आत्रेय आदि के सिद्धान्त के अनुसार ही होने से इससे पृथक् प्रतीत नहीं होता। सर्वप्रथम रूप में मिलने वाले, कश्यप, आत्रेय, सुश्रुत आदि के ग्रन्थों तथा उनके आचार्यों को यदि छोड़ दिया जाय तो शिलालेख में दिये हुए सर्वसाधारण चिकित्सालय किन अनुपस्थित व्यक्तियों की कल्पना के आधार पर माने जायेंगे। यदि ये आत्रेय आदि आचार्य अशोक के चिकित्सालयों के उद्घाटन के बाद के माने जांय तो लोकोपकार की दृष्टि से अत्यन्त उपादेय इन साधारण औषधालयों का इन आत्रेय आदियों ने उल्लेख क्यों नहीं किया है। इनके अतिरिक्त आत्रेय आदि का कोई भी लेख इनसे प्रभावित नहीं प्रतीत होता।
इसी प्रकार सुश्रुतसंहिता आदि में भी आये हुए कुछ स्थूल सिद्धान्त, गलत सिद्धान्त अथवा अपूर्ण अंशों को देखकर कुछ लोगों को इसके विषय में अश्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। यह भी मूललेख तथा प्रतिसंस्कार के परस्पर नीर-क्षीर के रूप में मिले होने से ही है। कालक्रम से विज्ञान, अन्य विद्याओं तथा यन्त्रों के उत्तरोत्तर विकास एवं परिष्कार हो जाने से नये-नये सिद्धान्तों के प्रकट होते जाने से प्राचीन ऋषियों के पूर्व सिद्धान्त सम्भवतः हमें स्थूल एवं कुण्ठित भले ही प्रतीत हों परन्तु उनका विचार करने का ढंग (दृष्टिकोण) सीमित नहीं कहा जा सकता। एक व्यक्ति द्वारा अच्छी समझी जाने वाली वस्तु का दूसरे द्वारा भी वैसा ही समझा जाना आवश्यक नहीं है। एक दिन उचित प्रतीत होने वाली वस्तु अगले ही दिन इसमें विपरीत भी मालूम हो सकती है। जिस प्रकार भारत में अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित शोधित धातुओं एवं रसौषधियों के उपयोग की पद्धति को अन्यदेशीय विद्वान् अनेक शताब्दियों तक अनुपयोगी एवं अहितकर समझते रहे। वे ही लोग आजकल उसको उपादेय एवं हितकर कहकर उसका व्यवहार करते हैं। इसी प्रकार हमारे प्राचीन आचार्यों के बहुत से सिद्धान्त पाश्चात्त्यवैज्ञानिक प्रगति के कारण बहुत समय तक अन्यथा माने जाने के बाद अब पुनः दृष्टि के परिष्कृत हो जाने के कारण समुचितरूप में माने जाने लगे हैं। प्राचीन समय में किसी विज्ञान के अनुसन्धान के लिये क्या-क्या साधन थे? इस विषय में कुछ उल्लेख न मिलने पर भी यह कहा जा सकता है कि प्राचीन सम्प्रदाय परम्परा, अनुभव, निरन्तर लगन एवं तपस्या के आलोक से उज्ज्वल प्राचीन ऋषियों के हृदयों में प्रकट हुए बहुत से सिद्धान्त निर्मल एवं सुन्दर भी हो सकते हैं।
एक ही विषय पुनः विचार करने पर अत्यन्त परिमार्जित हो जाता है। स्वयं ग्रन्थकर्ता ही अपने पूर्वलेख का पुनः परिमार्जित विचारों के उदय होने पर आवापोद्वाप प्रक्रिया द्वारा बिलकुल विपरीत संस्कार कर सकता है। उस अवस्था में अपने ही हृदय में बार-बार उदय हुए विचारों के परस्पर सम्पर्क से मुख्य प्रमेय (ज्ञातव्य विषय) तथा तात्कालिक विषयों