भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

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के अनुप्रवेश द्वारा किये गये संस्कार से गुणों में वृद्धि ही होती है। समयान्तर से इसमें गड़बड़ की संभावना नहीं होती। विद्वान् लोग निम्न प्रकार का संस्करण उचित समझते हैं—

आवापोद्धरणे तावद्यावद्दोलायते मनः । पदस्य स्थापिते स्थैर्ये हन्त सिद्धा सरस्वती ।।

(अर्थात् जब तक मन स्थिर नहीं होता तब तक आवाप और उद्वाप होते रहते है परन्तु पद के स्थिर होने पर अर्थात् पद-पदार्थ के संबन्ध के सम्यक् ज्ञान हो जाने पर सरस्वती सिद्ध हो जाती है अर्थात् अपने वश में हो जाती है)।

किन्तु बाद में आलोचना करते हुए प्राचीन महर्षियों के उपदेशात्मक ग्रन्थों में अभिप्राय भेद से पूर्वग्रन्थ के गंभीर वाक्यों के अन्यथा प्रतीत होने से तथा तात्कालिक नये विचारों के द्वारा पूर्व विचारों के अन्यथा (विपरीतरूप में) प्रकट होने से पूर्व ग्रन्थ में नवोदित विचारों को प्रविष्ट करके आवापोद्वाप प्रक्रिया द्वारा परिवर्तन, विकास एवं संक्षेप के द्वारा पूर्व ग्रन्थ का रूपान्तर युक्त प्रतिसंस्करण करने में अर्वाचीन लोगों की जो मनोवृत्ति है, वह उचित प्रतीत नहीं होती। प्राचीन सिद्धान्त एवं लेखों के विपरीत हो जाने से उनका स्वरूप ही बदल जाता है अथवा दोषों की शङ्का से वे मलिन प्रतीत होने लगते हैं। प्राचीन सूत्र, भाष्य आदि में उक्त, अनुक्त एवं द्विरुक्त आदि दोषों को दूर करने के लिए अन्य विद्वानों ने सूत्र आदियों को उसी प्रकार रखकर अपने विचारों को वार्तिक के रूप में पृथक् प्रकट किया है। इससे सूत्र भाष्य आदि में आये हुए पद एवं वाक्य आदि में अन्यथा दृष्टि उत्पन्न नहीं हो पाती। इसी प्रकार समयान्तर से नये विचारों के उदय और विकसित हो जाने से तथा पूर्वसिद्धान्तों को अन्यथासिद्ध करने की दृष्टि से प्रतिसंस्कार करने के इच्छुक व्यक्ति यदि मूलग्रन्थ को उसी रूप में रखकर अपने विशेष विचार एवं व्याख्यानों से युक्त समालोचनात्मक अन्य ग्रन्थ को खिलरूप में पृथक् जोड़ दें तो परस्पर मिश्रित न होने से प्राचीन एवं अर्वाचीन विषयों का पृथक्-पृथक् भेद, विचारों के विकास का ज्ञान तथा पूर्वापर लेख एवं विचारों की अच्छाई और बुराई का भी ज्ञान ठीक-ठीन हो जाने से कोई गड़बड़ न हो। इसके विपरीत कुछ लोग प्राचीन ग्रन्थों में भी किन्हीं सन्देहास्पद शब्दों के मिलने से ही समस्त ग्रन्थ को अर्वाचीन बतलाने लगते हैं। परन्तु प्राचीन ग्रन्थों में संस्कार के न होने पर भी उन शब्दों का अनुप्रवेश संभव होने से केवल उन शब्दों को देखकर ही ग्रन्थ को अर्वाचीन कहना संगत नहीं प्रतीत होता। कुछ विद्वान् इस प्रकार के शब्द तथा अन्य ऐसे ही विषयों को उन ग्रन्थों में दिखाकर अपने अभिप्राय को विना प्रमाणों के सिद्ध किये ही उन ग्रन्थों का आनुमानिक समय बतलाते रहते हैं। परन्तु उनके उन विचारों में क्या प्रमाण हैं, यह नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार अव्यक्त प्रमाणों से ही विचार किया जाता है। उनके मन में आये हुए असाधारण प्रमाणों का स्पष्ट ज्ञान होने पर ही तथ्य के निर्धारण में सुविधा हो सकती है।

इस ग्रन्थ का संहितात्व तथा तन्त्रत्व

इस ग्रन्थ के संहिताकल्पाध्याय में 'संहिताकल्पं व्याख्यास्यामः' द्वारा प्रारम्भ करके निम्न श्लोक दिये हैं। जिनमें इसका तन्त्र के रूप में उल्लेख किया गया है—

स पृष्टोऽन्येन वैद्येन .... (मूल उपोद्घात पृ. ६२ देखें)।

इसके बाद 'समाप्ता चेयं संहिता' द्वारा इसका उपसंहार किया गया है। इस प्रकार मूल और पुष्पिका वाक्यों में संहिता एवं तन्त्र दोनों रूप में इसका उल्लेख किया गया है। इस ग्रन्थ के उपक्रम तथा उपसंहार के खण्डित होने से उसके द्वारा ज्ञातव्य विषय के संबन्ध में कुछ नहीं कहा जा सकता।