भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

२६२ कश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

परन्तु संहिता शब्द का व्यवहार तन्त्र शब्द के व्यवहार की अपेक्षा प्राचीन है। प्राचीन आर्षयुग में बनाये हुए ग्रन्थ प्रायः संहिता नाम से तथा उसके बाद प्राचीन आचार्यों द्वारा बताये हुए ग्रन्थ तन्त्र नाम से व्यवहृत होते थे। संहिता शब्द का अर्थ ऋषियों के प्रतिभा एवं ज्ञान बल से प्राप्त प्रकीर्ण (भिन्न-भिन्न विषयों से सम्बन्धित) उपदेशों को सामूहिक रूप से एकत्र करके ग्रन्थ का रूप दे देना है। तथा तन्त्र शब्द भिन्न-भिन्न विषयों को भिन्न-भिन्न प्रकरण एवं सन्दर्भ सहित शास्त्र का रूप दे देने के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इस प्रकार आत्रेय, धन्वन्तरि तथा कश्यप आदि द्वारा मूल उपदिष्ट ग्रन्थों का संहिता नाम से व्यवहार होना चाहिये। तथा इन मूलसंहिता में अग्निवेश, सुश्रुत, वृद्धजीवक आदि द्वारा प्रकरण के अनुसार विषयों को ठीक करके शास्त्र का रूप देने के बाद तैयार हुए ग्रन्थों का तन्त्र नाम दिया जाना चाहिये चरकसंहिता के प्रारम्भ में—

तन्त्रप्रणेता प्रथममग्निवेशो यतोऽभवत्। अथ भेदादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं .......'।।

इत्यादि द्वारा अग्निवेश आदियों को जो तन्त्रकर्ता के रूप में उल्लेख किया है, वह उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार ही है।

संहिताओं का निर्माण ऋषियों द्वारा स्वयं अथवा उनके उपदेशों को शब्दशः अथवा अर्थशः (भावार्थ) ग्रहण करके शिष्यों द्वारा किये जाने की प्रायः प्रथा है। शिष्यों द्वारा निर्माण किये जाने पर भी केवल उनके भावों को प्रकट करने के कारण संहिताओं का नाम मूल आचार्य के अनुसार ही रखा जाता है। तन्त्रकर्ता मूल संहिता के उपक्रम तथा उपसंहार में प्रश्नोत्तर रूप में अपने तथा दूसरों के मतों को देकर उसे तन्त्र का रूप दे देते हैं। अन्य विशेषताओं को प्रविष्ट करके प्रतिसंस्कर्ता मूलसंहिता को विशालरूप में उपस्थित कर देते हैं। इस प्रकार प्रतिसंस्कर्ता के लेख में तन्त्र का तथा तन्त्र में संहिता का अन्तर्भाव होता है।

जिस प्रकार उपलब्ध चरक तथा सुश्रुत में क्रमशः आत्रेय तथा धन्वन्तरि की उक्तियां गुरु सूत्र के रूप में, अग्निवेश सुश्रुत आदियों की पूरितोक्तियां शिष्य सूत्ररूप में, अन्य आचार्यों की उक्तियां एकीय सूत्ररूप में तथा चरक, दृढबल आदि की उक्तियां प्रतिसंस्कर्तृ सूत्र के रूप में एकत्र¹ मिलती हैं, उसी प्रकार काश्यपसंहिता में भी काश्यप की उक्तियां गुरुसूत्र के रूप में, वृद्धजीवक की उक्तियां शिष्य सूत्र के रूप में, अन्य आचार्यों की उक्तियां एकीयसूत्र के रूप में तथा वात्स्य की उक्तियां प्रतिसंस्कर्तृ सूत्र के रूप में एकत्रित मिलती हैं।

जिस प्रकार पुनर्वसु आत्रेय द्वारा सर्वप्रथम उपदिष्ट संहिता को लेकर बनाये हुए अग्निवेश के तन्त्र को ही चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत करके प्रकाशित किया जाने से, आत्रेयसंहिता ही अग्निवेश तन्त्र के रूप को प्राप्त करके आजकल चरक संहिता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। अथवा जिस प्रकार धन्वन्तरि के अष्टप्रस्थानात्मक उपदेश को लेकर दिवोदास द्वारा अन्य प्रस्थानों के उपदेशों के लुप्त हो जाने पर भी केवल शल्य प्रस्थान के विषय में उपदिष्ट संहिता को सुश्रुत ने अपने तन्त्र का रूप दिया तथा उसी का समयान्तर से संस्कार हुआ, इसलिये धन्वन्तरिसंहिता (विशेषकर शल्यसम्बन्धी विषय) ही, आजकल सुश्रुतसंहिता के रूप में मिलती है। उसी प्रकार संहिताकल्पाध्याय के लेख के अनुसार काश्यपसंहिता ही संक्षिप्त वृद्धजीवकीयतन्त्र का रूप धारण करके तथा समयान्तर से वात्स्य द्वारा प्रतिसंस्कृत होकर इस ग्रन्थ के रूप में हमारे सामने विद्यमान है। ज्यों-ज्यों उत्तरकक्षा आती है त्यों-त्यों पूर्वकक्षा पृथक् रहती हुई भी, आवापीद्वाप, विवर्धन एवं संस्कार से अन्य स्वरूप के उदय एवं प्रचार के कारण विलुप्त हो जाती है अथवा उत्तरकक्षा में अन्तर्निहित होकर एक शरीर हो जाती है (परस्पर मिल जाती है) इस प्रकार तृतीय संस्कार से युक्त होकर ये संहिताएं तन्त्र तथा प्रतिसंस्कार


१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ८६ देखें।