काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २६३
हमारे दृष्टिगोचर होते हैं। यद्यपि इन ग्रन्थों के पूर्वापर पर्यालोचन करने पर कहीं प्राचीन एवं प्रौढ लेखशैली तथा कहीं साधारण शैली के दिखाई देने से विवेचकों को इनके विषय में कुछ प्रकाश मिल सकता है तथापि वर्तमान चरकसंहिता में कितना अत्रेय का तथा कितना अंश अग्निवेश और चरक का है, सुश्रुत संहिता में भी कितना अंश मूल धन्वन्तरि का तथा कितना अंश दिवोदास, सुश्रुत तथा प्रतिसंस्कर्ता का है, इसी प्रकार काश्यपसंहिता में भी कितना अंश मूलकाश्यपसंहिता का है और कितना अंश वृद्धजीवक एवं वात्स्य का है तथा वृद्धजीवक द्वारा किये गये संक्षेप का क्या स्वरूप है इत्यादि बातों का ठीक-ठीक ज्ञान होना संभव नहीं है।
कश्यप, आत्रेय, भेड तथा सुश्रुत के ग्रन्थों की परस्पर तुलना
प्राचीन संहिताओं में पूर्व उपलब्ध चरक, भेड तथा सुश्रुतसंहिता और नवीन उपलब्ध काश्यपसंहिता के स्थान, अध्याय, प्रकरण, ग्रन्थ रचना तथा विषयों की परस्पर तुलना करने पर निम्न समानताएँ एवं विषमताएँ दृष्टिगोचर होती हैं। इस काश्यपसंहिता के प्रकरण एवं अध्यायों का स्वयं ग्रन्थकार ने कल्पस्थान के अन्तिम अध्याय में इस प्रकार वर्णन किया है—
‘अष्टौ स्थानानि वक्ष्यानि........तन्त्रं सखिलमुच्यते’ (मूल उपोद्घात पृ. ६२-६३ देखें)।
काश्यप, चरक, भेड तथा सुश्रुत संहिताओं के स्थान एवं अध्यायों की तुलना निम्न प्रकार से की जा सकती है—
| स्थान | वृद्धजीवकीय तन्त्र | चरक | भेडतन्त्र | सुश्रुत |
|---|---|---|---|---|
| सूत्रस्थान अध्याय | ३० | ३० | ३० | ४६ |
| निदानस्थान अध्याय | ८ | ८ | ८ | १६ |
| विमानस्थान अध्याय | ८ | ८ | ८ | × |
| शारीरस्थान अध्याय | ८ | ८ | ८ | १० |
| इन्द्रियस्थान अध्याय | १२ | १२ | १२ | × |
| चिकित्सास्थान अध्याय | ३० | ३० | ३० | ४० |
| सिद्धिस्थान अध्याय | १२ | १२ | ९ (१२ ?) | × |
| कल्पस्थान अध्याय | १२ | १२ | ८ (१२ ?) | ८ |
| योग | १२० | १२० | १२० | १२० |
| खिलभाग | ८० | — | — | ६६ |
उपर्युक्त चारों ग्रन्थों में से चरक, भेड तथा काश्यपसंहिता आदि तीनों में खिल स्थान को छोड़कर स्थान, अध्याय तथा अध्यायों की कुल संख्या में भी समानता¹ है। काश्यप एवं चरक संहिता में केवल सिद्धि एवं कल्पस्थान के पूर्वापर का ही भेद है। ग्रन्थों के अवयवों का विभाजन करने पर हम कह सकते हैं कि काश्यपसंहिता की चरक और भेडसंहिता में छाया दिखाई देती है अथवा उपर्युक्त तीनों ग्रन्थकारों ने किसी एक ही आचार्य का अनुसरण किया प्रतीत होता है। इन सब आचार्यों के पश्चिमप्रदेश के निवासी होने के कारण इनके ग्रन्थों में समान छाया का होना उचित भी है। इनमें से भी चरक तथा भेडसंहिता में एक ही चिकित्सा का विषय होने से तथा एक ही आत्रेय के उपदेशों को ग्रहण करके
१. भेडसंहिता के अध्याय भी अन्य स्थानों में समान है परन्तु सिद्धि एवं कल्पस्थान के खण्डित होने पर भी चरक तथा काश्यप संहिता के अनुसार कुल १२० अध्याय प्रतीत होते हैं।
१८ का.सं.