काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
अग्निवेश तथा चरक द्वारा तन्त्रों के निर्माण का उल्लेख मिलने से नामों के निर्देश तथा विषयों के निरूपण में विशेषरूप से समानता मिलती है। चरक तथा भेडसंहिता दोनों में निदान-स्थान में आठ प्रधान रोग दिये गये हैं। चिकित्सा स्थान में भी दोनों में उन्हीं पूर्वोद्दिष्ट आठ रोगों काही पहले वर्णन करके फिर आगे अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार बहुत से रोगों की चिकित्सा दी गई है। दोनों के सूत्रस्थान में आये हुए समान नाम एवं तुल्य विषय वाले अध्यायों का उल्लेख पहले किया ही जा चुका है। इस प्रकार आगे भी बहुत से स्थानों पर समानता दिखाई देती है। भेड केवल इतना ही है कि भेड की रचना संक्षिप्त, साररहित तथा साधारण है, परन्तु इसके विपरीत स्वयं आत्रेय अथवा अग्निवेश की रचना में तो प्रौढता एवं विषयगाम्भीर्य है ही अपितु पीछे से चरक तथा दृढबल द्वारा किये गये संस्करण में भी गूढ भाव एवं रहस्यपूर्ण तथा असाधारण रचना दिखाई देती है।
इस काश्यपसंहिता के कौमारभृत्य का ग्रन्थ होने से इसमें बालकों के तथा धात्री, गर्भिणी और सूतिका के विषय होने से अनेक विशेष विषय, ग्रहरोग तथा भैषज्यप्रक्रियाओं का भेद होने पर भी उपलब्ध भाग में स्नेहाध्याय आदि समान नाम वाले साधारण विषय थोड़े बहुत अन्तर के साथ निम्नरूप में मिलते हैं—
| काश्यपसंहिता | आत्रेय (चरक) संहिता |
|---|---|
| २२ वां स्नेहाध्याय | १३ वां स्नेहाध्याय |
| २३ वां स्वेदाध्याय | १४ वां स्वेदाध्याय |
| २४ वां उपकल्पनीयाध्याय | १५ वां उपकल्पनीयाध्याय |
| २५ वां वेदनाध्याय | १६ वां चिकित्साप्राभृतीयाध्याय |
| २६ वां चिकित्सासांपदीयाध्याय | १७ वां कियन्तःशिरसीयाध्याय |
| २७ वां रोगाध्याय | १८ वां त्रिशोथाध्याय |
| १९ वां अष्टोदरीय रोगाध्याय | |
| २० वां महारोगाध्याय | |
| २१ वां अष्टौ निन्दितीयाध्याय |
आत्रेय तथा काश्यपसंहिता में कहीं-कहीं शब्दों तथा रचना में भेद होने पर भी विषय तथा कहीं-कहीं लेख की शैली में परस्पर समानता मिलती है।
१. काश्यपसंहिता के खिलभाग हैं—
यथा विषं यथा शस्त्रं यथाऽग्निरशनिर्यथा। तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतोपमम्।।
आत्रेय (चरक) संहिता के सूत्रस्थान के प्रथम अध्याय में—
यथा विषं यथा शस्त्रं यथाऽग्निरशनिर्यथा। तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतोपमम्।।
यह ^१समान श्लोक दोनों में इसी रूप में मिलता है। इस प्रकार के श्लोक को देखकर प्रतीत होता है कि एक पूर्व आचार्य द्वारा उद्धृत श्लोक को दूसरे अर्वाचीन आचार्य ने ग्रहण किया हो अथवा किसी एक ही पूर्व आचार्य का यह श्लोक किन्हीं बाद में होने वाले दोनों आचार्यों ने ग्रहण कर लिया हो यह भी संभव है।
१. इसी प्रकार निम्न श्लोक भी दोनों संहिताओं के इन्द्रियस्थानों में एक ही रूप में मिलता है—
यस्य गोमयचूर्णाभं चूर्णं मूर्धनि जायते। सस्नेहं भ्रश्यते चैव मासान्तं तस्य जीवितम्।। (अनुवादक)