काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 279, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २६५
२. काश्यप संहिता में—
औषधं चापि दुर्युक्तं .... (मूल उपोद्घात पृ. ६३)
आत्रेय संहिता में—
औषधं ह्यनभिज्ञातं .... (मूल उपो. पृ. ६३)
इसी प्रकार काश्यपसंहिता के खिलस्थान के ज्वर चिकित्सा में—
सर्पिः पित्तं शमयति .... (मूल उपो. पृ. ६३)
आत्रेयसंहिता के ज्वरनिदान प्रथम अध्याय में—
स्नेहाद् वातं शमयति .... (मूल उपो. पृ. ६३)
काश्यपसंहिता में—
मज्जावसे वसन्ते .... (मूल उपो. पृ. ६३)
आत्रेय (चरक) संहिता में—
सर्पिः शरदि पातव्यं .... (मूल उपो. पृ. ६४)
इस प्रकार रचनाभेद से दोनों ग्रन्थों में एक ही विषय मिलता है।
३. काश्यपसंहिता के रोगाध्याय में रोग के विषय में एक से लेकर आठ तक भेद देकर अन्त में असंख्येयवाद दिया है। इसी प्रकार आत्रेय संहिता के सूत्रस्थान २६ अध्याय में रस के विषय में भी एक से प्रारंभ करके पहले आठ तक भेद देकर अन्त में असंख्येयवाद दिया होने से दोनों में समान शैली दृष्टिगोचर होती है।
४. रोगों के विषय में काश्यपसंहिता में (पृ. ४१) जो ८० वातिक, ४० पैत्तिक तथा २० श्लैष्मिक रोग दिये हैं। चरकसंहिता के सूत्रस्थान के २० वें अध्याय में भी वे ही रोग उतनी संख्या में तथा लगभग उन्हीं नामों से दिये हैं। इस प्रकार इस विषय में बहुत समानता है।
५. काश्यपसंहिता के लक्षणाध्याय (पृ. ५१) में सात्विक राजस तथा तामस सत्त्वों के जो अवान्तर भेद दिये हैं, आत्रेयसंहिता के शारीरस्थान के सातवें अध्याय में भी केवल सात्त्विक भेदों में एक भेद कम है, अन्य सब भेद समान हैं। दोनों की लेखशैली को देखन पर भी गम्भीर विचार एवं नये-नये विषयों से युक्त प्रौढ शैली दृष्टिगोचर होती है।
सुश्रुतसंहिता में तो खिलस्थान से पूर्वभाग में अध्यायों की कुल संख्या में १२० की समानता होने पर भी विमान, इन्द्रिय तथा सिद्धिस्यान नहीं हैं, शेष पांच स्थान ही हैं तथा उनमें भी अध्यायों की संख्या में समानता नहीं है। गर्भावक्रान्ति अध्याय में बालक तथा धात्री आदि से संबद्ध विषयों के भी होने से कर्णवेध, स्तन्यपरीक्षा, सामुद्रिक लक्षण तथा सत्त्वभेद इत्यादि कुछ विषयों में प्रायः वृद्धजीवकीयोक्त विषयों से समानता दिखाई देती है। शल्य-प्रधान सुश्रुत में शल्य से संबन्धित विषय पूर्वभाग में हैं तथा—शालाक्य आदि अन्य विषय उत्तरतन्त्र में दिये हुए हैं। खिलभाग में ६६ अध्याय हैं। वृद्धजीवकीयतन्त्र में बालकोपयोगी प्रधान विषयों का पूर्वभाग में पहले संक्षेप में निर्देश करके फिर खिलभाग में भी प्रायः वे ही कुछ पूर्वभाग में आये हुए धात्री आदि से संबन्धित विषय विस्तार से दिये हैं। इसमें खिल भाग में ८० अध्याय हैं। इस दृष्टि से कुछ समानता है तथा भिन्न विषय होने से, उनके भागानिरूपणशैली तथा रोगों के निर्देश आदि में विषमता दिखाई देती हैं।