काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
इन प्राचीन आर्ष ग्रन्थों की आलोचना करने पर हम देखते है कि शारीर, विमान, इन्द्रिय तथा सिद्धि स्थान आदि के विषयों को अन्य स्थानों में देकर सुश्रुत में कहीं-कहीं उस स्थान के पृथक् दिया होने पर भी अन्य ग्रन्थों के समान यहाँ भी अष्टस्थानीय विषयों के होने से अवान्तर अध्यायों में कहीं-कहीं विषमता होने पर भी बहुत से स्थानों में समानता भी है। अध्यायों की कुल संख्या में सर्वत्र समानता है। प्रतिपात्र विषयों में भी अपने-अपने ग्रन्थ के प्रधान विषयों के मिलने पर भी साधारण विषय सबमें मिलते हैं। उन-उन अध्यायों में उन-उन विषयों के निरूपण की समानता तथा न्यूनाधिक रूप में बहुत से अध्यायों के नामों में भी समानता मिलती है। इससे इन सबका किसी एक ही प्राचीन सम्प्रदाय का अनुसरण किया जाना अथवा समकाल में प्रचलित एक लेखशैली प्रतीत होती है।
कश्यप, आत्रेय तथा धन्वन्तरि के सम्प्रदाय भिन्न होने पर भी इनमें परस्पर परिचय एवं आदर था। काश्यपसंहिता में नामनिर्देशपूर्वक आत्रेय पुनर्वसु का मत दिया हुआ है। द्विव्रणीयाध्याय (पृ. १२३) में शल्यक्रिया को लक्ष्य करके कहा है—
परतन्त्रस्य समयं.....(मूल उपो. पृ. ६४)
इस प्रकार शल्य विद्या की उपादेयता का निर्देश करके अत्यन्त छोटे बालकों के व्रण के उपक्रम के विषय में कहा है कि—
‘तेषामुपक्रमं....संशमनं बन्धनमुत्क्लिन्नप्रक्षालनं, कल्कप्रणिधानं, शोधनं, रोपणं, सवर्णीकरण-मित्येतैः.....शमयेत्, स्स्रावणपाटनदहनसीवनैषणसाहसादीन्यतिबालेषु न कुर्यात्’
रोगाध्याय में व्रण के बन्धन, रोपण आदि के निम्न प्रयोग देकर उचित शल्यक्रिया का भी निर्देश किया है—
वैसर्पणं चात्र वदन्ति सिद्धं......(मूल उपो. पृ. ६४)।
अश्मरी के प्रकरण में निम्न श्लोकों में अश्मरी के उद्धरण का निर्देश करके अत्यन्त छोटे बालकों में इसका निषेध किया गया है—
शल्यवत्यश्मरी बस्तौ ........ (मूल उपो. पृ. ६४)।
इस प्रकार कश्यप द्वारा शल्यक्रिया का आदरपूर्वक परिचय एवं उसके प्रयोग तथा अप्रयोग का वर्णन मिलता है। आत्रेयसंहिता में भी कश्यप का मत तथा धान्वन्तर धृत आदि का उपयोग मिलता है।
दाहे धान्वन्तरीयाणामत्रापि भिषजां मतम् । (च.चि.अ. ५)
इत्यादि वाक्यों में अनेक स्थानों में धान्वन्तरीय प्रक्रिया का निर्देश करने से आत्रेय के भी इस विषय में ज्ञान का परिचय मिलता है।
भेडसंहिता में भी चरकसंहिता में निर्दिष्ट आत्रेय के मत तथा कश्यप के मत का उल्लेख मिलता है—
पिवेकल्याणकं सर्पिः ........ (मूल उपो. पृ. ६४)।
इत्यादि वाक्यों में धान्वन्तर औषधों का उपयोग दिया है। तथा छिद्रोदर (पृ. १६८) और अर्शरोग (पृ. १८२) में शस्त्रक्रिया का निर्देश है। इस प्रकार भेड द्वारा भी कश्यप, आत्रेय तथा धन्वन्तरि सम्प्रदायों का आदर किये जाने का वर्णन मिलता है।
सुश्रुतसंहिता के अश्मरी प्रकरण (चि. अ. ७) में निम्न श्लोकों द्वारा शल्यतन्त्र का आचार्य सुश्रुत भी कायचिकित्सा के प्रति आदर प्रकट करता है—