भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २६७

घृतैः क्षारैः कषायैश्च.......(मूल उपो. पृ. ६४)।

अष्टप्रस्थानाचार्य धन्वन्तरि के प्रस्थानान्तर (अन्य विषय संबन्धी) निबन्धों में कौमारभृत्य आदि विशेष विषयों का विशेषरूप में सम्भवतः निर्देश हो। इस शल्यसम्बन्धी निबन्ध (सुश्रुतसंहिता) के भी पूर्वभाग में शारीर स्थान में गर्भिणी के प्रकरण में (पृ. ३०३) प्रसङ्गवश कौमारभृत्यसम्बन्धी विषयों का भी संक्षेप में निर्देश किया गया है। यहां पर अन्य आचार्यों के नामनिर्देश के बिना ही जो इस प्रकार के कौमारभृत्य विषय का वर्णन किया है, वह कश्यप के मत को देखकर लिखा गया है अथवा स्वयं उसका ही मत है यह तो नहीं कहा जा सकता परन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि कौमारभृत्य के विषय में भी उसका प्रवेश अवश्य था। ये स्वयं एक-एक विषय के आचार्य होते हुए अन्य विषयों में उन-उन आचार्यों का सम्मान करते थे। आजकल भी भिन्न-भिन्न अंगों की चिकित्सा में विशेष निपुण (Specialist) पाश्चात्य चिकित्सक अन्य अंगों की चिकित्सा में उस-उस अंग के रोगों के विशेषज्ञों का आदर करते हैं। कायचिकित्सकों (Physicians) को शस्त्रचिकित्सकों (Surgeons) की तथा शस्त्रचिकित्सकों को कायचिकित्सकों की उस-उस विषय में अपेक्षा होती है। तथा यह उचित भी है। किन्तु आत्रेय, भेड आदि ने कश्यप आत्रेय आदि का नामपूर्वक निर्देश किया है, किन्तु सुश्रुत ने कायचिकित्सकों के नाम नहीं दिये हैं अपि तु केवल उनके विषयों का ही निर्देश किया है। कश्यप द्वारा आत्रेय के नाम का निर्देश होने पर भी शिष्योपक्रमणीय अध्याय में ‘धन्वन्तरये स्वाहा' द्वारा देवता रूप में धन्वन्तरि के नाम के निर्देश के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध ग्रन्थ में आचार्य रूप में धन्वन्तरि के नाम का उल्लेख नहीं किया है, अपितु केवल शल्यसम्प्रदाय का ही उल्लेख किया है। वह सम्प्रदाय धन्वन्तरि, दिवोदास अथवा अन्य किसी प्राचीन आचार्य का है, यह नहीं कहा जा सकता है। वेदों में भी शल्यविद्या के मिलने से यह कहा जा सकता है कि वैदिककाल से ही धाराप्रवाह रूप में आने वाली यह शल्यविद्या आत्रेय, कश्यप आदि से पूर्व भी विद्यमान एवं आदृत थी। आत्रेय पुनर्वसु ने भी केवल धन्वन्तरि का ही उल्लेख किया है, दिवोदास तथा सुश्रुत का नहीं। यह नहीं कहा जा सकता है कि धान्वन्तरीय शब्द से सुश्रुत आदि का अभिप्राय है अथवा धान्वन्तर शल्य सम्प्रदाय के अन्य प्राचीन आचार्यों का ग्रहण किया जाता है। उस लेख से केवल शल्यसम्प्रदाय के पूर्व आचार्यों का ही ज्ञान होता है।

इस ग्रन्थ का विषय

इस ग्रन्थ का विषय कौमारभृत्य है। इसका प्रयोजन सुश्रुत ने ‘‘कौमारभृत्यं नाम कुमारभरण.....’’ (मू. उपो. पृ. ६५)। (सू. अ. १) बतलाया है। अर्थात् बालकों के पालनपोषण, धात्री के क्षीरदोष (दूषितदूध) के संशोधन तथा दूषित दूध एवं ग्रहों से उत्पन्न होने वाले रोगों की शान्ति के लिये कौमारभृत्य का प्रयोजन है। सुश्रुत ने अपने ग्रन्थ के शल्यप्रधान होने से सूत्र स्थान¹ के अनुसार उत्तरतन्त्र में २७ से ३८ तक के १२ अध्यायों में कौमारभृत्य विषय का वर्णन किया है। किन्तु वहां पर विशेष रूप से ग्रह, स्कन्द, पूतना आदि के प्रतिषेध तथा उनके लिये कुछ उपयोगी ओषधियों का ही उल्लेख किया है। इस प्रकार इसमें बहुत से ज्ञातव्य विषयों का उल्लेख न होने से सुश्रुत का कौमारभृत्य पूर्ण न होकर आंशिक रूप में ही प्रतीत होता है। चरकाचार्य ने अपने ग्रन्थ में मुख्य रूप से कायचिकित्सा का ही विषय होने के कारण आयुर्वेद के आठ अङ्गों में से कौमारभृत्य का केवल नाम मात्र ही उल्लेख किया है।

इस काश्यपसंहिता में तो बालकों की उत्पत्ति, रोग, निदान, चिकित्सा, ग्रह आदि का प्रतिषेध तथा उससे संबन्धित अन्तर्वत्नी (गर्भिणी) तथा दुष्प्रजाता तथा धात्री आदि के दोषों के निर्हरण के उपयोगी विषयों तथा उसके साथ ही शारीर, इन्द्रिय तथा विमानस्थान आदि में आने वाले विषयों को मुख्यरूप से देकर बीच-बीच में प्रासङ्गिक एवं विषयान्तरों से


१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. ९१ देखें।

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