काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 282, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २६८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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उसकी पूर्ति की है। इस प्रकार ग्रन्थ के आदि से अन्त तक मिलने वाले इस कौमारभृत्य विषय के उपलब्ध भाग की तरह खण्डित भाग में भी मिलने की संभावना होने से इस ग्रन्थ का विषय सर्वाङ्गसम्पन्न कौमारभृत्य प्रतीत होता है। तथा यही बात ग्रन्थ में स्थान-स्थान पर आये हुए बालसंबन्धी प्रश्नोत्तरों, ‘कौमारभृत्यमष्टानां तन्त्राणामाद्यमुच्यते (पृ. ६१) कौमारभृत्यमतिवर्धनमेतदुक्तम्’ (पृ. ९२), इत्यादि ग्रन्थान्तर्गत वाक्यों तथा कहीं-कहीं पुष्पिकावाक्यों में आये हुए ‘कौमारभृत्ये’ (पृ. ९२, १४५ सं. क.) इत्यादि पदों से भी प्रकट होती है।
प्राचीन नावनीतक नामक ग्रन्थ के कौमारभृत्य विषयक चौदहहवें अध्याय में कश्यप तथा जीवक के नामोल्लेख सहित नाना औषध प्रयोगों के मिलने से तथा अष्टाङ्गहृदय के उत्तरतन्त्र में कौमारभृत्य विषयक तीन अध्यायों में कश्यप के नाम से दिये हुए दन्तरोग भैषज्य तथा ग्रहहर दशाङ्गधूप तथा काश्यपसंहिता के अनुरूप स्तन्यदोष परीक्षा आदि के मिलने से ये दोनों लेखक भी कौमारभृत्य के विषय में इसे प्रामाणिक मानते हैं। सुश्रुतसंहिता के कौमारभृत्य प्रकरण में ‘ये च विस्तरतो दृष्टाः कुमाराबाधहेतुभिः’ द्वारा सामान्य निर्देश होने पर भी उसकी व्याख्या में डल्लन द्वारा ‘पार्वतकजीवकबन्धकप्रभृतिभिः’ में उल्लिखित कौमारभृत्य के तीन आचार्यों में से दो का तो केवल नाम ही शेष बचा हुआ है, इस ग्रन्थ के मिलने से जीवक अवश्य हमारे सामने पुनः आ जाता है—
कौमारभृत्यास्त्वपरे जङ्गमस्थावराश्रयात्। द्वियोनिं ब्रुवते धूपं कश्यपस्य मते स्थिताः ॥
(क.स्थान. धू.क.)
काश्यपसंहिता के उपर्युक्त उल्लेख से प्रतीत होता है कि कौमारभृत्य के विषय में अन्य भी प्राचीन आचार्य हुए हैं। कश्यप के अन्य भी अनुयायी थे तथा कौमारभृत्य के विषय में कश्यप प्रधान आचार्य था, यह भी ज्ञात होता है।
कौमारभृत्य के विषय में, शारीरिकप्रकृति के विपरीत हो जाते से, स्कन्दरेवती आदि बालग्रहों की विकृति से तथा स्तन्य आदि के दूषित होने से उत्पन्न होने वाले बालकों के रोगों का उल्लेख करके नाना ओषधियां, बालग्रहप्रतिकार तथा अन्य भी इससे संबन्धित विषय दिये होते हैं। कायचिकित्सा तथा भूतविद्या के बालभैषज्यसंबन्धी तथा गर्भ, धात्री एवं सूतिकासबन्धी विषयों को प्रधानरूप से लेकर तथा उसे ही बढ़ाकर पृथक् प्रस्थान के रूप में इस कौमारभृत्य का उदय होता है। इस प्रकार इस कौमारभृत्य में चिकित्सा के समान के समान भूतविद्या के विषयों का भी प्रवेश है। भैषज्य विद्या के समान भूतग्रहादि प्रतिषेध विद्या वैदिक अवस्था में भी थी। छान्दोग्य उपनिषद् के सप्तम अध्याय में ‘नक्षत्रविद्यांभूतविद्यां सर्पजनविद्याम्’ द्वारा प्राचीन विद्याओं में भूतविद्या का भी निर्देश किया गया है। अथर्ववेद में भी यह विद्या तथा इसके उपयोगी मन्त्र बहुत से मिलते हैं, इसका पहले भी उल्लेख किया जा चुका है। इसीलिये इसे आथर्वणविद्या भी कहा जाता है। इतिहास की दृष्टि से भी यह भूतविद्या प्राचीन काल में सर्वत्र मिलने से अपनी सत्ता को अत्यन्त प्राचीन कालीन सिद्ध करती है।
कौमारभृत्य के विषय में आजकल क्रियाकालगुणोत्तरतन्त्र मिलता है। उसमें बालकों के रोगों को उत्पन्न करने वाले ग्रह, उस-उस दिन, मास तथा वर्ष के भेद से पीडा पहुंचाने वाले विशेष बालग्रह तथा उनके निवारक मन्त्रप्रयोग, कल्प, कुछ ओषधियां तथा धातु आदियों का वर्णन किया गया है। इसमें शकुनी, रेवती, पूतना आदि के अतिरिक्त अन्य भी सैकड़ों बालग्रह दिये हैं। मन्त्रों में भी पौराणिक छाया मिलती है तथा विधानमाला से उद्धृत स्कन्द तथा मार्कण्डेय पुराण के वाक्य दिये हुए हैं। आजकल बालतन्त्र के विषय में बालचिकित्सामृत¹ कल्याणवर्मा कृत, बालतन्त्र तथा योगसुधानिधि आदि अर्वाचीन ग्रन्थ भी मिलते हैं। इनमें भी वर्ष, मास तथा दिनों के भेद से विभिन्न बालग्रह दिये हुए हैं। इस प्रकार
१. बालचिकित्सामृत नाम की ताडपत्र पर लिखित जीर्णप्राय पुस्तक नेपाल के राजकीय पुस्तकालय में है जिसमें अपने तथा दूसरों के बनाये हुए पद्यों में बालरोगों की ओषधियों का संग्रह किया गया है।