काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 283, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
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इन ग्रन्थों में तथा क्रियाकालगुणोत्तर तन्त्र में समान छाया मिलती है। इस काश्यपसंहिता में तो ग्रह पूतना आदि थोड़े ही ग्रह दिये हैं तथा वर्ष, मास एवं दिन के भेद से विभिन्न ग्रह भी नहीं दिये हैं, स्कन्द रेवती तथा पूतना आदि प्राचीन नामों से ही इनका उल्लेख किया गया है। इसमें मन्त्रों में भी प्रायः वैदिक छाया मिलती है। कहीं-कहीं (मातङ्गीविद्या के प्रकरण (पृ. २०० में) प्राकृतिक शब्दों से युक्तमन्त्र मिलते हैं तथा भैषज्य विषय भी भिन्न ही है। इस प्रकार इन दोनों में विभिन्न प्रक्रिया दिखाई देती है। दोनों ग्रन्थों के विषयों की तुलना करने पर क्रियाकालगुणोत्तर तन्त्र में विकसित अवस्था दिखाई देती है तथा काश्यपसंहिता में उसकी अपेक्षा अत्यन्त प्राचीन सम्प्रदाय का आश्रय मिलता है। सुश्रुत में दिये हुए बालग्रहों में भी विकसित अवस्था नहीं मिलती है।
रावणकृत¹ बालकुमारतन्त्र, कुमारतन्त्र अथवा दशग्रीवबालतन्त्र नामक एक प्राचीन बालतन्त्र मिलता है। ऐसा भी सुना जाता है कि इस तन्त्र का छठी-सातवीं शताब्दी में चीनीभाषा में किया गया अनुवाद भी है। इस ग्रन्थ के विषय में ‘बिब्लियोथीक नेशनल पेरिस’ नामक पुस्तक में विशेष विवरण दिया हुआ है। उस प्राचीन काल में तथा इतनी दूर अनुवाद के होने से ग्रन्थ को इससे भी प्राचीन होना चाहिये। इस ग्रन्थ में भी वर्ष मास तथा दिनों के भेद के अनुसार ग्रह पूतना आदि के भेदों का उल्लेख होने से विकसित अवस्था को भी अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता, तब अविकसित अवस्था को तो इससे भी अवश्य प्राचीन होना चाहिये।
बालग्रह रूप से स्कन्द का उल्लेख तथा उसकी आराधना विधि इस संहिता में मिलती है। स्कन्द की उपासना प्रणाली प्राचीन है। छान्दोग्य² उपनिषद्, गीता³ तथा महाभारत⁴ में भी स्कन्द का उल्लेख मिलता है। महाभारत के वनपर्व में स्त्रियों के गर्भनाशक तथा बालकों के रक्षाकर रूप में स्कन्द का उल्लेख है। स्कन्द आदियों का बालग्रह के रूप में महाभारत तथा सुश्रुत में प्रायः समानरूप से वर्णन किया गया है। पारस्कर गृह्यसूत्र में भी नवजात बालक के विनाश के हेतुरूप में स्कन्द का उल्लेख किया गया है। इसका श्रीयुत मन्मथ⁵ नाथ मुखोपाध्याय ने विशेषरूप से वर्णन किया है।
इस काश्यप संहिता में स्थान-स्थान पर मिलने वाले अनेक नवीन विषय, विचार, सुन्दर निरूपण शैली तथा विशेष दृष्टिकोण इस निबन्ध के विषय में प्राचीन ऋषियों के विचारों की उच्चता को प्रकट करते हैं।
उदाहरण के लिये
दन्तजन्माध्याय (पृ. ११) में दांतों के भेद, उनके सम्पक् एवं असम्पत् (गुण और दोष), बालक तथा बालिकाओं के दांतों में भेद इत्यादि दांतों के विषय में अनेक कई बातें मिलती हैं जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं होती हैं।
स्वेदाध्याय (पृ. २६) में स्वेद के विषय में अनेक ज्ञातव्य विषयों का निरूपण किया है। आधुनिक बाष्पस्वेद (Steam bath) आदि की प्रक्रियाओं से इसमें कोई कमी दिखाई नहीं देती। बालकों के स्वेदन के विषय में मार्मिक प्रक्रिया का वर्णन मिलता है।
लक्षणाध्याय (पृ. ५७) में सामुद्रिक लक्षणों का विशेष वर्णन किया है परन्तु के अन्त में खण्डित हैं। लक्षणप्रकाशोद्धृत पाराशरसंहिता में भी इसी प्रकार के प्रौढ़ सामुद्रिक लक्षण दिये हैं। इस ग्रन्थ के खण्डित अंश के विषय को भी वहीं से देखना चाहिये।
१. इस बालतन्त्र में नन्दा, सुनन्दा, पूतना, मुखमण्डिका कटपूतना, शकुनिका, शुष्करेवती, अर्यका, सूतिका, निर्ऋतिका, पिलिपिच्छिका तथा कामुका इन १२ मातृकाओं का निर्देश है। ग्रन्थलेख निम्न प्रकार से है—
प्रथमे दिवसे मासे वर्षे वा....(मूल उपोद्घात पृ. ९२ देखें)।
(१) २-५ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ९३ देखें।