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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

२६९

इन ग्रन्थों में तथा क्रियाकालगुणोत्तर तन्त्र में समान छाया मिलती है। इस काश्यपसंहिता में तो ग्रह पूतना आदि थोड़े ही ग्रह दिये हैं तथा वर्ष, मास एवं दिन के भेद से विभिन्न ग्रह भी नहीं दिये हैं, स्कन्द रेवती तथा पूतना आदि प्राचीन नामों से ही इनका उल्लेख किया गया है। इसमें मन्त्रों में भी प्रायः वैदिक छाया मिलती है। कहीं-कहीं (मातङ्गीविद्या के प्रकरण (पृ. २०० में) प्राकृतिक शब्दों से युक्तमन्त्र मिलते हैं तथा भैषज्य विषय भी भिन्न ही है। इस प्रकार इन दोनों में विभिन्न प्रक्रिया दिखाई देती है। दोनों ग्रन्थों के विषयों की तुलना करने पर क्रियाकालगुणोत्तर तन्त्र में विकसित अवस्था दिखाई देती है तथा काश्यपसंहिता में उसकी अपेक्षा अत्यन्त प्राचीन सम्प्रदाय का आश्रय मिलता है। सुश्रुत में दिये हुए बालग्रहों में भी विकसित अवस्था नहीं मिलती है।

रावणकृत¹ बालकुमारतन्त्र, कुमारतन्त्र अथवा दशग्रीवबालतन्त्र नामक एक प्राचीन बालतन्त्र मिलता है। ऐसा भी सुना जाता है कि इस तन्त्र का छठी-सातवीं शताब्दी में चीनीभाषा में किया गया अनुवाद भी है। इस ग्रन्थ के विषय में ‘बिब्लियोथीक नेशनल पेरिस’ नामक पुस्तक में विशेष विवरण दिया हुआ है। उस प्राचीन काल में तथा इतनी दूर अनुवाद के होने से ग्रन्थ को इससे भी प्राचीन होना चाहिये। इस ग्रन्थ में भी वर्ष मास तथा दिनों के भेद के अनुसार ग्रह पूतना आदि के भेदों का उल्लेख होने से विकसित अवस्था को भी अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता, तब अविकसित अवस्था को तो इससे भी अवश्य प्राचीन होना चाहिये।

बालग्रह रूप से स्कन्द का उल्लेख तथा उसकी आराधना विधि इस संहिता में मिलती है। स्कन्द की उपासना प्रणाली प्राचीन है। छान्दोग्य² उपनिषद्, गीता³ तथा महाभारत⁴ में भी स्कन्द का उल्लेख मिलता है। महाभारत के वनपर्व में स्त्रियों के गर्भनाशक तथा बालकों के रक्षाकर रूप में स्कन्द का उल्लेख है। स्कन्द आदियों का बालग्रह के रूप में महाभारत तथा सुश्रुत में प्रायः समानरूप से वर्णन किया गया है। पारस्कर गृह्यसूत्र में भी नवजात बालक के विनाश के हेतुरूप में स्कन्द का उल्लेख किया गया है। इसका श्रीयुत मन्मथ⁵ नाथ मुखोपाध्याय ने विशेषरूप से वर्णन किया है।

इस काश्यप संहिता में स्थान-स्थान पर मिलने वाले अनेक नवीन विषय, विचार, सुन्दर निरूपण शैली तथा विशेष दृष्टिकोण इस निबन्ध के विषय में प्राचीन ऋषियों के विचारों की उच्चता को प्रकट करते हैं।

उदाहरण के लिये

दन्तजन्माध्याय (पृ. ११) में दांतों के भेद, उनके सम्पक् एवं असम्पत् (गुण और दोष), बालक तथा बालिकाओं के दांतों में भेद इत्यादि दांतों के विषय में अनेक कई बातें मिलती हैं जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं होती हैं।

स्वेदाध्याय (पृ. २६) में स्वेद के विषय में अनेक ज्ञातव्य विषयों का निरूपण किया है। आधुनिक बाष्पस्वेद (Steam bath) आदि की प्रक्रियाओं से इसमें कोई कमी दिखाई नहीं देती। बालकों के स्वेदन के विषय में मार्मिक प्रक्रिया का वर्णन मिलता है।

लक्षणाध्याय (पृ. ५७) में सामुद्रिक लक्षणों का विशेष वर्णन किया है परन्तु के अन्त में खण्डित हैं। लक्षणप्रकाशोद्धृत पाराशरसंहिता में भी इसी प्रकार के प्रौढ़ सामुद्रिक लक्षण दिये हैं। इस ग्रन्थ के खण्डित अंश के विषय को भी वहीं से देखना चाहिये।


१. इस बालतन्त्र में नन्दा, सुनन्दा, पूतना, मुखमण्डिका कटपूतना, शकुनिका, शुष्करेवती, अर्यका, सूतिका, निर्ऋतिका, पिलिपिच्छिका तथा कामुका इन १२ मातृकाओं का निर्देश है। ग्रन्थलेख निम्न प्रकार से है—
प्रथमे दिवसे मासे वर्षे वा....(मूल उपोद्घात पृ. ९२ देखें)।
(१) २-५ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ९३ देखें।

२७० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

रोगों में अन्य उपद्रवों के उत्पन्न हो जाने पर पूर्व रोग या उपद्रव की पृथक्-पृथक् चिकित्सा के सिद्धान्त को न मानकर दोनों की साथ-साथ चिकित्सा के विषय में अपनी सम्मति दी है। (पृ. ३९)।

प्रसव के विलम्ब होने में (Delayed delivery) अन्य आचार्यों के व्यायाम तथा मुसल आदि के द्वारा आघात करने के पक्ष का युक्तिपूर्वक खण्डन किया गया है (पृ. ८५)।

अत्यन्त छोटे बालकों में अश्मरी के उद्धरण तथा तीक्ष्ण ओषधियों के प्रयोग का विशेष रूप से निषेध किया गया है (पृ. १२२)।

बालकों में बस्तिकर्म के अच्छी प्रकार प्रयुक्त किये जाने पर वैद्य बालक तथा उसके पिता आदि सबके लिये वह श्रेयस्कर है तथा ठीक प्रकार से प्रयुक्त न की जाने पर अनर्थ करती है, इस लिये बालकों में किस समय से लेकर बस्तिकर्म करना चाहिये, इस विषय में अनेक आचार्यों तथा अपने मत को देकर विशेष विचार किया गया है (पृ. १४७)।

बालकों के फक्कारोग में तीन पहियों के रथ के निर्माण का उल्लेख मिलता है (पृ. १४१)

एकनाभिकयोः कस्मात् तुल्यं मरणजीवितम् । रोगारोग्यं सुखं दुःखं न तु तृप्तिः समानजा ।।
(पृ. १९४)

इत्यादि वाक्यों द्वारा यमल (जुडवां बालक-Twins) के विषय में विचित्र प्रश्न तथा युक्तिपूर्वक उत्तर दिया है विषमज्वर के निर्देश में तृतीयक, चातुर्थिक आदि ज्वरों के उस-उस दिन होने के कारणों का वर्णन किया है (पृ. २२९)।

अन्य सब आचार्यों द्वारा बालकों के छठे मास में अन्नप्राशन का विधान देने पर भी इस संहिता के आचार्य ने उस संस्कार का निर्देश करके छठे मास में केवल फलों के सेवन तथा १२ मास के बाद अन्न चाहने पर थोड़ा-थोड़ा अन्न देने का विधान दिया होने से, क्षीण अग्निबल वाले अत्यन्त छोटे बालक को मृदु पाकवाले फलों के रस तथा एक वर्ष के बाद अन्न का उपयोग लिखा है। आधुनिक पाश्चात्य विद्वान् भी इसी प्रकार अत्यन्त छोटे बालकों को फलों का उपयोग कराते हैं तथा १२ मास के बाद ही वे अन्न के उपयोग के पक्ष में हैं (खि. स्था. अ. १३)।

वेदनाध्याय में वाणी के द्वारा अपनी वेदना को प्रकट करने में असमर्थ बालकों की भिन्न-भिन्न चेष्टाओं के द्वारा अमुक-अमुक रोग तथा अमुक-अमुक अङ्गों की वेदनाओं के आनुमानिक ज्ञान का वर्णन मिलता है (पृ. ३३)।

आप्ततश्रोपदेशेन प्रत्यक्षकरणेन च । अनुमानेन च व्याधीन् सम्यग् विद्याद्विचक्षणः ।।

चरकसंहिता विमान स्थान के चतुर्थ अध्याय के उपर्युक्त श्लोक द्वारा निदान, पूर्वरूप तथा रूप (लक्षण) आदियों को जानने के लिये प्रत्यक्ष आदि उपाय दिये हैं। सुश्रुत ने भी दर्शन, स्पर्शन तथा प्रश्न आदि उपायों का उल्लेख किया है। इस प्रकार प्राचीन सम्प्रदाय में दर्शन, स्पर्शन तथा प्रश्न आदियों के द्वारा निदान आदि पञ्चरूपों की विवेचना करके रोगज्ञान का निर्देश किया है। नाडीविज्ञान का उल्लेख चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन ग्रन्थों तथा इस काश्यपसंहिता में भी नहीं मिलता है। नाडीपरीक्षा का उल्लेख अर्वाचीन ग्रन्थों में ही मिलने से यह विषय पीछे से प्रचलित हुआ प्रतीत होता है। नाडीविज्ञान के भारत से चीन में जाने के कारण यह विज्ञान भारतीय ही प्रतीत होता है। यह विज्ञान भारत में ही आविर्भूत हुआ है अथवा किसी दूसरे देश से यहां आकर प्रचलित हुआ है, यह विषयान्तर होने से इसके विषय में हम अधिक विचार नहीं करेंगे। अस्तु, प्राचीन ग्रन्थों में इस विषय के न मिलने से इसे प्राचीन कहना कठिन है। अत्यन्त छोटे बालकों में अपने कष्ट को दूसरों को यथावत् समझाने के लिये वाक्शक्ति के उदय न होने से उसकी भिन्न-भिन्न चेष्टाओं से रोगों को पहचानने की प्रक्रिया इस काश्यपसंहिता के वेदनाध्याय (पृ. ३३) में तथा अन्यत्र भी स्थान-स्थान पर मिलती है।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २७१

सूक्ष्म विचार शक्ति से विस्तृत दृष्टिकोण वाले प्राचीन आचार्य जिस-जिस विषय में भी प्रवृत्त होते हैं उस-उस विषय के अन्तस्तल तक प्रवेश करके यथावत् ज्ञान कराते हैं। कौमारभृत्य के विषय में प्रवृत्त हुए आचार्य कश्यप ने अन्य आचार्यों द्वारा सर्वसाधारण विषयों की तरह बालकों (विशेषकर अत्यन्त छोटे बालकों) के सम्बन्ध में अनेक उपयोगी विषयों का संकेत किया है।

वात, पित्त कफ आदि तीनों दोषों का निर्देश वैदिक साहित्य में भी मिलता है। ऋग्वेद में 'त्रिधातु शर्म वहतं शुभस्पती' द्वारा त्रिधातु शब्द का उल्लेख किया है। इस शब्द की सायन ने वात, पित्त, कफ रूप त्रिदोषपरक व्याख्या की है। ब्लूमफील्ड नामक विद्वान् ने भी उसी व्याख्या को स्वीकार किया है। जीमर आदि कुछ विद्वानों ने इसका दूसरा ही अर्थ किया है। किन्तु पी. सी. राय¹ महोदय लिखते हैं कि अथर्ववेद में आये हुए वातगुल्म तथा 'वातीकृता' इत्यादि पदों में दूसरे अर्थ की सङ्गति न होने से तथा सर्वत्र एक ही रूप के औचित्य के कारण यह शब्द त्रिदोषपरक ही होना चाहिये। इसका दूसरा अर्थ करना सङ्गत नहीं है। यह त्रिदोषपद्धति ग्रन्थों में भी आत्रेय, कश्यप तथा सुश्रुत आदि से लेकर आज तक धाराप्रवाह रूप से चली आ रही है। सुश्रुतसंहिता में अनेक स्थानों पर वात, पित्त कफ आदि तीनों दोषों अथवा धातुओं को देहसंभव तथा रोगोत्पत्ति में कारण माना गया है। सुश्रुत में कहीं-कहीं त्रिदोष² के साथ रक्त को भी चतुर्थ कारण माना है। प्राचीन महावग्ग के प्राचीन बौद्ध वैद्यक ग्रन्थ तथा ब्रावर द्वारा उपलब्ध नावनीतक आदि ग्रन्थों में भी त्रिदोषपद्धति का ही अवलम्बन किया प्रतीत होता है। महावग्ग तथा विनयपिटक में जीवक की चिकित्सापद्धति में भी यही त्रिदोषप्रक्रिया मिलती है। कात्यायन के वार्तिक में भी वात, पित्त तथा कफ का व्यवहार दिखाई देता है। ४६० वर्ष ईस्वी पूर्व प्राचीन हिपोक्रिटस नामक पाश्चात्त्य चिकित्सक के जन्म से पहले भी भारत में त्रिदोषपद्धति विद्यमान थी। उसके चिकित्सा विज्ञान में पित्त, कफ, रक्त तथा जल आदि चारों को जो दोष के रूप में दिया है, वह भी उसका हृदय भारतीय प्राचीन त्रिदोषपद्धति से अनुरक्त होने के कारण सुश्रुत के विचारों की विकसित अवस्था प्रतीत होती है।

प्राचीन विज्ञान में अग्नि³ तथा सोम अथवा उष्ण⁴ और शीत ये दो मौलिक तत्त्व माने गये हैं जो कि स्पष्टरूप से सब पदार्थों में ओतप्रोत हैं। जिससे वैदिक यज्ञप्रक्रिया में प्रारम्भ से ही अग्नि तथा सोम की उपासना की परिपाटी चली आ रही है। शारीरिक परिस्थिति में भी शीत तथा उष्ण के प्रतिनिधि सोम तथा अग्निरूप शुक्र तथा शोणित को शरीर की उत्पत्ति का कारण माना है इसीलिये सुश्रुत में गर्भ को 'अग्नीषोमीय' कहा है। प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने वात के योगवाही होने से पित्त अथवा कफ के साथ मिल जाने पर भी अर्थ तथा क्रिया की विकसित दृष्टि के कारण सत्त्व, रज तथा तम की तरह अग्नि, वायु तथा सोमरूप वात, पित्त, कफ तीनों धातु देह की धारक तथा विकृत होने पर दोषरूप होकर रोगों के कारण के रूप में मानी है, इसी सिद्धान्त के अनुसार स्थापित त्रिदोष-पद्धति को ही कश्यप आत्रेय तथा भेड आदि प्राचीन आचार्यों ने ग्रहण किया था। ज्यों-ज्यों क्रमशः विचारों में प्रगति आती है त्यों-त्यों नये-नये सिद्धान्त उदित होते जाते हैं। इसीलिये सुश्रुत ने पहले वात, पित्त, कफ इन तीन दोषों को ही प्रधानरूप से रोगों का कारण बतलाकर भी पुनः विकृत रक्त के द्वारा भी बहुत से अनर्थों (रोगों) को देखकर तीनों दोषों के समान चतुर्थ रक्त को भी प्रधान कारण स्वीकार किया है। हिपोक्रिटस के चिकित्सा विधान में भी पित्त, कफ, रक्त तथा जल इन चारों को जो दोषरूप में माना है, वह भी उसका हृदय भारतीय प्राचीन त्रिदोषपद्धति से अनुरक्त होने के कारण सुश्रुत के विचारों की विकसित अवस्था प्रतीत होती है। इस प्रकार ये विकसित हुए विचार कालक्रम से प्राचीन पद्धति के ही परिष्कृत रूप प्रतीत होते हैं।

काश्यपसंहिता के कल्पस्थान (पृ. १७४) में में अद्भुत एवं विस्तृत लशुन कल्प का प्रयोग किया हुआ है। चीन देश के कासगर नामक स्थान में बावर नामक पाश्चात्त्य अन्वेषक को भूगर्भ से बौद्ध स्तूप के साथ सात ग्रन्थ उपलब्ध


१. १-४ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ९४-९५ देखें।

२७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

हुए हैं जिनमें से तीन ग्रन्थ वैद्यक के है। इनमें से प्रथम नावनीतक है। दूसरे ग्रन्थ में विस्तारपूर्वक लशुन के गुण दिये हैं तथा तीसरा एक ७२ पृष्ठ का ग्रन्थ है जिसमें अनेक ओषधियों के योग दिये हुए हैं। यह पहले ही कहा जा चुका है कि इनकी लिपि के प्राचीन होने से इनका निर्माण काल और प्राचीन होना चाहिये। मुद्रित नावनीतक में भी प्रारम्भ से ही विस्तारपूर्वक काशिराज द्वारा सुश्रुत को लशुन के विधान का उपदेश दिया गया है। उसमें लशुन की उत्पत्ति तथा कुछ प्रयोगों में भेद होने पर भी बहुत अंशों में काश्यपीय लशुन कल्प की छाया मिलती है। भाषा की रचना को देखने पर भी नावनीतक की अपेक्षा काश्यप के लेख में प्राचीनता झलकती है। चरकसंहिता में भी लशुन का प्रयोग दिया है। इस प्रकार प्राचीनकाल के चिकित्साग्रन्थों में भी मिलनेवाले लशुन के उपयोग को देखकर अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न नहीं होनी चाहिये। लशुन के गुणों की अधिकता के कारण 'रसेन ऊनम्' (केवल एक रस की कमी) इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसे 'रसोन' कहते हैं। चिकित्सा में यह विशेष उपयोगी है। धार्मिक दृष्टि से यद्यपि स्मृतिग्रन्थों में इसे ब्राह्मणों (द्विजों) के लिये अवश्य गर्हित माना है किन्तु चिकित्सा के ग्रन्थों में इसकी बहुत महिमा बतलाई है। इस काश्यपसंहिता के कल्पाध्याय में महर्षि कश्यप ने अमृत के उद्गार (डकार) से इसकी उत्पत्ति को बतलाकर केवल स्थान दोष से दुर्गन्धित होने के कारण धर्मशास्त्र की मर्यादा के अनुसार द्विजों द्वारा स्पष्टरूप से अग्राह्य होने पर भी लोकोपकार की दृष्टि से इसकी गुणमहिमा तथा कल्प का वर्णन किया है। जातिविशेष द्वारा निषिद्ध सुरा आदि तथा सबके लिये अभक्ष्य हस्तिमांस तथा गदहे के मूत्र आदि के भी गुणों को दृष्टि में रखते हुए आर्षग्रन्थों में भी भिन्न-भिन्न रोगों में इनका उल्लेख किया गया है। गुणों के वर्णन मात्र से हम यह कभी नहीं कह सकते कि वे उपदेशक बिलकुल धर्मभावना से शून्य थे। तथा इसका यह भी कभी अभिप्राय नहीं है कि धर्मपरायण व्यक्तियों को भी इसका सेवन अवश्य करना चाहिये, क्योंकि कहा भी है—

न शास्त्रमस्तीत्येतावत् प्रयोगे कारणं भवेत् । रसवीर्यविपाका हि श्वमांसस्यापि वैद्यके ।।
(वात्स्यायनीये कामसूत्रे सां. अ. अ. २)

(अर्थात् केवल शास्त्र में वर्णित होने से ही किसी वस्तु का उपयोग करना आवश्यक नहीं क्योंकि वैद्यक में तो कुत्ते के मांस के भी रस, वीर्य, विपाक आदि गुणों का वर्णन मिलता है) यद्यपि श्येनयाग हिंसा की दृष्टि से अनुपादेय है इस दोष को स्वीकार करके भी इस लोक के उत्तम फलों को चाहने वालों की इष्टसिद्धि के लिये 'श्येनेनाभिचरन् यजेत' यह वैदिक विधान मिलता ही है। 'यो हि हिंसितुमिच्छेत् तस्यायमभ्युपायः' द्वारा मीमांसा भाष्य के टीकाकार शवरस्वामी ने भी इसका समर्थन किया है। लशुन का उल्लेख गौतमधर्म सूत्र (१५-३०), मनुस्मृति (५-५-१९), याज्ञवल्क्य स्मृति (१. १७६) तथा महाभारत (८. २०३४, १३. ४३६३) आदि में भी मिलता है।

हिंगु (हींग-Asafoetada) को देखकर भी अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न नहीं हो सकती। क्योंकि हींग का अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय ग्रन्थों में उपयोग मिलता है। धार्मिक ग्रन्थों में भी श्राद्ध आदि में हींग का पितृप्रिय (पितरों को प्रिय) के रूप में उल्लेख मिलता है। चरक, सुश्रुत तथा काश्यप संहिता में भी स्थान-स्थान पर ओषधियों के साथ इसका उपयोग मिलता है। काश्यपसंहिता आदि में हींग के लिये बाह्लीक शब्द का भी प्रयोग किया गया है। इसलिये संभवतः बाह्लीक देश (बलख-अफगानिस्तानका प्रदेश) बालों से भारतीयों ने इसका उपयोग एवं परिचय प्राप्त किया हो। इसीलिये उस देश के नाम के अनुसार ही इसका नाम प्रतीत होता है। परन्तु आत्रेय तथा कश्यप आदि द्वारा बाह्लीक भिषक् कांसायन तथा बाह्लीकों के पुनः-पुनः उल्लेख से प्रतीत होता है कि भारत तथा बाह्लीक देश का परस्पर सम्पर्क तथा इन देशों के वैद्यों का परस्पर परिचय अत्यन्त प्राचीन काल से था। बाह्लीकप्रदेश यवनों (यूनानियों) के आक्रमण से पूर्व भी ईरानियन जाति के साम्राज्य में प्रतिष्ठित बलख नामक प्रदेश था। उस इरानजाति की उन्नति के समय उस जाति के वैद्य तथा उनकी ओषधियों का भारत के प्राचीन ग्रन्थों में मिलना संगत ही है।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २७३

भावप्रकाश में पारसीक यवानी (खुरासानी अजवायन) के उल्लेख द्वारा अन्य देशों की वस्तुओं के मिलने पर भी चरक, सुश्रुत तथा काश्यप संहिता आदि प्राचीन ग्रन्थों में इसका उल्लेख नहीं मिलता है। किन्तु केवल यवानी शब्द का ही निर्देश है। यवानी शब्द न तो यवन शब्द से ही बना है और न यह यवन के संबन्ध को प्रकट करता है। 'इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलाचार्याणामानुकू' (पा. सू. ४-१-४९) इस सूत्र में पाणिनि ने यव शब्द से यवानी शब्द बनाया है। वार्त्तिककार कात्यायन ने 'यवाद्दोषे' द्वारा दुष्ट (कुत्सित) यव के अर्थ में स्त्रीलिङ्ग में यवानी शब्द बनाया है। इस प्रकार यह प्राचीन यवानी शब्द भी भारतीय ही है। इससे अन्य शंकाएं नहीं होनी चाहिये।

इस ग्रन्थ में आये हुए देशों का वर्णन

इस पुस्तक के उपलब्ध अन्तिम पृष्ठ पर आये हुए देशसात्म्याध्याय (खिल स्था.) में देश विशेष के अनुसार रोग विशेषों का वर्णन करने के लिये उस समय इस विद्या (आयुर्वेद) की उन्नति की दृष्टि से प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र को मध्य (Center) मानकर उसी के अनुसार पूर्व आदि दिशाओं के देशों का उल्लेख मिलता है। यदि यह अध्याय सम्पूर्ण रूप में मिलता तो उस समय के अन्य भी बहुत से देशों का परिचय मिल सकता था। परन्तु इस अध्याय के यहीं बीच में खण्डितरूप में ही समाप्त हो जाने से भूखे व्यक्ति के मुंह से बलात् आधा ग्रास छीन लिये जाने के समान उत्कण्ठा को बीच में ही रोकना पड़ता है। अन्तिम भाग के लुप्त हो जाने के कारण पश्चिम तथा उत्तर दिशा के देशों का परिचय न मिलने पर भी पूर्व एवं दक्षिण दिशा के कुछ देशों का परिचय मिलता है। पूर्व एवं दक्षिण दिशा के भी सब प्राचीन देशों का उल्लेख नहीं है, अपितु केवल रोगोचित कुछ देशों का ही उल्लेख है। इनमें से प्रियङ्गुनवधान-वानसी-कुमुद-विदेह तथा घट आदि देशों का अन्य उपलब्ध ग्रन्थों में संवाद के न मिलने से निश्चय न हो सकने पर भी इन साथ आये हुए निम्नलिखित देशों के नाम प्राचीन प्रतीत होने के कारण उपर्युक्त सब देशों के नाम भी प्राचीन काल से व्यवहृत किये जाते प्रतीत होते हैं। निम्नलिखित देशों के नामों का प्राचीन परिचय सहित उल्लेख श्रीयुत् कनिङ्घाम नामक विद्वान् (Ancient geography of india), श्री नन्दलाल महोदय (Geographical dictionary) तथा E. J. Rapson (Ancient India cambridge (History of India vol I) आदि प्राचीन भौगोलिक ग्रन्थों में किया है।

मध्य में—कुरुक्षेत्र प्रदेश जो कि १०० योजन के घेरे में था। यह सर्वत्र प्रसिद्ध ही है।

पूर्व दिशा के देश—

कुमारवर्तिनी—महाभारत (सभा. अ. २९) में कुमार देश का उल्लेख मिलता है। यह रीवा के पास का कुमार देश कहलाता है।

कटीवर्ष—बङ्गाल के वर्धमान प्रान्त में आजकल कटवा प्रदेश नाम से प्रसिद्ध है।

मगध—ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में भी मगध देश का उल्लेख मिलने से प्राचीन समय से ही इसकी इसी नाम से प्रसिद्धि मिलती है। मागध का उल्लेख तैत्तिरीय ब्राह्मण (३-४-१-१) तथा जैमिनीय ब्राह्मण (१६५) में भी है।

ऋषभ द्वीप—महाभारत (वनपर्व अ. ८५) में ऋषभ का उल्लेख है। बृहत्संहिता में भी दक्षिण में ऋषभ का निर्देश है। कुछ लोग इसे मदुरा के समीपस्थ ऋषभ पर्वत का प्रदेश मानते हैं। परन्तु पूर्व दिशा में स्थित ऋषभ देश से ही इसका अभिप्राय होना चाहिये।

पौण्ड्रवर्धनक—इसे पुण्ड्रवर्धन भी कहते हैं। यह पुण्ड्र देश की राजधानी थी। हरिवंश, पद्म तथा ब्रह्माण्डपुराण में वासुदेव नामक राजा की राजधानी के रूप में इसका निर्देश है। आजकल यह मालदा प्रान्त में स्थित पाण्डुवा प्रदेश कहलाता है। महाभारत में भीमदिग्विजय में पूर्व दिशा में पुण्ड्र देश का उल्लेख है तथा बराहसंहिता में पौण्ड्रदेश का

२७४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

उल्लेख मिलता है। श्रीयुत पार्जिटर महोदय इन दोनों को भिन्न-भिन्न मानकर पुण्ड्र को गंगा के उत्तर में अङ्ग (पूर्वी बिहार-भागलपुर का जिला) तथा बङ्ग देश के मध्य में, तथा पौण्ड्र को गङ्गा के दक्षिण में वर्तमान सन्थाल परगने के अन्तर्गत वीरभूम प्रदेश कहते हैं।

मृत्तिकावर्धमानक—यह संभवतः वर्धमान प्रदेश है। मार्कण्डेय पुराण तथा वेतालपञ्चविंशति आदि में विन्ध्य के उत्तर में तथा देवीपुराण (अ. ४६) में वङ्ग के समीप वर्धमान देश का उल्लेख किया गया है।

कर्वट—महाभारत के भीमदिग्विजय में पूर्व में कर्वट देश का उल्लेख है। बृहत्संहिता में भी इसका निर्देश मिलता है।

मातङ्ग—युक्तिकल्पतरु नामक ग्रन्थ में कामरूप के दक्षिणपूर्व में मातङ्ग देश का रत्नों की खान के रूप में निर्देश किया गया है।

ताम्रलिप्त—इसका महाभारत (भीष्म. अ. ९, सभा. अ. २९) के भीमदिग्विजय, बृहत्संहिता तथा अन्य भी पुराण, बौद्धग्रन्थ तथा दशकुमारचरित आदि में भी उल्लेख मिलता है। ह्युन्सङ्ग ने भी इसका उल्लेख किया है। अशोक के शिलालेखों में भी इसका निर्देश है। यह बङ्गाल के मेदिनापुर प्रान्त में तमलूक नाम से प्रसिद्ध स्थान प्रतीत होता है।

चीनक¹—चीन देश का उल्लेख महाभारत (सभा. अ. ५१) तथा मनुस्मृति (१०-४४) में भी है। साहित्य परिषत् पत्रिका में चीन शब्द का वर्तमान अनामा (Annama) देश के बोधक के रूप में उल्लेख किया गया है। रेशमी वस्त्रों की प्राचीन काल से चीनांशुक के रूप में प्रसिद्धि रही है। तथा बर्माप्रदेश में रेशमी वस्त्रों का व्यापार भी था, तथा वहां चीन का का राज्य भी था। चीनक इस कप्रत्ययान्त शब्द से लघुचीन के रूप में उस प्रदेश का बोध होता है।

कौशल्य—कोशाल तथा उत्तर कोशाल देश का रामायण (उत्तर अ. १०), पद्मपुराण (उत्तर अ. ६८) तथा अवदान शतक आदि में भी निर्देश मिलता है।

कलिङ्ग—महाभारत (वन. अ. ११३) के सहदेव दिग्विजय, बृहत्संहिता तथा अशोक के शिलालेखों में भी इसका उल्लेख मिलता है। महाभारत के समय उत्कल का बहुत सा हिस्सा कलिङ्ग राज्य के अन्तर्गत था। कालिदास के समय कलिङ्ग तथा उत्कल भिन्न २ थे (रघुवंश सर्ग ४)

दक्षिण दिशा के देश

काञ्ची—महाभारत (भीष्म. अ. ९) पद्मपुराण (उत्तर अ. ७४) में भी इसका उल्लेख है। महाभाष्य में भी चीर, चोल तथा काञ्ची का उल्लेख मिलता है। द्रविड़ चोल देश की राजधानी थी। काञ्ची आजकल भी 'काञ्चीबरम्' नाम से प्रसिद्ध है।

काबीर—यह कावेरी नदी के आसपास का प्रदेश प्रतीत होता है। कावेरी का उल्लेख स्कन्दपुराण में मिलता है। कालिदास ने भी इसका उल्लेख किया है। (रघुवंश सर्ग ४)

चिरिपाली—यह त्रिचिनापल्ली का ही दूसरा नाम प्रतीत होता है। त्रिशिर नामक रावण के सेनापति के नाम से इसका नाम पहले त्रिशिरः पल्ली था। उसीकी समयान्तर से त्रिचिनापल्ली नाम से प्रसिद्धि हो गई है। कालान्तर से इसी के उरगपुर तथा निचुलपुर आदि नाम भी हो गए हैं। प्राचीन काल में यह पाण्ड्य तथा चोलों की राजधानी थी।


१. इस संहिता में 'सचीरकम्' यह पाठ छपा होने पर भी चीर का आगे दक्षिण के देशों में वर्णन होने से पूर्व दिशा में चीन के ही औचित्य होने से तथा प्राचीन लिपि में नकार के स्थान पर रकार पाठ की सम्भावना होने से 'सचीनकम्' पाठ ही उचित प्रतीत होता है।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

२७५

चीरराज्य—इसका महाभाष्य में भी उल्लेख है। चोर शब्द को कुछ लोग केरलपुत्र शब्द का अपभ्रंश तथा संक्षिप्त रूप बतलाते हैं। यह आजकल मैसूर राज्य के अन्तर्गत है।

चोर—चोर तथा चोल एक ही है। अशोक के शिलालेख में चोड शब्द से व्यवहार किया गया है। काञ्जीपुर के चोल नामक राजा के नाम से इसका यह नाम था। पद्मपुराण में चोल का द्रविड देश में उल्लेख किया गया है। पाणिनि के गणपाठ में भी देशवाची चोल शब्द मिलता है। बृहत्संहिता में भी इसका उल्लेख मिलता है। यह आजकल कारोमण्डल प्रदेश के अन्तर्गत है।

पुलिन्द—महाभारत के सहदेव दिग्विजय में दक्षिण में पुलिन्द का उल्लेख है। अशोक के शिलालेख में भी इसका निर्देश है। स्मिथ् नर्मदा के तट पर विन्ध्य पर्वत के मध्य में पुलिन्द देश को बतलाता है। तारातन्त्र में कामरूप के उत्तरभाग में तथा महाभारत के वनपर्व में हरिद्वार के उत्तर-पश्चिम प्रदेश में भी पुलिन्द का उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि पुलिन्द जाति के अनुसार अन्यत्र भी इसका प्रयोग किया गया है। स्मिथ् महोदय लिखते हैं कि हिमालय प्रान्त की जातियों के लिये पीछे से पुलिन्द शब्द प्रयुक्त होने लगा था।

डू (द्र) बिड—महाभारत के वनपर्व, वराहसंहिता तथा मनुस्मृति आदि में भी इसका उल्लेख है। मद्रास से लेकर कन्याकुमारी तक का प्रदेश द्रविड नाम से कहा जाता था। बूलर महाशय द्रविड का ही दूसरा नाम चोल बतलाते हैं।

करघाट—महाभारत (सभा. अ. ३१) के सहदेव दिग्विजय में दक्षिण में करहाट देश का उल्लेख मिलता है। स्कन्द पुराण के सह्याद्रि खण्ड में इसे काराष्ट्र देश की राजधानी लिखा है। भाण्डारकर महोदय ने भी E. H. D. पुस्तक में इस देश का वर्णन किया है। आजकल यही देश कराड नाम से प्रसिद्ध प्रतीत होता है।

कान्तार—महाभारत के सहदेव दिग्विजय में दक्षिण में कान्तारक देश का उल्लेख मिलता है। इसे ही अरण्यक भी कहते हैं। महाभारत (सभा. अ. ३१) तथा देवीपुराण में भी अरण्य का उल्लेख मिलता है। यह देश आजकल औरङ्गाबाद तथा दक्षिण कोंकण कहलाता है। वहां की राजधानी तगर थी जिसका आजकल नाम दौलताबाद है।

वराह—वितस्ता के दक्षिण में वराहावतार के स्थान की जिस प्रकार वराहमूल के रूप में प्रसिद्धि है उसी प्रकार कौशिकी नदी के किनारे नेपाल के आसपास कोकामुखतीर्थ स्थान की प्राचीन समय से वराह क्षेत्र के रूप में प्रसिद्धि है। वराहपुराण में भी इसकी महिमा का वर्णन है। परन्तु यहां जो वराह शब्द दिया है उसकी दाक्षिणात्य देशों में गणना की है, न कि पश्चिम एवं पूर्व के देशों में। इसलिये यह वराहशब्द दक्षिण दिशा के किसी दूसरे ही वराह नाम से प्रसिद्ध देश के लिये आया प्रतीत होता है। संभवतः यही आज कल बरार है।

आभीर—गुजरात के दक्षिण पूर्व भाग में स्थि नर्मदा नदी के मुहाने का प्रदेश आभीर नाम से कहलाता था। इसी को यूनानी (Abira) कहते थे। महाभारत में (सभा. अ. ३१) समुद्र के पास सोमनाथ से लगे हुए गुजरात देश की सरस्वती नदी के किनारे पर आभीरों का निर्देश मिलता है। किसी-किसी के मत में गुजरात के दक्षिण में स्थित सूरत प्रदेश भी आभीर देश में सम्मिलित था। तारातन्त्र में कोंकण के दक्षिण में तापती नदी के पश्चिम किनारे तक आभीरों का वर्णन मिलता है। ल्यासन महाशय बाइबिल में आये हुए आफीर (Offir) देश को ही आभीर मानते हैं। इलियड के मत में भारत के पश्चिम में तापती से देवगढ़ तक के प्रदेश को आभीर कहा है। बन्क्रिङ महोदय सिन्धु नदी के पूर्व में आभीर देश को मानते हैं। विष्णुपुराण (अ. ५) तथा ब्रह्माण्डपुराण में आभीर देश में सिन्धु नदी का उल्लेख मिलता है। आभीर शब्द के जातिवाचक होने से जिस-जिस प्रदेश में वह जाति रहती थी उस-उस का नाम आभीर हो सकता है। यहां पर कुरुक्षेत्र को मध्य (Centre) मानकर दक्षिण दिशा में वर्णित आभीर देश गुर्जरप्रान्त (गुजरात) में हो सकता है, जहां आजकल भी भीलों का निवास है, बृहत्संहिता में भी दक्षिण नैर्ऋत्य भाग में आभीर देश का निर्देश मिलता है।

२७६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

ऊपर आये हुए ये देश प्राचीन ही प्रतीत होते हैं। यहां 'मगधासु महाराष्ट्रम्' द्वारा मगध का महाराष्ट्र के रूप में निर्देश तथा कौशल्य देश का उल्लेख है। ४०० वर्ष ईसवी पूर्व में कोशल देश का मगध राज्य के अङ्ग के रूप में वर्णन मिलता है। बुद्ध के समय कोशल देश की भी प्रतिष्ठा थी। महाराष्ट्र की मगध के अन्तर्गत होने की परिस्थिति का आर. डी. बनर्जी तथा एच. आर. चौधरी ने अपनी प्राचीन पुस्तकों में, मौर्यकाल से पूर्व नन्द के समय तथा बुद्धकालीन शिशुनाग वंश के अजातशत्रु के समय उल्लेख किया है। कोशल का पृथक् उल्लेख होने से पाण्ड्य देश के कीर्तन न करने के साथ मगध का महाराष्ट्र के रूप में उल्लेख होना बुद्धकालीन समय को सूचित करता है। वात्स्य द्वारा पूरित खिलभाग में इस वर्णन के मिलने से तथा वात्स्य के प्रतिसंस्करण में इन उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी, श्रमण, निर्ग्रन्थ, शक, पल्लव, हूण आदि सन्देहास्पद शब्दों के मिलने से भी वात्स्य का समय बुद्ध के समकालीन प्रतीत होता है।

इस संहिता के पूर्वभाग में भोजनकल्पाध्याय (श्लो. ४०-५१) में भी कुछ देशों के नामों का उल्लेख मिलता है। इनमें से कुरु-कुरुक्षेत्र-नैमिष-पाञ्चाल-कोशल-शूरसेन-मत्स्य-दशार्ण-शिशिराद्रि (हिमाद्रि)-विपाशा-सारस्वत-सिन्धु-सौवीर-काश्मीर-चीन-अपरचीन-खश-वाहीक-काशी-पुण्ड्र-अङ्ग-बङ्ग-कलिङ्ग-किरात आदि कुछ प्रसिद्ध देशों का महाभारत आदि प्राचीन ग्रन्थों में भी उल्लेख मिलने से ये देश भी प्राचीन ही प्रतीत होते हैं। इसके अतिरिक्त माणीचर-हारीतपाद-दासेरक-शातसार-रामण-काच-अनूपक-पट्टन आदि देशों का अन्यत्र कहीं नाम न मिलने से ये अप्रसिद्ध देश भी प्राचीन काल के ही प्रतीत होते हैं। ये देश कहां के हैं इस विषय में विचार करना विद्वानों का काम है। खिलभाग के देशों में महाराष्ट्र के रूप में निर्दिष्ट मगध का यहां नाम भी नहीं दिया है। कोशल का उल्लेख अवश्य है। वहां पर निर्दिष्ट अन्य भी बहुत से देशों का यहां निर्देश नहीं है। प्रत्युत प्राचीन समझे जाने वाले तथा बाद में जिनका व्यवहार लुप्त हो गया है ऐसे सिन्धु-सौवीर-कुरु-पाञ्चाल-तथा बाह्लीक आदि देशों का ही पूर्वभाग में उल्लेख मिलता है। इस प्रकार पूर्व तथा उत्तरभाग में आये हुए देशों के अनुसन्धान करने पर बुद्धकालीन वात्स्य से पूर्वभाग के रचयिता वृद्धजीवक तथा मूल आचार्य कश्यप का प्राचीनत्व सिद्ध होता है।

(४) भारतीय चिकित्सा का वर्णन

इस भारतीय आयुर्वेद विद्या का विकास अपने प्राचीन सम्प्रदाय के द्वारा ही हुआ है अथवा इसमें किसी दूसरे देश की चिकित्सा का भी सहयोग है ? यूरोप देश में ग्रीस में सर्वप्रथम सभ्यता तथा चिकित्सा के विकास का इतिहास मिलने से उस देश की चिकित्सा का भारतीय चिकित्सा पर कोई प्रभाव है अथवा नहीं ? तथा अन्यदेशीय चिकित्साओं का प्रभाव न होने पर भी भारतीय चिकित्सा अपने देश में ही सीमित रही है अथवा उसका प्रभाव दूसरे देशों में भी पहुंचा है ? इत्यादि विषयों पर विचार किये बिना प्राचीन भारतीय आयुर्वेद की स्थिति का सम्यक् ज्ञान संभव नहीं है तथा आयुर्वेद के प्राचीन आचार्यों का भारतीय उपदेश परम्परा द्वारा प्रचलित सम्प्रदाय भी शिथिल हो जाएगा। इस प्रकार उपर्युक्त विषयों के संबन्ध में विचार करने के लिये अनेक विद्वानों के मतों को देकर हम कुछ अपने विचार भी प्रकट करते हैं।

कुछ लोग भारतीय चिकित्सा की अपेक्षा पाश्चात्य चिकित्सा को प्राचीन सिद्ध करने की इच्छा से दोनों में कुछ सादृश्य देखकर भारतीय वैद्यक पर पाश्चात्य विज्ञान का प्रभाव मानते हैं तथा भेड का गान्धार देश के निवासी के रूप में उल्लेख होने से कहते हैं कि यवनों के सम्पर्क के कारण उसकी चिकित्सा पद्धति में भी यवनों का प्रभाव था।

इसके अतिरिक्त कुछ लोग कहते हैं कि सर्व प्रथम यूरोप में चिकित्सा विज्ञान का प्रादुर्भाव ईसवी-संवत् से पूर्व पांचवी शताब्दी में (ई. पू. ४६०) हिपोक्रिटस (Hippocrates) नामक ग्रीक विद्वान् के द्वारा हुआ है, जो कि वहां के चिकित्सा विज्ञान का पिता कहलाता है। उसके चिकित्साग्रन्थों में जीरा-अदरक-मरिच-दालचीनी-इलायची-तेजपत्र आदि

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २७७

कुछ ऐसी वस्तुओं का प्रयोग मिलता है जो कि यूरोप में उत्पन्न नहीं होती हैं, अपितु केवल भारत में उत्पन्न होती हैं तथा भारतीयों द्वारा ही ज्ञात हैं। उससे ६० वर्ष पूर्व (ई. पू. ४००) थियोफ्रेस्टस (Theophrastus) नामक विद्वान् के लेख में भी बहुत सी भारतीय वनस्पतियों का प्रयोग मिलता है। इसी प्रकार अन्य भी बहुत से प्राचीन पाश्चात्त्य चिकित्सकों द्वारा भारतीय वनस्पतियों तथा ओषधियों का उल्लेख किया होने से यह कहा जा सकता है कि उनकी चिकित्सा में भारतीय चिकित्सा विज्ञान का प्रभाव है।

इस प्रकार दोनों पक्षों के विचारों के मिलने से वस्तुस्थिति का निर्णय करने के लिये चिकित्सा विज्ञान के साथ-साथ सभ्यता, यातायात तथा प्राचीन इतिहास के विषय में भी विचार करने की आवश्यकता है इसलिये इन सब विषयों के सम्बन्ध में भी संक्षेप से विचार करके हम अपने प्रकृत (मूल) विषय पर आयेंगे।

भारतीयों के समान अपने को आर्य कहने वाले पाश्चात्यों के प्रथम उद्गम स्थान के विषय में कुछ लोगों का मत है कि उत्तरध्रुव (North-pole) के समीप का प्रदेश ही उनका मूल स्थान था तथा वहीं से आर्य लोग क्रमशः फैले हैं। कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि सुदूर उत्तरभाग१ ही आर्यों का प्रथम उद्गमस्थान है। वहां से फैलकर कुछ पश्चिम प्रदेशों में तथा कुछ पूर्व प्रदेशों में चले गये हैं। इनमें से पूर्व की ओर जाने वाले ही भारतीय है। परन्तु यह सर्वसम्मत है कि संसार के उपलब्ध साहित्यों में ऋग्वेद सबसे प्रथम एवं प्राचीन साहित्य है। ऋग्वेद में आये हुए देश, नदी, नगर, ग्राम तथा पर्वत आदि सब, पाञ्चाल, सिन्धु तथा सौवीर आदि देशों के आसपास के प्रतीत होते हैं। इसमें आये हुए आर्यों के वर्णन में उनका किसी अन्य स्थान से आने तथा उनके किसी अन्य प्रथम उद्गम स्थान का निर्देश नहीं मिलता है। इसमें सुर तथा असुरों के परस्पर संघर्ष का वृत्तान्त मिलता है। इसके अनुसन्धान से प्रतीत होता है कि पाञ्चाल, सिन्धु

१. यह अब सिद्ध हो चुका है कि प्राचीन इण्डो-आर्यन, ग्रीक, ईरानी, स्लैवोनिक, ट्युटोनिक, इटैली-सैलटिक तथा तुखेरियन आदि सब भाषाएँ एक ही मूल भाषा से निकली हैं जिसे हम इण्डोयुरोपियन या स्थूल रूप से आर्यन कह सकते हैं। संभवतः दूसरी सहस्राब्दी ईस्वी पूर्व के प्रारम्भ में उस इण्डो-यूरोपियन अथवा आर्यन भाषा के बोलने वालों के द्वारा वह भाषा तथा एक बहुत विकसित संस्कृति एशिया तथा यूरोप में फैली हुई थी। उस मूल आर्यन भाषा को बोलने वाले या तो डैन्यूब की घाटी में हंगरी के मैदानों में रहते थे जैसा कि Giles ने अपनी पुस्तक Cambridge History of India में लिखी है अथवा Carnoy तथा अन्य विद्वानों के अनुसार वे कैसपियन सागर के पास दक्षिण रूस में रहते थे। अस्तु, यह निर्विवाद है कि ये आर्य लोग भूमि के उस भाग पर रहते थे जहां पर भोजपत्र तथा बेंत आदि के वृक्ष अधिकांश में होते हैं। तथा ये वृक्ष अनेक विद्वानों के अनुसार पूर्वी प्रशिया से पामीर तक के क्षेत्र में होते हैं। ईरानी परम्परा के अनुसार आर्यों का मूलस्थान (Aryanam vaejo-the home land of the Aryas) काकेशश (Caucasus) का एक प्रदेश-वर्तमान अजरबेजान (Ajarbaizan) माना जाता है। मित्तानी या मितन्नी (Mittanians) अभिलेखों में मित्र, नासत्य, इन्द्र, वरुण आदि देवताओं के नाम मिलते हैं तथा १८०० से १४०० ईस्वी पूर्व के बीच में आर्यों के एशिया माइनर में उपस्थित होने के अन्य भी चिह्न मिलते हैं। इन प्रमाणों से प्रतीत होता है कि इस काल में नई भूमि के अनुसन्धान में आर्यों की बहुत सी शाखाएँ विद्यमान थीं और संभवतः इसी काल में इण्डो-इरानियन पूर्व की ओर चलकर हिन्दुस्तान तथा इरान में बस गये थे। इसके बाद इण्डो-इरानियनों में शीघ्र ही धार्मिक अनुशासन के प्रश्न पर मतभेद होकर दो विभाग हो गये तथा वह शाखा जिसे हम इण्डो-आर्यन कहते हैं और भी पूर्व में हिन्दुस्तान में पहुंच गई। हिन्दुस्तानियों तथा इण्डो-आर्यनों के साहित्य तथा धर्म (अर्थात् इनके ग्रन्थ अथर्ववेद तथा अवेस्ता) के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट प्रतीत होता है कि इनका आदि स्रोत एक ही धर्म है तथा इनके रीति-रिवाज भी एक ही हैं। यह धर्म पूर्णरूप से कर्मकाण्डी था तथा प्राचीन काल में यह धर्म निःसन्देह रूप से एक ही मूल आर्यन भाषा के बोलने वालों से प्रारंभ हुआ था क्योंकि इस कर्मकाण्ड के बहुत से अंश आर्यन भाषा को बोलने वाली दूसरी शाखाओं में भी मिलते हैं। इनके रीतिरिवाज भी बहुत प्राचीन प्रतीत होते हैं क्योंकि ये होमर के काव्य, अवेस्ता ग्रन्थ तथा वेदों में आये हुए रीति-रिवाजों के समान ही हैं।

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तथा सौवीर का प्रदेश और उसके समीप का इरान, बेबिलोनिया तथा असीरिया आदि का प्रदेश ही आर्यों का प्रथम उद्गम स्थान था। अस्तु, यह प्रथम उद्गम स्थान कोई भी हो किन्तु समस्त प्राचीन जातियों की प्राचीन भाषाओं के साथ ऋग्वेद की भाषा की समानता होने से भाषा शास्त्र की दृष्टि से भी विद्वानों की यह सम्मति है कि अत्यन्त प्राचीन काल में एक ही मूल वृक्ष की चारों ओर फैली हुई ये शाखा-प्रशाखायें हैं।

प्राचीन पाश्चात्त्य जातियों तथा भारतीय जाति में केवल भाषा की ही समानता नहीं है अपितु अन्य सभ्यता आदि भी समान हैं। इससे प्रतीत होता है कि प्राचीन परिस्थिति में विद्यमान एक ही सभ्यता प्राचीन पाश्चात्त्य जाति तथा भारतीय जाति में समानरूप से फैल गई इसीलिये उनमें न्यूनाधिक समानता मिलती है। अथवा यह भी संभव है कि वैदिक आर्यसभ्यता ही चारों ओर फैलती हुई प्राचीन पाश्चात्त्य जातियों में भी पहुंच गई हो तथा उसी की हमें झलक मिलती हो।

बेबिलोनिया देश के कसाइटिस¹ (Kassites ई. पू. १७६०) वंश के राजकुमारों के नामों में सूर्य, इन्द्र तथा मरुत् शब्दों के मिलने से, पश्चिम एशिया के कैपोडोसिया (Cappadocia) नामक स्थान में हिताइटी² (Hittites) तथा मित्तानी (Mittani) नामक जातियों के परस्पर संघर्ष के बाद के (B. C. 1360) सन्धि शिलालेख तथा उनके विवाह के समय साक्षीरूप से मित्र, वरुण, इन्द्र तथा नासत्य आदि के उल्लेख से, बोगस³ क्वाय (Boghaz keui ई. पू. १४००) के शिलालेख में संख्यावाचक⁴ आदि शब्दों के मिलने से तथा सीरिया और पैलेस्टाइन⁵ (फिलस्तीन) के राजाओं के नाम आर्य राजाओं के नामों के समान होने से वैदिक सभ्यता का प्राचीन समय में भी इतनी दूर प्रचार⁷⁻¹ होना स्पष्ट है।

सुमेरियन प्रदेश तथा भारत के प्राचीन राजाओं में साधारण वर्णापभ्रंश के अतिरिक्त विशेष समानता⁶ मिलती है। उनके मनस्⁷⁻² नामक आदि व्यवस्थापक तथा भारतीय ग्रन्थोक्त मनु के नाम तथा कार्य में समानता मिलती है तथा वहां


लघु एशिया (एशिया माइनर) में आर्यों की उपस्थिति के प्रमाण

१. कसाइटिस् (काशी) लोगों ने बेबिलोनिया में १७६० ई. पूर्व में अपना राज्य स्थापित किया था। इनके राजाओं के नामों में हमें Surias (Surya-सूर्य) Indas (Indra-इन्द्र), Maruttas (Marutah-मरुत्) तथा Bugas (Iranian baga-God) के नाम मिलते हैं। तथा उन्हीं लोगों ने ही उस समय घोड़े का भी प्रथम बार प्रयोग किया था। अर्थात् इन्होंने ही पहले पहल घोड़ों को उपयोग में लाना प्रचलित किया था।

२. Upper Euphrates valley में मित्तानी राजाओं तथा हिताइतो राजाओं द्वारा १३६० ईसवी पूर्व में किये गये सन्धिपत्र में In-da-ra (इन्द्र), U-ru-v-na (वरुण), Mi-i-tra, (मित्र) तथा Na-sa-at-ti-i-ia (नासत्य) आदि आर्य देवताओं के नाम मिलते हैं। तथा कुछ मित्तानी राजाओं के नाम भी Sutarna, Dusratta, Artatama आदि आर्य नाम मिलते हैं।

३. मित्तानियों के बोगस क्वाय शिलालेख में (लगभग १४०० ई. पू.) Aika (एक), Teras (त्रि), Panza (पंच) Satta (सात), Nav (नव) आदि आर्य संख्याएँ मिलती हैं।

४. Cappadocia के हिताइती १६-१५ शताब्दी ई. पू. में संभवतः कोई आर्यन भाषा बोलते थे। तुलना कीजिये- सर्वनाम-कुइस्, कुइत्। क्रिया-एस्मि (अस्ति) वर्तमान (लट्) की विभक्ति इनुमि (नोमि) रूप आदि।

५. Tell-el-Amarna (तेल-अल्-अमर्ना) में मिले हुए प्राचीन लेखों में हमें सीरिया तथा फिलस्तीन के राजाओं के नाम भी आर्य नामों के समान मिलते हैं। उदाहरण के लिये—Biridaswa, Suwardata, yasdata तथा Artamanya आदि।

६. सुमेरियन प्रदेश के प्राचीन उक्कुसि, वक्कुस, निमिरुद, पुन पुन, नक्ष अनेन, .... शगुर, मनिशमंज, नरम अंश, दलीप इत्यादि राजाओं की क्रमशः इक्ष्वाकु, विकुक्षि, निमि, पुरञ्जय, अनेना, सगर, असमञ्जस, अंशुमान तथा दिलीप आदि भारतीय राजाओं से बहुत समानता मिलती है (सरस्वती मासिक पत्रिका १९३७ अप्रैल अङ्क)

७. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. १०१ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २७९

के शिलालेखों में दिये हुए प्राचीन व्यावहारिक नियमों में मनु के नियमों की समानता दृष्टिगोचर होती है। सुमेरियन प्रदेश के नाम, वस्तु तथा लेखों में भारतीयता की समानता के विषय में श्री वैडेल¹ नामक पाश्चात्य विद्वान् ने भी बहुत कुछ लिखा है।

इस प्रकार दोनों देशों के राजाओं में जो आनुक्रमिक समानता मिलती है वह सुमेरियन् राजाओं का भारत पर शासन अथवा भारतीय राजाओं का सुमेरियन प्रदेश पर शासन का परिणाम हो सकता है अर्थात् ये दोनों बातें संभव हो सकती हैं। क्योंकि एक देश के राजाओं द्वारा दूसरे देश पर शासन करना सर्वथा संभव है।

सुर तथा असुरों के पारस्परिक प्राकृतिक विरोध को दृष्टि में रखते हुए ही पुराणों तथा ऋग्वेद में स्थान-स्थान पर असुरों का उल्लेख मिलता है। असीरियन् तथा बेबिलोनियन् जाति के प्रधान उपास्य देवता भी असुर तथा अहुर नाम से मिलते हैं। असीरियन शब्द भी प्राचीन भारतीयों द्वारा विशेषरूप से परिचित असुर शब्द से ही बना प्रतीत होता है।

आजकल श्री सिटान लायड तथा डाक्टर हेनरी फ्रोङ्कफोर्ड की अध्यक्षता में इराक देश के टयल अगर नामक स्थान में जो भूगर्भ का अन्वेषण हुआ है उसमें एक भग्नावशेष प्राचीन मन्दिर तथा उसके अन्दर के कमरे में अनेक महत्त्वपूर्ण प्राचीन वस्तुओं तथा महेञ्जोदारो की खुदाई में मिली हुई वस्तुओं से मिलती-जुलती कुछ वस्तुओं के मिलने से इराक देश की पांच हजार वर्ष प्राचीन सभ्यता में भारतीय सभ्यता का प्रभाव दिखाई देता है। तथा सर आरेलष्टीन के अन्वेषण में बलोचिस्तान तथा दक्षिण इरान में उपलब्ध प्राचीन वस्तुओं के कारण उनका यह भी मत है कि भारत तथा प्राचीन सुमेरिया (आजकल के इरान) का भी प्राचीन काल में परस्पर समान सभ्यता का संबन्ध था।

मैथिक² सोसायटी के लेख के अनुसार फिलस्तीन (Palestine) देश की भूगर्भ से मिली सभ्यता का अन्वेषण करने पर उस देश के समय-समय पर विभिन्न देशों द्वारा आक्रान्त होने के कारण उन-उन स्थानों में उन-उन देशों के पूर्व चिह्न मिलने पर भी एक स्थान पर महेञ्जोदारो की खुदाई में मिली हुई प्राचीन भारतीय सभ्यता के अनुरूप चिह्नों के मिलने से यह कहा जा सकता है कि वहां भारतीय सभ्यता का प्रकाश ही सर्वप्रथम पहुंचा था।

आजकल यातायात की व्यवस्था के अत्यन्त परिष्कृत होने पर भी मिर्जापुर आदि के सुन्दर मिट्टी के वर्तनों को समीप के शहर में भी ले जाने के लिये लोगों को बहुत अधिक सावधानी बरतनी पड़ती है। तब अत्यन्त घने, दुर्गम तथा कंकडीले और पथरीले प्रदेशों से घिरे हुए मिश्र, फिलस्तीन, इराक तथा भारत में परस्पर सुदृढ़ अलंकार आदि के लेजाने की सुविधा होने पर भी अत्यन्त नाजुक (Delicate) मिट्टी के बरतनों की भी कारीगरो में समानता देखकर यह कहा जा सकता है कि उनका परस्पर असाधारण परिचय था।

इतना ही नहीं अपितु पाश्चात्यों की प्राचीन शाखाओं तथा भारतीयों की प्राचीन परिस्थिति में मिलने वाले धार्मिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक आदि बहुत से विषयों में समानता के द्योतक सभ्यता के चिह्न ऐतिहासिकों³ के भिन्न-भिन्न लेखों के द्वारा अनेक स्थानों पर मिलते हैं।


१. आजकल वैडल (L. A. Waddell) नामक विद्वान् ने महेञ्जोदारो तथा हरप्पा के भूगर्भ से निकले हुए तथा मैसेपोटेमिया और सुमेरियन प्रदेश में मिले हुए मुद्राओं तथा इतिहास आदि का अनुसन्धान करके उन-उन देशों में मिले हुए मुद्रा आदि में एक दो व्यक्तियों के साथ भी प्राचीन भारतीय राजाओं की नामों में तथा कहीं-कहीं अक्षरों, संकेतों, वस्तुओं तथा शिल्पकला आदि में समानता देखकर उन्होंने दोनों देशों के प्राक्तन सम्बन्धों के विषय में ‘मेकर्स आफ सिविलिजेशन इन रेस एण्ड हिस्ट्री’ नामक पुस्तक में अपने विचार प्रकट किये हैं।
२. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. १०२ देखें।
३. (क) मिश्रदेश के पूर्व सम्प्रदाय में अपरिवर्तनीय तथा कुलपरम्परागत पुरोहितता, सेनावृत्ति, शिल्पव्यापार तथा दासता

१९ का.सं.

२८० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

प्रत्यक्ष अनुभव को ही यदि प्रमाण मानकर भारत की प्राचीन अवस्था का अनुसन्धान किया जाय तो भारतीय सभ्यता ही सबसे प्राचीन प्रतीत होती है। महेञ्जोदारो के भूगर्भ से भी बहुत सी अत्यन्त प्राचीन देवताओं की मूर्तियां उपलब्ध हुई हैं। इनमें ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेव की सम्मिलित त्रिमूर्ति, हस्ति, व्याघ्र, खड्गि (गेंडा) तथा मृग सहित शिव की मूर्ति तथा स्त्री देवताओं की मूर्तियां भी मिलती हैं। स्त्री देवता (Mathi Gods) की मूर्तियां सिन्धु नदी के किनारे बालुकामयस्थान में, इलाम, पर्शिया, एशिया माइनर, सीरिया, फिलस्तीन, साइप्रस, एजीएन्सीतट, बाल्कन तथा मिश्र देश में भी मिलती हैं। ग्रीस देश के क्रेटाद्वीप में अग्र तथा पृष्ठ भाग पर सिंह तथा व्याघ्र से युक्त Minoan नामक देवी की मूर्ति, एलोनिया देश में सिंह के वाहन वाली Cybele नामक प्राचीन देवी की मूर्तियां मिलती है। इस प्रकार महेञ्जोदारो के विवरण वाली पुस्तक के अनुसार भारत^१ तथा अन्य देशों में एक समान सूत्र का परिचय मिलता है।

(सेवानौकरी) रूप चारों विभागों वर्णभेद की छाया मिलती है। वहां के प्राचीन इतिहास में भारतीय इतिहास के समान जलप्लावन (समुद्रयात्रा) का वर्णन तथा प्रजापति स्थानीय 'क' देवता का उल्लेख मिलता है। उस देश की भाषा के मात-इवु-आत्म्-पुष्-उषा-आप-अपूप-ब्रा आदि शब्दों में क्रमशः थोड़े या सम्पूर्ण रूप से माता-इभ-आत्मा-पुष-उषा-आप-अपूप तथा नर आदि शब्दों का शब्द एवं अर्थ से सादृश्य मिलता है। इस विषय में श्री ध्यानचन्द्र (Quarterly Journal of Mythic Society Vol XXI No. 3. P. 250) तथा श्रीअविनाशचन्द्र ने (Rigvedic India Vol I P. 245) में बहुत कुछ लिखा है। अन्य मन्त्रों की तरह शाखाभेद के द्वारा पाठभेद के बिना ही एक परम्परा से ही भारत में व्याप्त हुए वैदिक सावित्री मन्त्र के ज्ञान से तथा ऋग्वेद के सौर मन्त्रों द्वारा प्रतिपाद्य सूर्य देवता की उपासना भारतीयों का प्राचीन असाधारण धर्म समझा जाता है। भारत में सुदूर पश्चिम में स्थित प्राचीन एवं विशाल तथा नष्टभ्रष्ट मार्तण्ड (सूर्य देवता) का मन्दिर भी भारतीयों की चिरकाल से चली आने वाली सूर्य की उपासना को सूचित करता है। मिश्रदेश के प्राचीन नगर में अप्रचलित सूर्योपासना के बाद में किसी राजा के समय जनता द्वारा प्रतिरोध करने पर भी बलपूर्वक उसके पुनः प्रवर्तन का इतिहास तथा पांच हजार वर्ष प्राचीन उसके समाधिशव के साथ वैदिक उक्तियों की छाया (समानता) वाला सूर्यस्तोत्र खुदा हुआ मिलता है। मिश्र देश में उपलब्ध पांच हजार वर्ष प्राचीन बर्तन आदि की शिल्पकला के विषय में आजकल गवेषणा करने पर महेञ्जोदारों तथा हरप्पा के भूगर्भ से निकली हुई प्राचीन भारतीय शिल्पकला के साथ तुलना करने पर न केवल दोनों में समानता ही है अपितु मिश्रदेश की अपेक्षा भी भारतीय कलाओं की श्रेष्ठता के कारण विद्वान् लोग मिश्र की अपेक्षा भी भारत को अधिक प्राचीन मानते हैं।
(ख) रोम देश की इटुस्कन (Etruscan) नामक प्राचीन जाति के धार्मिक विषय में सात तथा पांच पीढ़ियों में वैवाहिक संबन्ध के निषेध के विषय में 'बध्वा वरस्य वा तातः कूटस्थाद्यदि सप्तमः' इस प्राचीन स्मृतिनियम की समानता के मिलने से, प्राचीन रोम तथा ग्रीस देश के सम्प्रदायों में मिलने वाले लिङ्गपूजन, नन्दिपूजन, पितृश्राद्ध, अग्निशाला, अन्नहोम, गुरुकुलशिक्षाप्रणाली, जातसंस्कार, पुनर्जन्म तथा अध्यात्मवाद आदि में भारतीय विषयों का असाधारण रूप से प्रतिबिम्ब मिलने से तथा अंग्रेज जाति की पूर्व अवस्था रूप केल्ट (Celtic) जाति के धर्माचार्य रूप ड्रूइड (Druid) जाति के धार्मिक नियमों में बीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण, अन्तिम अवस्था में वानप्रस्थप्रणाली, उच्चकुल में विद्यादान तथा आत्मा के अमरत्व इत्यादि विषयों में भारतीय धर्मच्छाया के मिलने से यह कहा जा सकता है कि भारतीय सभ्यता का सम्बन्ध न केवल अत्यन्त प्राचीन मूलशाखाओं में ही था अपितु उसके बाद विभक्त हुई उपजातियों तथा उपशाखाओं में भी मिलता है।


१. ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेव की भारत में प्राचीन काल से ही उपासना की जाती रही है। देश एवं काल के अनुसार भिन्न-भिन्न देवताओं के उपासना में उत्पन्न हुए मतभेदों को दूर करने के लिये उमामहेश्वर, हरि (विष्णु) तथा हर (महादेव) जी की एकता के समान ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर के अभेद को प्रकट करने के लिये सम्मिलित रूप से इनकी त्रिमूर्ति की उपासना प्रचलित हुई। देवी पुराण (अ. ६०) में भी राजा दिलीप के द्वारा कामिकाचल पर त्रिमूर्ति की उपासना का उल्लेख मिलता है। ये अत्यन्त प्राचीन काल से प्रसिद्ध भारत के असाधारण देवता है। इसलिये महेञ्जोदारो में भी त्रिमूर्ति तथा शिव की मूर्ति का मिलना उचित ही है। इन मूर्तियों के साथ मिलने वाली स्त्रीमूर्ति भी भारतीयों द्वारा प्राचीन

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

भारतीयों का प्राचीन काल में दूर-दूर देशों में पहुंचने तथा उनसे परिचय का वर्णन मिलता है। वैदिक काल में भी भुज्यु आदि का अन्य द्वीपों में जाने का वृत्तान्त मिलता है। प्राचीन इतिहास का अनुसन्धान करने पर ययाति राजा के अनुद्रुह्य तथा तुर्वसु आदि पुत्रों को आज्ञा न मानने के कारण पिता द्वारा अन्य देशों में निकाल देना, पाण्डवों द्वारा दूर-दूर देशों की विजय, महाभारत की लड़ाई में दूर-दूर देश के राजाओं का एकत्रित होना, भारतीय राजाओं का गान्धार आदि पश्चिम प्रान्तों के साथ वैवाहिक संबन्ध, पुराण में नील नदी के नाम का उल्लेख, पाश्चात्त्य देश के प्राचीन इतिहास तथा मुद्रा आदियों में भी समान नामोंवाले कुछ राजाओं के नामों का महाभारत तथा हरिवंश पुराण में मिलना, तथा मनुसंहिता में भी अन्यदेशीय जाति के मूलस्रोत का वर्णन इत्यादि द्वारा प्राचीन भारत का अन्यदेशों के साथ संबन्ध प्रकट होता है। बाद में भी (ई. पू. २१७) (Tsin Shih Huanungti) नामक राजा के राज्य में भारत से १८ भिक्षुओं का चीनदेश में जाने का वर्णन तथा ईसवी पूर्व २०० में Changkin नामक चीनी व्यक्ति के भारत में आने के वृत्तान्त का श्रीयुत¹ कालिदास नाग ने उल्लेख किया है।

प्राचीन समय के यातायात के विषय में अनेक विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं। अस्तु, इसका स्पष्टीकरण तो समय ही करेगा। तथापि यह निश्चित है कि प्राचीन भारतीय आर्यों तथा प्राचीन पाश्चात्य जातियों की सभ्यताओं में अत्यन्त प्राचीन काल में भी परस्पर घनिष्ठ संबन्ध अवश्य था। इस सभ्यता के संबन्ध को छोड़कर अब हम अपने प्रकृत विषय (वैद्यक) पर आते हैं।

संसार में जितने भी प्राचीन चिकित्सा साहित्य हैं उनमें ऋग्वेद के बाद का अथर्ववेद में आया हुआ वैद्यक साहित्य सबसे प्राचीन माना जाता है। भारतीय चिकित्साविज्ञान का उत्पत्तिस्थान होने के कारण अथर्ववेद वैज्ञानिकों की दृष्टि में भी अमूल्य ग्रन्थ है²।

अथर्ववेद में आये हुए रोगों की मन्त्र तथा ओषधि दोनों द्वारा चिकित्सा का विधान दिया हुआ है। इसी को दृष्टि में रखते हुए ही कौशिकसूत्रकार ने भी कहीं-कहीं रोगों में केवल मन्त्रों का उपयोग तथा जल का प्रयोग किया है। तथा किन्हीं-किन्हीं रोगों में मन्त्रों के साथ-साथ ओषधियों का उपयोग भी किया है। रोगोत्पत्ति के कारणभूत दुष्ट देवता तथा ग्रहस्कन्द आदियों का भी मन्त्रों में वर्णन मिलता है। अथर्ववेदीय चिकित्सा में उन ग्रह आदियों को दूर करने के लिये


काल में उपासना की जाने वाली स्त्रीदेवता की ही मूर्ति प्रतीत होती है। शक्ति की उपासना करने वाला सम्प्रदाय भी भारत में प्राचीन काल से चला आ रहा है। महाभारत, रामायण तथा पुराण आदियों में भी दुर्गा आदि देवियों की उपासना का इतिहास मिलता है। वेदों की तरह प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध तन्त्र आदि अनेक शास्त्रों में भी शक्ति की महिमा उसकी उपासना तथा उसके उपासक महर्षियों का वर्णन मिलता है। पूर्व तथा पश्चिम में प्राकार की तरह फैले हुए हिमालय में उत्तर तथा दक्षिण भाग में जाने के साधनों के लिये घाटियों के द्वारा रूप में विद्यमान उद्यान (स्वात नदी का प्रदेश), जालन्धर, पूर्णगिरि तथा कामरूप देश में चार शक्ति (देवी) के महापीठ हैं। इसके अतिरिक्त अन्य भी सैंकड़ों पीठ तथा उपपीठ भारत में प्राचीन काल से हैं। शक्ति के भेदरूप काली आदि की उत्पत्ति तथा उनके चरित्र के इतिहास भी भारतीय ही हैं। जो लोग शक्ति की उवासना के सम्प्रदाय को दो हजार वर्ष से अर्वाचीन बतलाते हैं उनके प्रतिवाद के लिये महेञ्जोदारो में उपलब्ध इस प्रकार की प्राचीन मूर्तियां भी पर्याप्त हैं। इस प्रकार उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में सेतुबन्ध रामेश्वर तक व्याप्त हुआ भारत में उत्पन्न शक्ति की उपासना का सम्प्रदाय अपने गुणों के कारण शाखाओं तथा उपशाखाओं द्वारा अन्य देशों में भी फैल गया है। इसलिये स्थान-स्थान पर मिलने वाली स्त्री देवताओं की मूर्तियों का भिन्न-भिन्न नामों द्वारा व्यवहार होने पर भी वे भारतीय सभ्यता के प्रभाव को फैलाती हुई प्रतीत होती है।

१. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. १०३ देखें।

२८२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

मन्त्रों का प्रयोग तथा रोगों को दूर करने के लिये ओषधियों का प्रयोग भी मिलता है। इसके बाद धीरे-धीरे मन्त्रों द्वारा उपचार की प्रथा कम होकर ओषधियों द्वारा उपचार की प्रथा बढ़ती गई। आजकल भी कुछ अंश में ग्रन्थों तथा व्यवहार में भी मान्त्रिक विद्या का उपचार के रूप में प्रयोग मिलता है।

असीरिया तथा बेबिलोनिया देश में भी प्राचीन काल में भारतीयों के आथर्वण तथा तान्त्रिक प्रयोगों के समान ही उपाय प्रयुक्त किये जाते हुए दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिये, अपवित्र पुरुष के सहवास, सम्पर्क, संभाषण एवं उच्छिष्ट भोजन आदि तथा भूत, प्रेत और पिशाच आदियों से रोगों का होना, विकराल एवं भयंकर मूर्तियों की कल्पना, रोगों को दूर करने के लिये मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित जल का पीना तथा औषध का सेवन करना, ताबीज का बांधना, पिष्टि तथा धूलि (Powder) से रोगियों को ढकना, विशेष-विशेष वृक्षों के पत्तों द्वारा रोगियों को हवा करना, रोगों को उत्पन्न करने वाले दुष्ट देवताओं के लिये बकरे तथा सूअर आदि की बलि देना, तान्त्रिक पद्धति के समान विरोधी व्यक्ति के केश, नख तथा पांवो की धूलि की अभिमन्त्रित करके प्रतीकार करना, ऋग्वेद में मिलने वाले मार्दूक देवता के समान ही मर्दूक नाम वाले देवता की उपासना द्वारा रोगों का परिहार इत्यादि। भोजन से पूर्व प्रातःकाल ओषधि का सेवन, विरेचन की महिमा, तैल के द्वारा विरेचन, उदर रोग में पहाड़ी नमक तथा लशुन का उपयोग, प्रमेह रोग में मूत्र की परीक्षा, दांतों के रोगों में कृमियों का कारण होना—इत्यादि और भी आयुर्वेद के अनुरूप अनेक विचार एवं प्रयोग उनके यहां मिलते हैं। जिस प्रकार आथर्वण सम्प्रदाय में शान्ति, पुष्टि आदि के प्रयोग करने वाले धार्मिक आचार्य ही मान्त्रिक प्रक्रिया एवं औषधों के प्रयोग से रोगों को दूर करते थे उन्हें अथर्वा कहते थे। उसी प्रकार मिश्र आदि देशों के प्राचीन इतिहास में भी मिलता है कि जो धर्मगुरु होते थे वे ही चिकित्सक भी होते थे, उन्हें (Priest Doctor) कहते थे, इसीलिये उनके देवालय (मन्दिर) ही चिकित्सालय होते थे। इन स्थानों में ओषधियों के उल्लेख संबन्धी प्राचीन लेख भी मिलते हैं।

हैरोडोटस् नामक विद्वान् लिखता है कि बैबिलोनिया देश में चिकित्सा के लिये रोगियों को बाजार तथा जनसमुदाय में रखने के वृत्तान्तों के मिलने से प्रतीत होता है कि उस समय वहां चिकित्साविज्ञान की विशेष उन्नति नहीं थी परन्तु इसके प्रतिवाद रूप में¹ क्याम्बल थोम्सन नामक विद्वान् ईस्वी पूर्व ७०० समय के अर्डनना (Arda-nana) नामक वैद्य का उपलब्ध हुआ परिचय पत्र उपस्थिति करके कहते है कि बेबिलोनिया देश के निवासियों का चिकित्साविज्ञान कम नहीं था तथा बतलाता है कि हेम्बूर्वन (Hemmurabri) राजा के समय ऐसा राजनियम था कि विपरीत शल्यचिकित्सा करने वाले शल्यचिकित्सक (Surgeous) दण्ड के भागी होते थे। उसी के द्वारा नेत्रचिकित्सा में ७-८ दिन में आराम हो जाने, नासिकाव्रण में बहिः उपचार के द्वारा होने वाले रुधिर स्राव में आन्तरित ओषधियों द्वारा उपचार इत्यादि अनेक सफलताओं का उल्लेख मिलने से ज्ञात होता है कि उस देश में प्राचीन काल से ही चिकित्साविज्ञान उन्नत अवस्था में था।

असीरिया देश में प्राचीन काल में भी शस्त्रचिकित्सा विशेषरूप से प्रचलित थी ऐसा² Herbert Loewe ने लिखा है।

मिश्र देश के प्राचीन पेपर्याख्य त्वक्पत्र में १५० तथा एबर्स (Ebers) नामक त्वक्पत्र में ज्वर, उदर रोग, जलोदर, दन्तशोथ, आदि १७० प्रकार के रोगों का वर्णन मिलता है। उस देश के बारहवें वंश के समय लिखी हुई एक पुस्तक में किसी स्त्री के रजोविकार एवं अर्बुद आदि रोगों तथा आजकल मिलने वाले नेत्ररोगों के भेद दिये हुए हैं। उसी में सूक्ष्म रोगों की भी गणना की होने से रोगों की उपेक्षा नहीं कही जा सकती अपितु रोगों के विषय में वहां के विद्वानों का ज्ञान बहुत उन्नत था ऐसा प्रतीत होता है। हैरोडोटस् नामक विद्वान् भी नील नदी के आसपास के प्रदेश को स्वास्थ्यप्रद बतलाता


१. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. १०४ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

२८३

है। वहां भी असीरिया देश की तरह भूत, प्रेत तथा देवताओं के प्रकोप से रोगोत्पत्ति मानी जाती थी। $^{१}$(George faucart) नामक विद्वान् लिखता है कि उनके चिकित्साग्रन्थ मन्त्र-बाहुल्य थे तथा धार्मिक पुरोहित ही चिकित्सक भी थे। $^{२}$(Cf. Berthelot) भी लिखता है कि प्राचीन मिश्रदेश में भी अथर्ववेद के अनुरूप ही मन्त्र-तन्त्र सहित चिकित्साविज्ञान तथा रसायनशास्त्र का व्यवहार होता था। $^{३}$श्री सुरेन्द्रनाथ दास गुप्त ने भी लिखा है कि प्राचीन मिश्र देश में तैल, घृत तथा वानस्पतिक ओषधियों का भी व्यवहार मिलता है।

रोम देश की प्राचीन इट्रस्कन (Etruscan) जाति तथा ग्रीस देश की प्राचीन जाति के प्राचीन इतिहास में भी रोगनिवारण के लिये देवताओं की उपासना, प्रार्थना तथा बलि आदि मान्त्रिक उपचार मिलते हैं।

केल्टिक जाति के भी वैद्यक तथा धर्म का परस्पर घनिष्ठ संबन्ध था। उस जाति के ड्रुइड नामक धर्मगुरु ही चिकित्सक थे। (T. barns)$^{४}$ लिखता है कि अथर्ववेद की पद्धति के समान उनमें भी मान्त्रिक तथा औषधसंबन्धी दोनों चिकित्साएं प्रचलित थीं।

यूरोपीय ट्यूटन (Teuton) जाति की प्राचीन चिकित्सा में मर्सबर्ग (Mersseburg) के मान्त्रिक प्रयोगों (Charms) के साथ कुछ भारतीय वैदिक मन्त्रों का सादृश्य है। कृमिरोग तथा अस्थिभग्न चिकित्सा में तो यह सादृश्य बिलकुल स्पष्ट दिखाई देता है—ऐसा एडालबार्ट$^{५}$ कून् (Adalbart Kuhn) भी लिखता है।

K. Sudhoff तथा J. Jolly$^{६}$ नामक विद्वान् भी लिखते है कि इस जाति में प्राचीन काल में भूत, देवप्रकोप तथा पापों को रोगों का कारण, दैवप्रकोप से उत्पन्न व्याधि में पशुबलि द्वारा प्रतीकार, रोग परिहार के लिये वृक्षों की त्वचाओं पर मन्त्र लिख कर हाथ में धारण करना, मन्त्रपाठ, यन्त्रधारण, देवमूर्तियों को स्नान और जलपान कराना तथा धूप आदि के द्वारा भूतादियों को दूर करना इत्यादि विधियां मिलती हैं। इसका अनुसन्धान करने पर इनमें भी आथर्वण तथा भारतीय आयुर्वेद प्रक्रिया का सादृश्य मिलता है। लिथुनिया आदि जातियों के शब्द विशेष, आचार व्यवहार तथा चिकित्सासंबन्धी विषयों में भारतीय छाया मिलती है। जौली (J. Jolly)$^{७}$ ने यह भी लिखा है कि उत्तरी अमेरिका की रेड इन्डियन च्यारोकी (Cherokees) जाति की प्राचीन मान्त्रिक चिकित्सा में भी अथर्ववेद के मन्त्रों की बहुत समानता मिलती है।

चीन देश के साढ़े चार हजार वर्ष प्राचीन ग्रन्थ में ज्वर के दस हजार भेदों तथा आमाशय के १४ विभागों का निर्देश किया है। नाडी परीक्षा का उसमें विशेष विधान दिया है। ईस्वी पूर्व ४०० वर्ष से लेकर प्रतिवर्ष नये उत्पन्न होने वाले रोगों का उसमें एक निघण्टुपुत्र (Index) दिया हुआ है। चीन देश के चिकित्सा ग्रन्थों में आर्द्रक, दाडिममूल, वत्सनाभ (Aconite), गन्धक, पारद, अनेक प्रकार के प्राणियों के मलमूत्र तथा असंख्य वृक्षों के पत्र एवं मूल आदियों का औषधरूप में उल्लेख किया है। चीन देश में आजकल भी वृक्षों के पत्रमूल आदि अनेक द्रव्य औषध रूप में बिकते हैं। चेचक के टीके (Vaccination) का ज्ञान भी वहां प्राचीन काल में था। $^{८}$श्री सुरेन्द्रनाथ दास ने लिखा है कि चिकित्सा शास्त्र के इतिहास (History of Medicine) के रचयिता ग्यारिसन् के अनुसार चीन देश वालों ने चिकित्सा विज्ञान भारत से ही प्राप्त किया था।


१. १ एवं ५ तक की टि. सं. उपो. पृ. १०४-१०५ में देखें।
६. व्रण तथा अस्थिभग्न की चिकित्सा मन्त्रों के द्वारा की जाती थी जिसकी A. Kuhn ने जर्मनी के प्राचीन मर्सबर्ग मान्त्रिक प्रयोगों के साथ तुलना की है। (J. Jolly. E. R. E. Vol 4 P. 754)।
७. अथर्ववेद के मान्त्रिक प्रयोगों की च्यारो जाति के पवित्र विधान तथा उत्तरी अमेरिका के रेड इन्डियन में प्रचलित अन्य मान्त्रिक प्रयोगों के साथ पूर्णरूप से तुलना हो सकती है। (E. R. E. Vol 4 P. 754 by J. Jolly)
८. १ की टि. सं. उपो. पृ. १०५ में देखें।

२८४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

चीन राज्य ईस्वी पूर्व २०० वर्ष सामयिक होने से किसी-किसी व्यक्ति का मत है कि कौटिल्य अर्थशास्त्र में चीन का उल्लेख होने से कौटिल्य शास्त्र प्राचीन नहीं है परन्तु उसके विपरीत अवेस्ताग्रन्थ में निर्दिष्ट पांच जातियों में चीन का भी उल्लेख होने से चीन देश प्राचीन ही है। जयचन्द्र¹ विद्यालंकार ने लिखा है कि श्री मोदी के अनुसार चीन नाम का माण्डलिक राज्य ईस्वी पूर्व ९०० शताब्दी में था।

तुर्फान देश के दक्षिण में काराशर नामक स्थान में प्राचीन समय में कुछ प्राचीन कूच जातियां रहती थीं। ईस्वी सन् के प्रारंभ से पूर्व कब उनका वहां आगमन हुआ, इस विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं होता है। सब लोग उस कूच जाति को आर्यों की शाखा मानते हैं। बाद में २-३ शताब्दी में व्यापारियों के साथ बौद्ध-धर्म प्रचार के लिये आये हुए भारतीय भिक्षुओं को देखकर उन्होंने अपने पूर्वदेश के भारतीय होने के नाते उनका बहुत सम्मान किया—ऐसा उनका ²इतिवृत्त मिलता है।

इस जाति तथा उस देश के विषय में चीनी भाषा में लिखित प्राचीन इतिहास में लिखा है कि द्वितीय शताब्दी में मध्य एशिया के आसपास के प्रदेशों को विजय करने की इच्छा से जब चीन राज्य ने उसपर आक्रमण करने की इच्छा की, उस समय उस प्रदेश में बलवान् कूचजाति रहती थी। उसको विजय न कर सकने पर दोनों देशों में परस्पर मैत्री संबन्ध स्थापित हो गया, ईस्वी सन् के प्रारंभ के बाद २१६-३१६ समय में वहां बौद्धधर्म पूर्णरूप से प्रचलित था। कुमारजीव नामक बौद्धभिक्षुक वहीं रहता था। अन्य भी बहुत से बौद्धभिक्षुक वहां पहुंचे थे। बहुत से बौद्धस्तूप तथा मन्दिर भी वहां बनाये गये थे। वे अभी तक भी भूगर्भ से उपलब्ध होते हैं। भारतीय व्यापारी तथा बौद्धधर्म प्रचारक इसी मार्ग से चीन देश में आते जाते थे। ईस्वी सन् के प्रारंभ से पहले ही दक्षिण देश वालों के लिये चीन में यही व्यापारिक मार्ग था। ह्युन्सङ्ग नामक चीनी यात्री भी इसी मार्ग से ही भारत में आया था। इस प्रकार इसके चीन तथा भारत से प्राचीन संबन्ध का वर्णन मिलता है। यदि इसकी खुदाई की जाय तो अब भी वहां प्राचीन भारत से संबन्ध रखने वाले बहुत से चिह्न मिलने की आशा है। वहां ब्रह्मदेश की लिपि में लिखे हुए बहुत से प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ तथा भारतीय संस्कृत भाषा से कूचभाषा में अनूदित काष्ठपट्टिकाओं पर खुदे हुए तथा लिखे हुए अनुवाद ग्रन्थ भी मिले हैं। स्टाइन³ नामक विद्वान् ने लिखा है कि वहां भूगर्भ से अन्य भी बहुत सी प्राचीन वस्तुएं उपलब्ध हुई हैं।

भाषा विज्ञान के पण्डित ए. सी. उलनर ने उस कूच भाषा की संस्कृत के साथ तुलना करते हुए कुछ भारतीय आयुर्वेदिक ओषधिवाचक संस्कृत शब्द वहां से ढूंढकर दिये हैं जो कुछ तो अविकृत (मूल) अवस्था में हैं तथा कुछ में उच्चारण अथवा थोड़े बहुत स्वरूप का भेद है। वे शब्द निम्न हैं जो कि रायल एशियाटिक सोसाइटी पत्रिका⁴ में प्रकाशित हुए हैं—

कूच भाषासंस्कृतकूच भाषासंस्कृत
माञ्च्छ(मञ्जिष्ठा)शालवर्णी(शालपर्णी)
करञ्जपीज(करञ्जबीज)किरोत(गिलोय)
अपमार्क(अपामार्ग)कुन्तर्क(गुन्द्रक)
सारिप(शारिवा)चिपक(जीवक)
मग्गी(मार्गी)शंश्षपो(शिंशपा)
किञ्चेलं(किञ्चल्क)पिप्पाल(पिप्पली)
तकरु(तगर)अश्वकान्ता(अश्वगन्धा)
पङ्करच(भृङ्गराज)तेचवती(तोजोवती)

१. १-४ की टि. सं. उपो. पृ. १०५-१०६ का. १-२ देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

२८५

करुणसारि(कालानुसारी)मेत(मेदा)
पितरी(विदारी)खादिर(खदिर)
सूक्ष्मेल(सूक्ष्मेला)मोतर्ते(अजमोद)
प्रियङ्कु(प्रियङ्गु)कोरोशा(गोरोचन)
विरङ्ग(विडङ्ग)पिस्सौ(विश्वा)
उपद्रव(उपद्रव)सुमां(सोम)

इस प्रकार अनिश्चित पूर्व समय से इतनी दूर विद्यमान प्राचीन कूच जाति का आर्यजाति के रूप में स्पष्टरूप से उल्लेख होने से तथा उसी के अनुसार बाद में वहां पहुंचे हुए भारतीयों का उनके द्वारा आत्मीय के रूप में सन्मान का उल्लेख होने से कूच जाति भारतीय आर्यजाति सिद्ध होती है। इस प्रकार भारतीय आर्य जाति के रूप में निश्चित हुई कूच जाति की भाषा में भारतीय ओषधिवाचक शब्दों के विकृत एवं अविकृत रूप में मिलने से यह कहा जा सकता है कि या तो भारतीय जाति के उस देश में जाने के साथ ही ये शब्द भी वहां पहुंचे होंगे अथवा समयान्तर से ये शब्द वहां पहुँचे होंगे। दोनों ही अवस्थाओं में भारतीय आयुर्वेद का इतने दूर तथा इतने प्राचीन काल में प्रचार होना उसकी प्राचीनता को सिद्ध करता है।

इरान देश के निवासी पारसियों के अवेस्ता नामक मूलग्रन्थ का अथर्ववेद से तथा उसकी भाषा का देववाणी (संस्कृत) से विशेष सादृश्य दिखाई देता है। उनके उपास्य देवता अहुर का भारतीयों द्वारा परिचित असुर से उच्चारण मात्र का अन्तर है। अग्नि की उपासना, गौपूजन, सूर्योपासना, होमप्राधान्य मित्र आदि देवताओं सम्बन्धी अनेक विषयों में भारतीय झलक मिलती है। इतिहासकार भी लिखते हैं कि इरान जाति भारतीय जाति से ही विभक्त हुई है। इरान देश में एकमेनियन्स (Achaemenians) राजा के कुल में तथा प्रथम डेरियस (Darius ई. पू. ५२१) नामक राजा के समय में डेमोकेडियस् (Demokedes) नामक तथा कुछ समय बाद स्टेस्यिस (Ctesias) तथा अपोलोनीड्स् (Apollonides) नामक ग्रीक वैद्य थे। इरान तथा ग्रीस देश की चिकित्सा के विषय में परस्पर विचार करने पर इरान देश की चिकित्सा में ग्रीस देश की चिकित्सा का प्रभाव था, इस¹ विषयक उल्लेख भी मिलता है। इरान देश में एसेनियन् राजा के राजवंश में ग्रीक वैद्यों की तरह भारतीय वैद्य भी थे। स्पीगल² नामक विद्वान् ने लिखा है कि उस देश के तथा दूसरे देश के वैद्यों (चिकित्सकों) में परस्पर प्रतिस्पर्धा भी थी। इस प्रकार इरान देश की चिकित्सा के जिन-जिन अंशों में असाधारण ग्रीक विषय मिलते हैं, उस-उस अंश में ग्रीक-चिकित्सा का प्रभाव माना जा सकता है तथापि वैद्यक के विषय में वहां जो-जो भारतीय आयुर्वेद के रोग तथा शारीर सम्बन्धी विचार समानरूप से मिलते हैं अथवा ग्रीक आदि साधारण भी भारतीय विचार वहां मिलते हैं उनमें भारतीय चिकित्सा तथा भारतीय वैद्यों का ही प्रभाव समझना चाहिये। श्रीयुत कीथ (A. B. Keith) महाशय ने ग्रीस वैद्यक में भारतीय आयुर्वेद विषयों की जो समानता दिखाई देती है वहां भी साक्षात् अथवा परम्परा से (Direct or Indirect) भारतीय प्रभाव ही है जिसका आगे निरूपण किया जायगा। इरान तथा भारत देश में वैसे भी परस्पर समीपता है। उसी इरान देश के राजा प्रथम डेरियस की सहायता के रूप में ईस्वी पूर्व ४७९ समय में भारतीय सेना का ग्रीस के सैनिकों के साथ युद्ध³ का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार इरान तथा


१. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १०७ में देखें।
२. स्पीगल कहता है कि यह स्वाभाविक है कि अधिक आबादी वाले नगरों में विदेशी चिकित्सकों को देशी चिकित्सकों के साथ प्रायः प्रतिस्पर्धा रहती थी। ससेनियनों के समय भी ग्रीक वैद्य राजकुल में मिलते हैं तथा स्पीगल की सम्मति में भारतीय वैद्य भी वहां अवश्य थे। (Eran Alterth) E. R. E. Vol 4 P. 759.
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १०७ में देखें।

२८६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

भारत के पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध में वहां भारतीय वैद्यों की भी उपस्थिति होने से वहां भारतीय वैद्यों का विशेषरूप से प्रभाव प्रतीत होता है। इरान देश की पर्शु भारतीय¹ (Pehlavi) भाषा में भिषज, भेषज तथा मन्त्र आदि शब्दों से सादृश्यता रखनेवाले क्रमशः वेषज (Baeshaza, Beshaj) भिजिष्क (Bejishka) तथा माथ्र आदि शब्द भी मिलते हैं। अर्मीनियन (Armenian) भाषा में भी इन शब्दों के समान ही शब्द (Bzhishk, Bzhshkel) मिलते हैं। ईरानी भाषा में भी वैद्यवाचक भिजिष्क शब्द तथा ओषधिवाचक वेषज शब्द भारतीय भिषग् तथा भेषज शब्दों के ही उच्चारण भेद से रूपान्तर हैं। इस अवस्था में अथर्ववेद तथा ऋग्वेद में आये हुए ये प्रधान शब्द भी यदि वहां भारत से ही पहुँचे हों तो भारतीय आयुर्वेद का प्रभाव इससे भी बहुत कुछ अनुमान किया² जा सकता है। पारसी मत के प्रवर्तक जरथुष्ट्र से भी प्राचीन उस देश की मागी जाति द्वारा भारतीय ब्राह्मणों से इस गुप्त वैद्यक विद्या को प्राप्त करने विषयक चतुर्थ शताब्दी के रोम के इतिहासलेखक, अमीनस् तथा सीनस् आदि के लेखों के मिलने से तथा इरान देश में अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीय वैद्यक के स्पष्ट प्रभाव तथा भारतीय वैद्यों के वृत्तान्त मिलने से वहां भारतीय आयुर्वेद का प्रकाश चिरकाल से स्पष्ट प्रतीत होता है। आयुर्वेद के चरक तथा वृद्धजीवकीय आदि ग्रन्थों में बाह्लीकभिषक् के रूप में काङ्कायन का उल्लेख मिलता है। प्राचीन काल में बहुत देर तक इरान के आधिपत्य में आया हुआ बलख् देश बाह्लीक शब्द से कहलाता था। सुश्रुतसंहिता की व्याख्या में काङ्कायन को जो सुश्रुत का सतीर्थ्य कहा है उसे प्रामाणिक मानकर वहां दिये हुए 'बाह्लीकभिषजां वरः' द्वारा निर्दिष्ट काङ्कायन द्वारा बाह्लीक देश में प्रचलित वैद्यक विद्या भी भारतीय ही सिद्ध होती है। इसके अतिरिक्त भारतीय आचार्यों के साथ पक्ष प्रतिपक्ष रूप में संवाद करनेवाले काङ्कायन को आचार्यों के साथ सम्मान देने से निबन्ध संग्रह आदि ग्रन्थों में संस्कृत भाषा में लिखे हुए उसके वचनों का उल्लेख मिलने से उसका चिकित्सा सम्प्रदाय भी अन्यदेशीय न होकर भारतीय ही प्रतीत होता है। बुद्ध सामयिक जीवक के गुरु रूप में निर्दिष्ट आत्रेय तथा कश्यप द्वारा निर्दिष्ट बाह्लीकभिषक् काङ्कायन काक समय ग्रीक वैद्यों के सम्पर्क में आये हुए पूर्वोल्लिखित ईरानी राजाओं के समय से कम से कम भी एक दो शताब्दी पूर्व का मिलने से वहां भारतीयों का संबन्ध तथा प्रभाव प्राचीन ही सिद्ध होता है। यद्यपि निश्चयपूर्वक कुछ न कह सकने पर भी 'इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका' नामक³ बृहत्कोश में लिखा है कि इरान तथा भारत से कुछ वैद्यक विषय ग्रीसवैद्यक में गये हुए दिखाई देते हैं।

इस प्रकार अत्यन्त दूर-दूर देशों में शाखा तथा उपशाखारूप अनेक प्राचीन जातियों में भी न्यूनाधिक रूप से भारतीय प्राचीन व्यवहृतियों, अथर्ववेद के समान मान्त्रिक प्रयोग तथा औषधप्रयोग द्वारा चिकित्सा सम्प्रदाय के सूचक अनेक लक्षण मिलते हैं। अनावश्यक विस्तार के डर से इनका केवल संकेतमात्र ही किया है। इन उदाहरणों से भारत तथा अन्य देशों का प्राचीन काल में परिचय, सम्पर्क, व्यवहार तथा विद्याविज्ञान के परस्पर विनिमय का निश्चय होता है।


१. औषध, विरोपण (घाव भरना), औषधोपचार, वैद्य इन सबके लिये एक सामान्य शब्द बेशग् है। तुलना कीजिये— संस्कृत भिषज्-भेषज् : पहलवी में यह शब्द बेशज् रूप में मिलता है। इसीके अत्यधिक विकृत रूप आधुनिक फारसी का बेजिशक शब्द, आरमीनियन भाषा के बेजिश्क (वैद्य) बेज्शकेल (विरोपण-घाव भरना) है। By. L.C. Casartelli, E.R.E. Vol 4, P. 757.
२. प्राचीन इरान के प्रचलित चिकित्सा विज्ञान पर ग्रीकों का बिलकुल भी प्रभाव नहीं है। ईरानियों के अवेस्ता नामक ग्रन्थ में (Bhaesaj) शब्द प्रयुक्त हुआ है जो कि निश्चित रूप में गाथाओं की अपेक्षा ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में प्रयुक्त हुए भारतीय शब्द भेषज या भैषज्य से निकला हुआ प्रतीत होता है। इस शब्द का मूल इन्डो-यूरोपियन नहीं है तथा ग्रीक लोग भी इसे प्रयुक्त नहीं करते थे। इस शब्द का ईरानी भाषा में होना इस बात को प्रकट करता है कि ईरानियों ने चिकित्सा विज्ञान ग्रीकों से नहीं, अपितु हिन्दुस्तानियों से ग्रहण किया है। यदि हम यह मान भी लें कि अथर्ववेद तथा अवेस्ता एक ही काल के हैं तो भी यह निःसन्देह है कि ऋग्वेद इन दोनों से प्राचीन है तथा यह शब्द ऋग्वेद में भी पाया जाता है।
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १०८ में देखें।

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २८७

प्राचीन भारतयी सभ्यता के अन्य विषयों की तरह आयुर्वेद भी प्राचीन ही है। आध्यात्मिक विचारों तथा बाह्य कलाकौशल आदि में उन्नति के शिखर पर पहुँचा हुआ भारत सबसे मुख्य शरीरयात्रा के लिये उपयोगी चिकित्साविज्ञान में किस प्रकार उदासीन रह सकता था। आयुर्वेदीय संहिताओं में तो इस सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही ब्रह्मा से आयुर्वेद का उद्गम बतलाया गया है। अन्य विद्याओं की तरह वैद्यक विषय भी ऋक्, यजु, साम, तैत्तिरीय तथा अथर्ववेद में विशेषरूप से पाये जाते हैं।

वैदिक काल से ही आयुर्वेद का सन्मान होने से इसे उपवेद नाम दिया गया है। वैदिक काल में अन्य विद्याओं की तरह आयुर्वेद में भी बहुत से विचारशील तथा तत्त्वदर्शी ऋषि हुए हैं। उस समय सैकड़ों वैद्यों, हजारों ओषधियों, अनेक रोगों तथा उनके उपायों के होने का प्रतिपादन पहले ही किया जा चुका है। उसके बाद भी आधुनिक विचारों के अनुसार लगभग तीन हजार वर्ष प्राचीन माने जानेवाले ऐतरेय, शतपथ तथा कौषीतकि आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में छान्दोग्य तथा गर्भोपनिषत् में श्रौत एवं गृह्यसूत्रों में और रामायण^१ महाभारत^२ तथा पुराण आदियों में भी अङ्ग-प्रत्यङ्ग, शारीरिक रोग, उसके परिहार के उपाय, ओषधि आदि आयुर्वेद के विषय, उनके इतिहास तथा उपाख्यान आदि का उल्लेख मिलता है। महाभारत^३ के युद्ध में भी स्थान-स्थान पर योद्धाओं के साथ वैद्यों का जाना, सब उपकरणों से युक्त तथा शास्त्रों में पारङ्गत अनेक चिकित्सकों का युद्धशिविरों में उपस्थित होना तथा उनके द्वारा आहत (घायल) रोगियों की चिकित्सा का उल्लेख मिलता है। मत्स्य^४ ने भी इस विषय का निर्देश किया है। रामायण में सुषेण वैद्य की कथा प्रसिद्ध ही है।

कौटिलीय अर्थशास्त्र के युद्ध^५ प्रकरण में शस्त्र, यन्त्र, अगद, स्नेह, वस्त्र तथा हस्तिचिकित्सक और स्त्रीचिकित्सक आदियों के भी सेना के पृष्ठ भाग में होने का निर्देश मिलता है। पुराण-इतिहास आदि में भी यह विषय पर्याप्त मिलता है।

महाभारत में आता है कि गालब ऋषि गुरुदक्षिणा में देने के लिये घोड़ों की प्राप्ति के लिये जब काशीराज दिवोदास के पास पहुंचा तो उसे हिमालय की तलहटी में वायव्यदिशा में मारीच कश्यप का आश्रम बतलाया गया। इस प्रकार दिवोदास के कुछ पूर्व अथवा उसके साथ ही आश्रम बनाकर रहने वाले मारीच कश्यप का उल्लेख, मारीच कश्यप का ऋक्सर्वानुक्रम सूत्र तथा बृहद्देवता में भी उल्लेख है, आत्रेय के समकालीन के रूप में मारीच कश्यप का उल्लेख, वार्योविद का मारीचकश्यप तथा आत्रेय पुनर्वसु के साथ सहभाव, कृष्णात्रेय तथा पुनर्वसु आत्रेय का समानाधिकरण (एक व्यक्तित्व), चिकित्साविज्ञान के प्रवर्तक के रूप में कृष्णात्रेय का महाभारत में निर्देश, आत्रेय के शिष्यरूप में भेड का उल्लेख, भेड के सहभावी तथा आत्रेय पुनर्वसु के शिष्य के रूप में गान्धार के राजा नग्नजित् का उल्लेख, नग्नजित् तथा दारुवाह का एक ही होना, दारुवाह का काश्यप संहिता में निर्देश, गान्धार के राजा नग्नजित् का ऐतरेय में तथा गान्धार के प्राणवित् नग्नजित् तथा उसके पुत्र स्वर्जित् का शतपथ ब्राह्मण में कीर्तन, दिवोदास का कौषीतकिब्राह्मण, कौषीतकि उपनिषत्, काठकसंहिता के ब्राह्मण अंश तथा महाभारत में उल्लेख तथा दिवोदास के पूर्वपुरुष के रूप में धन्वन्तरि का उल्लेख इत्यादि उदाहरणों को दृष्टि में रखकर विचार करने पर प्रतीत होता है कि मारीच कश्यप, पुनर्वसु आत्रेय, भेड, नग्नजित् दारुवाह तथा वार्योविद आदि चिकित्सा शास्त्र के आचार्य, ऐतरेय, कौषीतकि, शतपथ, काठक तथा अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों से पूर्व तथा धन्वन्तरि और दिवोदास के समान ही ब्राह्मण ग्रन्थ तथा उपनिषदों के काल में थोड़े बहुत पौर्वापर्य सम्बन्ध के साथ विद्यमान थे, जैसा कि पहले भी निर्देश किया जा चुका है। आत्रेय तथा काश्यप आदि द्वारा भी बहुत से पूर्वाचार्यों के मत तथा नामों का निर्देश मिलता है। इन आत्रेय आदियों द्वारा संहिताओं के निर्माता होने पर भी पूर्वाचार्यों के विप्रकीर्ण विषय भी संगृहीत किये गये प्रतीत होते हैं।

इस प्रकार वैदिक काल से परम्परापूर्वक आया हुआ तथा क्रमशः विकास के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हुआ चिकित्सा विज्ञान प्राचीन ग्रन्थों के लुप्त हो जाने के कारण यद्यपि आजकल उपलब्ध नहीं होता है तथापि उपलब्ध आत्रेय, सुश्रुत


१. १-३ की टि. सं. उपो. पृ. १०८-१०९ में देखें।
२. ४-५ की टि. सं. उपो. पृ. १०९ में देखें।

२८८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

तथा काश्यप आदि के ग्रन्थों में आये हुए विषयों को देखने से यह कहा जा सकता है कि उस समय वह विज्ञान अत्यन्त उन्नत अवस्था में था। कायचिकित्सा (Medicine) के विद्वान् आत्रेय, कश्यप तथा भेड आदि द्वारा भी शल्यक्रिया (Surgery) का निर्देश करने से ज्ञात होता है कि शल्यविद्या भी प्राचीन थी तथा उस समय पृथक् प्रस्थान (विज्ञान) के रूप में प्रसिद्ध थी। इन आत्रेय आदि द्वारा उल्लिखित शालाक्य आदि अन्य ६ विभागों के विषय में भी विचारपूर्ण एवं प्रौढ़ ग्रन्थ होंगे। कालवश ये ग्रन्थ भी लुप्त हो चुके हैं, यह भी खेद का विषय है।

आश्विन, भारद्वाज, जतूकर्ण, पराशर, हारीत, क्षारपाणि, भानुपुत्र, भोज १ तथा कपिलबल आदि आचार्यों के भूततन्त्र के मूल ग्रन्थों के आजकल न मिलने पर भी उनके वचन प्राचीन ताडपत्रीय ज्वरसमुच्चय में तथा इनके और इनके अतिरिक्त अन्य भी कुछ आचार्यों के वचन बाद के तन्त्रसार, चरक की व्याख्याओं तथा निबन्धग्रन्थों में उद्धृत मिलते हैं। इनसे स्पष्ट ज्ञात होता है कि उस समय तक भी उन आचार्यों के ग्रन्थ उपलब्ध थे तथा उनका परिशीलन भी किया जाता था।

प्राचीन आत्रेय, कश्यप आदि, काम्पिल्य तथा गङ्गाद्वार आदि में तथा भिन्न-भिन्न स्थानों में रहने वाले आचार्य उन-उन स्थानों पर अपने शिष्य सम्प्रदाय में उपदेश परम्परा द्वारा ही केवल अपने विचारों को प्रकट नहीं करते थे अपितु जिसप्रकार आजकल के वैद्य भिन्न-भिन्न संस्थाओं तथा विद्यापीठों के प्रतिनिधि रूप में भिन्न-भिन्न संस्थाओं तथा विद्यापीठों के प्रतिनिधि रूप में भिन्न-भिन्न स्थानों में एकत्र होकर उसे सम्मेलन का रूप देकर उनमें नवीन एवं प्राचीन विषयों के सम्बन्ध में विचार करते हैं उसी प्रकार प्राचीन काल में भी समय-समय पर भिन्न-भिन्न देशों के तत्कालीन विद्वान् एवं प्रसिद्ध आचार्य भिन्न-भिन्न २ स्थानों में एकत्र हो कर तथा परिषत् की स्थापना करके परस्पर विचार विमर्श किया करते थे। इस प्रकार विमर्श के बाद कसौटी पर कसे हुए उज्ज्वल रत्नों के समान वे सिद्धान्त, नवीन-नवीन विचार तथा उनके अभिप्राय आदि उनकी संहिताओं में स्थान पाते थे।

पाणिनि द्वारा भी 'गर्गादिभ्यो यञ्' (४-१-१०५) सूत्र के गर्गादि गण में जतूकर्ण, पराशर, अग्निवेश आदि शब्दों का उल्लेख किया होने से, 'कथादिभ्यष्ठक्' (४-४-२) सूत्र के कथादि गण में आयुर्वेद शब्द से 'साधु' अर्थ में 'आयुर्वेदिक' पद को सिद्ध किया होने से प्रतीत होता है कि उस समय भी आयुर्वेद विद्या उन्नत अवस्था में थी तथा उस विद्या के कुशल विद्वान् भी बहुत से थे। 'मन्त्रायुर्वेद प्रामाण्यवच्चतत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात्' । (२-१-६७) इस सूत्र द्वारा सूत्रकार गौतम ने जिस प्रकार उन-उन ओषधियों के उपयोग तथा उपदेश के अनुसार उन-उन रोगों की निवृत्ति से आयुर्वेद तथा विषभूत अशनि (बिजली) के प्रतिषेध के लिये मन्त्रों के फलों को देखकर उनकी प्रामाणिकता को स्वीकार किया है उसी प्रकार सब वेदनाओं के लिये आयुर्वेद को प्रामाणिक मानकर उसकी व्यवस्था करने से इन प्राचीन आचार्यों के समय भी आयुर्वेद विद्या का प्रचार, उसका सन्मान तथा प्रामाणिकता ज्ञात होती है। न्यायमञ्जरी ३ के रचयिता जयन्तभट्ट ने भी इस विषय में बहुत कुछ लिखा है।

महावग्ग आदि पालीग्रन्थों में कालाञ्जन, रसाञ्जन, स्रोतोञ्जन तथा गैरिक आदि ओषधियों, भगन्दर आदि रोगों, त्रिदोष, स्वेदन, बस्तिकर्म आदि बहुत से भारतीय आयुर्वेदिक विषयों के उन्हीं शब्दों में मिलने से तथा जीवक के चिकित्सा वृत्तान्त से बुद्ध के समय (६०० ईस्वी पूर्व) भी आयुर्वेद का प्रचार स्पष्ट प्रकट होता है।


१. यह भोज धारानगरी का राजा नहीं है अपितु सुश्रुत का समकालीन प्राचीन आचार्य है।
२. हिमालय के पार्श्व, चैत्ररथ वन, जनपद मण्डल, पाञ्चाल क्षेत्र, काम्पिल्य की राजधानी तथा पञ्चगङ्गा नामक स्थानों पर आयुर्वेदीय विषयों पर विचार करने के लिये महर्षियों के एकत्र होने का चरक संहिता में स्थान-स्थान पर उल्लेख मिलता है। विमानस्थान में परिषदों का निर्देश भी है। काश्यपसंहिता में भी जातिसूत्रीय अध्याय में 'इति परिषद् (पृ. ७९) भूयांस (पृ. १५२) इत्यादि द्वारा परिषत् तथा विद्वानों के समवाय का उल्लेख मिलता है।
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. ११० में देखें।