काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २७७
कुछ ऐसी वस्तुओं का प्रयोग मिलता है जो कि यूरोप में उत्पन्न नहीं होती हैं, अपितु केवल भारत में उत्पन्न होती हैं तथा भारतीयों द्वारा ही ज्ञात हैं। उससे ६० वर्ष पूर्व (ई. पू. ४००) थियोफ्रेस्टस (Theophrastus) नामक विद्वान् के लेख में भी बहुत सी भारतीय वनस्पतियों का प्रयोग मिलता है। इसी प्रकार अन्य भी बहुत से प्राचीन पाश्चात्त्य चिकित्सकों द्वारा भारतीय वनस्पतियों तथा ओषधियों का उल्लेख किया होने से यह कहा जा सकता है कि उनकी चिकित्सा में भारतीय चिकित्सा विज्ञान का प्रभाव है।
इस प्रकार दोनों पक्षों के विचारों के मिलने से वस्तुस्थिति का निर्णय करने के लिये चिकित्सा विज्ञान के साथ-साथ सभ्यता, यातायात तथा प्राचीन इतिहास के विषय में भी विचार करने की आवश्यकता है इसलिये इन सब विषयों के सम्बन्ध में भी संक्षेप से विचार करके हम अपने प्रकृत (मूल) विषय पर आयेंगे।
भारतीयों के समान अपने को आर्य कहने वाले पाश्चात्यों के प्रथम उद्गम स्थान के विषय में कुछ लोगों का मत है कि उत्तरध्रुव (North-pole) के समीप का प्रदेश ही उनका मूल स्थान था तथा वहीं से आर्य लोग क्रमशः फैले हैं। कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि सुदूर उत्तरभाग१ ही आर्यों का प्रथम उद्गमस्थान है। वहां से फैलकर कुछ पश्चिम प्रदेशों में तथा कुछ पूर्व प्रदेशों में चले गये हैं। इनमें से पूर्व की ओर जाने वाले ही भारतीय है। परन्तु यह सर्वसम्मत है कि संसार के उपलब्ध साहित्यों में ऋग्वेद सबसे प्रथम एवं प्राचीन साहित्य है। ऋग्वेद में आये हुए देश, नदी, नगर, ग्राम तथा पर्वत आदि सब, पाञ्चाल, सिन्धु तथा सौवीर आदि देशों के आसपास के प्रतीत होते हैं। इसमें आये हुए आर्यों के वर्णन में उनका किसी अन्य स्थान से आने तथा उनके किसी अन्य प्रथम उद्गम स्थान का निर्देश नहीं मिलता है। इसमें सुर तथा असुरों के परस्पर संघर्ष का वृत्तान्त मिलता है। इसके अनुसन्धान से प्रतीत होता है कि पाञ्चाल, सिन्धु
१. यह अब सिद्ध हो चुका है कि प्राचीन इण्डो-आर्यन, ग्रीक, ईरानी, स्लैवोनिक, ट्युटोनिक, इटैली-सैलटिक तथा तुखेरियन आदि सब भाषाएँ एक ही मूल भाषा से निकली हैं जिसे हम इण्डोयुरोपियन या स्थूल रूप से आर्यन कह सकते हैं। संभवतः दूसरी सहस्राब्दी ईस्वी पूर्व के प्रारम्भ में उस इण्डो-यूरोपियन अथवा आर्यन भाषा के बोलने वालों के द्वारा वह भाषा तथा एक बहुत विकसित संस्कृति एशिया तथा यूरोप में फैली हुई थी। उस मूल आर्यन भाषा को बोलने वाले या तो डैन्यूब की घाटी में हंगरी के मैदानों में रहते थे जैसा कि Giles ने अपनी पुस्तक Cambridge History of India में लिखी है अथवा Carnoy तथा अन्य विद्वानों के अनुसार वे कैसपियन सागर के पास दक्षिण रूस में रहते थे। अस्तु, यह निर्विवाद है कि ये आर्य लोग भूमि के उस भाग पर रहते थे जहां पर भोजपत्र तथा बेंत आदि के वृक्ष अधिकांश में होते हैं। तथा ये वृक्ष अनेक विद्वानों के अनुसार पूर्वी प्रशिया से पामीर तक के क्षेत्र में होते हैं। ईरानी परम्परा के अनुसार आर्यों का मूलस्थान (Aryanam vaejo-the home land of the Aryas) काकेशश (Caucasus) का एक प्रदेश-वर्तमान अजरबेजान (Ajarbaizan) माना जाता है। मित्तानी या मितन्नी (Mittanians) अभिलेखों में मित्र, नासत्य, इन्द्र, वरुण आदि देवताओं के नाम मिलते हैं तथा १८०० से १४०० ईस्वी पूर्व के बीच में आर्यों के एशिया माइनर में उपस्थित होने के अन्य भी चिह्न मिलते हैं। इन प्रमाणों से प्रतीत होता है कि इस काल में नई भूमि के अनुसन्धान में आर्यों की बहुत सी शाखाएँ विद्यमान थीं और संभवतः इसी काल में इण्डो-इरानियन पूर्व की ओर चलकर हिन्दुस्तान तथा इरान में बस गये थे। इसके बाद इण्डो-इरानियनों में शीघ्र ही धार्मिक अनुशासन के प्रश्न पर मतभेद होकर दो विभाग हो गये तथा वह शाखा जिसे हम इण्डो-आर्यन कहते हैं और भी पूर्व में हिन्दुस्तान में पहुंच गई। हिन्दुस्तानियों तथा इण्डो-आर्यनों के साहित्य तथा धर्म (अर्थात् इनके ग्रन्थ अथर्ववेद तथा अवेस्ता) के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट प्रतीत होता है कि इनका आदि स्रोत एक ही धर्म है तथा इनके रीति-रिवाज भी एक ही हैं। यह धर्म पूर्णरूप से कर्मकाण्डी था तथा प्राचीन काल में यह धर्म निःसन्देह रूप से एक ही मूल आर्यन भाषा के बोलने वालों से प्रारंभ हुआ था क्योंकि इस कर्मकाण्ड के बहुत से अंश आर्यन भाषा को बोलने वाली दूसरी शाखाओं में भी मिलते हैं। इनके रीतिरिवाज भी बहुत प्राचीन प्रतीत होते हैं क्योंकि ये होमर के काव्य, अवेस्ता ग्रन्थ तथा वेदों में आये हुए रीति-रिवाजों के समान ही हैं।