भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२७६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

ऊपर आये हुए ये देश प्राचीन ही प्रतीत होते हैं। यहां 'मगधासु महाराष्ट्रम्' द्वारा मगध का महाराष्ट्र के रूप में निर्देश तथा कौशल्य देश का उल्लेख है। ४०० वर्ष ईसवी पूर्व में कोशल देश का मगध राज्य के अङ्ग के रूप में वर्णन मिलता है। बुद्ध के समय कोशल देश की भी प्रतिष्ठा थी। महाराष्ट्र की मगध के अन्तर्गत होने की परिस्थिति का आर. डी. बनर्जी तथा एच. आर. चौधरी ने अपनी प्राचीन पुस्तकों में, मौर्यकाल से पूर्व नन्द के समय तथा बुद्धकालीन शिशुनाग वंश के अजातशत्रु के समय उल्लेख किया है। कोशल का पृथक् उल्लेख होने से पाण्ड्य देश के कीर्तन न करने के साथ मगध का महाराष्ट्र के रूप में उल्लेख होना बुद्धकालीन समय को सूचित करता है। वात्स्य द्वारा पूरित खिलभाग में इस वर्णन के मिलने से तथा वात्स्य के प्रतिसंस्करण में इन उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी, श्रमण, निर्ग्रन्थ, शक, पल्लव, हूण आदि सन्देहास्पद शब्दों के मिलने से भी वात्स्य का समय बुद्ध के समकालीन प्रतीत होता है।

इस संहिता के पूर्वभाग में भोजनकल्पाध्याय (श्लो. ४०-५१) में भी कुछ देशों के नामों का उल्लेख मिलता है। इनमें से कुरु-कुरुक्षेत्र-नैमिष-पाञ्चाल-कोशल-शूरसेन-मत्स्य-दशार्ण-शिशिराद्रि (हिमाद्रि)-विपाशा-सारस्वत-सिन्धु-सौवीर-काश्मीर-चीन-अपरचीन-खश-वाहीक-काशी-पुण्ड्र-अङ्ग-बङ्ग-कलिङ्ग-किरात आदि कुछ प्रसिद्ध देशों का महाभारत आदि प्राचीन ग्रन्थों में भी उल्लेख मिलने से ये देश भी प्राचीन ही प्रतीत होते हैं। इसके अतिरिक्त माणीचर-हारीतपाद-दासेरक-शातसार-रामण-काच-अनूपक-पट्टन आदि देशों का अन्यत्र कहीं नाम न मिलने से ये अप्रसिद्ध देश भी प्राचीन काल के ही प्रतीत होते हैं। ये देश कहां के हैं इस विषय में विचार करना विद्वानों का काम है। खिलभाग के देशों में महाराष्ट्र के रूप में निर्दिष्ट मगध का यहां नाम भी नहीं दिया है। कोशल का उल्लेख अवश्य है। वहां पर निर्दिष्ट अन्य भी बहुत से देशों का यहां निर्देश नहीं है। प्रत्युत प्राचीन समझे जाने वाले तथा बाद में जिनका व्यवहार लुप्त हो गया है ऐसे सिन्धु-सौवीर-कुरु-पाञ्चाल-तथा बाह्लीक आदि देशों का ही पूर्वभाग में उल्लेख मिलता है। इस प्रकार पूर्व तथा उत्तरभाग में आये हुए देशों के अनुसन्धान करने पर बुद्धकालीन वात्स्य से पूर्वभाग के रचयिता वृद्धजीवक तथा मूल आचार्य कश्यप का प्राचीनत्व सिद्ध होता है।

(४) भारतीय चिकित्सा का वर्णन

इस भारतीय आयुर्वेद विद्या का विकास अपने प्राचीन सम्प्रदाय के द्वारा ही हुआ है अथवा इसमें किसी दूसरे देश की चिकित्सा का भी सहयोग है ? यूरोप देश में ग्रीस में सर्वप्रथम सभ्यता तथा चिकित्सा के विकास का इतिहास मिलने से उस देश की चिकित्सा का भारतीय चिकित्सा पर कोई प्रभाव है अथवा नहीं ? तथा अन्यदेशीय चिकित्साओं का प्रभाव न होने पर भी भारतीय चिकित्सा अपने देश में ही सीमित रही है अथवा उसका प्रभाव दूसरे देशों में भी पहुंचा है ? इत्यादि विषयों पर विचार किये बिना प्राचीन भारतीय आयुर्वेद की स्थिति का सम्यक् ज्ञान संभव नहीं है तथा आयुर्वेद के प्राचीन आचार्यों का भारतीय उपदेश परम्परा द्वारा प्रचलित सम्प्रदाय भी शिथिल हो जाएगा। इस प्रकार उपर्युक्त विषयों के संबन्ध में विचार करने के लिये अनेक विद्वानों के मतों को देकर हम कुछ अपने विचार भी प्रकट करते हैं।

कुछ लोग भारतीय चिकित्सा की अपेक्षा पाश्चात्य चिकित्सा को प्राचीन सिद्ध करने की इच्छा से दोनों में कुछ सादृश्य देखकर भारतीय वैद्यक पर पाश्चात्य विज्ञान का प्रभाव मानते हैं तथा भेड का गान्धार देश के निवासी के रूप में उल्लेख होने से कहते हैं कि यवनों के सम्पर्क के कारण उसकी चिकित्सा पद्धति में भी यवनों का प्रभाव था।

इसके अतिरिक्त कुछ लोग कहते हैं कि सर्व प्रथम यूरोप में चिकित्सा विज्ञान का प्रादुर्भाव ईसवी-संवत् से पूर्व पांचवी शताब्दी में (ई. पू. ४६०) हिपोक्रिटस (Hippocrates) नामक ग्रीक विद्वान् के द्वारा हुआ है, जो कि वहां के चिकित्सा विज्ञान का पिता कहलाता है। उसके चिकित्साग्रन्थों में जीरा-अदरक-मरिच-दालचीनी-इलायची-तेजपत्र आदि