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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

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चीरराज्य—इसका महाभाष्य में भी उल्लेख है। चोर शब्द को कुछ लोग केरलपुत्र शब्द का अपभ्रंश तथा संक्षिप्त रूप बतलाते हैं। यह आजकल मैसूर राज्य के अन्तर्गत है।

चोर—चोर तथा चोल एक ही है। अशोक के शिलालेख में चोड शब्द से व्यवहार किया गया है। काञ्जीपुर के चोल नामक राजा के नाम से इसका यह नाम था। पद्मपुराण में चोल का द्रविड देश में उल्लेख किया गया है। पाणिनि के गणपाठ में भी देशवाची चोल शब्द मिलता है। बृहत्संहिता में भी इसका उल्लेख मिलता है। यह आजकल कारोमण्डल प्रदेश के अन्तर्गत है।

पुलिन्द—महाभारत के सहदेव दिग्विजय में दक्षिण में पुलिन्द का उल्लेख है। अशोक के शिलालेख में भी इसका निर्देश है। स्मिथ् नर्मदा के तट पर विन्ध्य पर्वत के मध्य में पुलिन्द देश को बतलाता है। तारातन्त्र में कामरूप के उत्तरभाग में तथा महाभारत के वनपर्व में हरिद्वार के उत्तर-पश्चिम प्रदेश में भी पुलिन्द का उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि पुलिन्द जाति के अनुसार अन्यत्र भी इसका प्रयोग किया गया है। स्मिथ् महोदय लिखते हैं कि हिमालय प्रान्त की जातियों के लिये पीछे से पुलिन्द शब्द प्रयुक्त होने लगा था।

डू (द्र) बिड—महाभारत के वनपर्व, वराहसंहिता तथा मनुस्मृति आदि में भी इसका उल्लेख है। मद्रास से लेकर कन्याकुमारी तक का प्रदेश द्रविड नाम से कहा जाता था। बूलर महाशय द्रविड का ही दूसरा नाम चोल बतलाते हैं।

करघाट—महाभारत (सभा. अ. ३१) के सहदेव दिग्विजय में दक्षिण में करहाट देश का उल्लेख मिलता है। स्कन्द पुराण के सह्याद्रि खण्ड में इसे काराष्ट्र देश की राजधानी लिखा है। भाण्डारकर महोदय ने भी E. H. D. पुस्तक में इस देश का वर्णन किया है। आजकल यही देश कराड नाम से प्रसिद्ध प्रतीत होता है।

कान्तार—महाभारत के सहदेव दिग्विजय में दक्षिण में कान्तारक देश का उल्लेख मिलता है। इसे ही अरण्यक भी कहते हैं। महाभारत (सभा. अ. ३१) तथा देवीपुराण में भी अरण्य का उल्लेख मिलता है। यह देश आजकल औरङ्गाबाद तथा दक्षिण कोंकण कहलाता है। वहां की राजधानी तगर थी जिसका आजकल नाम दौलताबाद है।

वराह—वितस्ता के दक्षिण में वराहावतार के स्थान की जिस प्रकार वराहमूल के रूप में प्रसिद्धि है उसी प्रकार कौशिकी नदी के किनारे नेपाल के आसपास कोकामुखतीर्थ स्थान की प्राचीन समय से वराह क्षेत्र के रूप में प्रसिद्धि है। वराहपुराण में भी इसकी महिमा का वर्णन है। परन्तु यहां जो वराह शब्द दिया है उसकी दाक्षिणात्य देशों में गणना की है, न कि पश्चिम एवं पूर्व के देशों में। इसलिये यह वराहशब्द दक्षिण दिशा के किसी दूसरे ही वराह नाम से प्रसिद्ध देश के लिये आया प्रतीत होता है। संभवतः यही आज कल बरार है।

आभीर—गुजरात के दक्षिण पूर्व भाग में स्थि नर्मदा नदी के मुहाने का प्रदेश आभीर नाम से कहलाता था। इसी को यूनानी (Abira) कहते थे। महाभारत में (सभा. अ. ३१) समुद्र के पास सोमनाथ से लगे हुए गुजरात देश की सरस्वती नदी के किनारे पर आभीरों का निर्देश मिलता है। किसी-किसी के मत में गुजरात के दक्षिण में स्थित सूरत प्रदेश भी आभीर देश में सम्मिलित था। तारातन्त्र में कोंकण के दक्षिण में तापती नदी के पश्चिम किनारे तक आभीरों का वर्णन मिलता है। ल्यासन महाशय बाइबिल में आये हुए आफीर (Offir) देश को ही आभीर मानते हैं। इलियड के मत में भारत के पश्चिम में तापती से देवगढ़ तक के प्रदेश को आभीर कहा है। बन्क्रिङ महोदय सिन्धु नदी के पूर्व में आभीर देश को मानते हैं। विष्णुपुराण (अ. ५) तथा ब्रह्माण्डपुराण में आभीर देश में सिन्धु नदी का उल्लेख मिलता है। आभीर शब्द के जातिवाचक होने से जिस-जिस प्रदेश में वह जाति रहती थी उस-उस का नाम आभीर हो सकता है। यहां पर कुरुक्षेत्र को मध्य (Centre) मानकर दक्षिण दिशा में वर्णित आभीर देश गुर्जरप्रान्त (गुजरात) में हो सकता है, जहां आजकल भी भीलों का निवास है, बृहत्संहिता में भी दक्षिण नैर्ऋत्य भाग में आभीर देश का निर्देश मिलता है।

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