काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
उल्लेख मिलता है। श्रीयुत पार्जिटर महोदय इन दोनों को भिन्न-भिन्न मानकर पुण्ड्र को गंगा के उत्तर में अङ्ग (पूर्वी बिहार-भागलपुर का जिला) तथा बङ्ग देश के मध्य में, तथा पौण्ड्र को गङ्गा के दक्षिण में वर्तमान सन्थाल परगने के अन्तर्गत वीरभूम प्रदेश कहते हैं।
मृत्तिकावर्धमानक—यह संभवतः वर्धमान प्रदेश है। मार्कण्डेय पुराण तथा वेतालपञ्चविंशति आदि में विन्ध्य के उत्तर में तथा देवीपुराण (अ. ४६) में वङ्ग के समीप वर्धमान देश का उल्लेख किया गया है।
कर्वट—महाभारत के भीमदिग्विजय में पूर्व में कर्वट देश का उल्लेख है। बृहत्संहिता में भी इसका निर्देश मिलता है।
मातङ्ग—युक्तिकल्पतरु नामक ग्रन्थ में कामरूप के दक्षिणपूर्व में मातङ्ग देश का रत्नों की खान के रूप में निर्देश किया गया है।
ताम्रलिप्त—इसका महाभारत (भीष्म. अ. ९, सभा. अ. २९) के भीमदिग्विजय, बृहत्संहिता तथा अन्य भी पुराण, बौद्धग्रन्थ तथा दशकुमारचरित आदि में भी उल्लेख मिलता है। ह्युन्सङ्ग ने भी इसका उल्लेख किया है। अशोक के शिलालेखों में भी इसका निर्देश है। यह बङ्गाल के मेदिनापुर प्रान्त में तमलूक नाम से प्रसिद्ध स्थान प्रतीत होता है।
चीनक¹—चीन देश का उल्लेख महाभारत (सभा. अ. ५१) तथा मनुस्मृति (१०-४४) में भी है। साहित्य परिषत् पत्रिका में चीन शब्द का वर्तमान अनामा (Annama) देश के बोधक के रूप में उल्लेख किया गया है। रेशमी वस्त्रों की प्राचीन काल से चीनांशुक के रूप में प्रसिद्धि रही है। तथा बर्माप्रदेश में रेशमी वस्त्रों का व्यापार भी था, तथा वहां चीन का का राज्य भी था। चीनक इस कप्रत्ययान्त शब्द से लघुचीन के रूप में उस प्रदेश का बोध होता है।
कौशल्य—कोशाल तथा उत्तर कोशाल देश का रामायण (उत्तर अ. १०), पद्मपुराण (उत्तर अ. ६८) तथा अवदान शतक आदि में भी निर्देश मिलता है।
कलिङ्ग—महाभारत (वन. अ. ११३) के सहदेव दिग्विजय, बृहत्संहिता तथा अशोक के शिलालेखों में भी इसका उल्लेख मिलता है। महाभारत के समय उत्कल का बहुत सा हिस्सा कलिङ्ग राज्य के अन्तर्गत था। कालिदास के समय कलिङ्ग तथा उत्कल भिन्न २ थे (रघुवंश सर्ग ४)
दक्षिण दिशा के देश
काञ्ची—महाभारत (भीष्म. अ. ९) पद्मपुराण (उत्तर अ. ७४) में भी इसका उल्लेख है। महाभाष्य में भी चीर, चोल तथा काञ्ची का उल्लेख मिलता है। द्रविड़ चोल देश की राजधानी थी। काञ्ची आजकल भी 'काञ्चीबरम्' नाम से प्रसिद्ध है।
काबीर—यह कावेरी नदी के आसपास का प्रदेश प्रतीत होता है। कावेरी का उल्लेख स्कन्दपुराण में मिलता है। कालिदास ने भी इसका उल्लेख किया है। (रघुवंश सर्ग ४)
चिरिपाली—यह त्रिचिनापल्ली का ही दूसरा नाम प्रतीत होता है। त्रिशिर नामक रावण के सेनापति के नाम से इसका नाम पहले त्रिशिरः पल्ली था। उसीकी समयान्तर से त्रिचिनापल्ली नाम से प्रसिद्धि हो गई है। कालान्तर से इसी के उरगपुर तथा निचुलपुर आदि नाम भी हो गए हैं। प्राचीन काल में यह पाण्ड्य तथा चोलों की राजधानी थी।
१. इस संहिता में 'सचीरकम्' यह पाठ छपा होने पर भी चीर का आगे दक्षिण के देशों में वर्णन होने से पूर्व दिशा में चीन के ही औचित्य होने से तथा प्राचीन लिपि में नकार के स्थान पर रकार पाठ की सम्भावना होने से 'सचीनकम्' पाठ ही उचित प्रतीत होता है।