काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 287, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २७३
भावप्रकाश में पारसीक यवानी (खुरासानी अजवायन) के उल्लेख द्वारा अन्य देशों की वस्तुओं के मिलने पर भी चरक, सुश्रुत तथा काश्यप संहिता आदि प्राचीन ग्रन्थों में इसका उल्लेख नहीं मिलता है। किन्तु केवल यवानी शब्द का ही निर्देश है। यवानी शब्द न तो यवन शब्द से ही बना है और न यह यवन के संबन्ध को प्रकट करता है। 'इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलाचार्याणामानुकू' (पा. सू. ४-१-४९) इस सूत्र में पाणिनि ने यव शब्द से यवानी शब्द बनाया है। वार्त्तिककार कात्यायन ने 'यवाद्दोषे' द्वारा दुष्ट (कुत्सित) यव के अर्थ में स्त्रीलिङ्ग में यवानी शब्द बनाया है। इस प्रकार यह प्राचीन यवानी शब्द भी भारतीय ही है। इससे अन्य शंकाएं नहीं होनी चाहिये।
इस ग्रन्थ में आये हुए देशों का वर्णन
इस पुस्तक के उपलब्ध अन्तिम पृष्ठ पर आये हुए देशसात्म्याध्याय (खिल स्था.) में देश विशेष के अनुसार रोग विशेषों का वर्णन करने के लिये उस समय इस विद्या (आयुर्वेद) की उन्नति की दृष्टि से प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र को मध्य (Center) मानकर उसी के अनुसार पूर्व आदि दिशाओं के देशों का उल्लेख मिलता है। यदि यह अध्याय सम्पूर्ण रूप में मिलता तो उस समय के अन्य भी बहुत से देशों का परिचय मिल सकता था। परन्तु इस अध्याय के यहीं बीच में खण्डितरूप में ही समाप्त हो जाने से भूखे व्यक्ति के मुंह से बलात् आधा ग्रास छीन लिये जाने के समान उत्कण्ठा को बीच में ही रोकना पड़ता है। अन्तिम भाग के लुप्त हो जाने के कारण पश्चिम तथा उत्तर दिशा के देशों का परिचय न मिलने पर भी पूर्व एवं दक्षिण दिशा के कुछ देशों का परिचय मिलता है। पूर्व एवं दक्षिण दिशा के भी सब प्राचीन देशों का उल्लेख नहीं है, अपितु केवल रोगोचित कुछ देशों का ही उल्लेख है। इनमें से प्रियङ्गुनवधान-वानसी-कुमुद-विदेह तथा घट आदि देशों का अन्य उपलब्ध ग्रन्थों में संवाद के न मिलने से निश्चय न हो सकने पर भी इन साथ आये हुए निम्नलिखित देशों के नाम प्राचीन प्रतीत होने के कारण उपर्युक्त सब देशों के नाम भी प्राचीन काल से व्यवहृत किये जाते प्रतीत होते हैं। निम्नलिखित देशों के नामों का प्राचीन परिचय सहित उल्लेख श्रीयुत् कनिङ्घाम नामक विद्वान् (Ancient geography of india), श्री नन्दलाल महोदय (Geographical dictionary) तथा E. J. Rapson (Ancient India cambridge (History of India vol I) आदि प्राचीन भौगोलिक ग्रन्थों में किया है।
मध्य में—कुरुक्षेत्र प्रदेश जो कि १०० योजन के घेरे में था। यह सर्वत्र प्रसिद्ध ही है।
पूर्व दिशा के देश—
कुमारवर्तिनी—महाभारत (सभा. अ. २९) में कुमार देश का उल्लेख मिलता है। यह रीवा के पास का कुमार देश कहलाता है।
कटीवर्ष—बङ्गाल के वर्धमान प्रान्त में आजकल कटवा प्रदेश नाम से प्रसिद्ध है।
मगध—ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में भी मगध देश का उल्लेख मिलने से प्राचीन समय से ही इसकी इसी नाम से प्रसिद्धि मिलती है। मागध का उल्लेख तैत्तिरीय ब्राह्मण (३-४-१-१) तथा जैमिनीय ब्राह्मण (१६५) में भी है।
ऋषभ द्वीप—महाभारत (वनपर्व अ. ८५) में ऋषभ का उल्लेख है। बृहत्संहिता में भी दक्षिण में ऋषभ का निर्देश है। कुछ लोग इसे मदुरा के समीपस्थ ऋषभ पर्वत का प्रदेश मानते हैं। परन्तु पूर्व दिशा में स्थित ऋषभ देश से ही इसका अभिप्राय होना चाहिये।
पौण्ड्रवर्धनक—इसे पुण्ड्रवर्धन भी कहते हैं। यह पुण्ड्र देश की राजधानी थी। हरिवंश, पद्म तथा ब्रह्माण्डपुराण में वासुदेव नामक राजा की राजधानी के रूप में इसका निर्देश है। आजकल यह मालदा प्रान्त में स्थित पाण्डुवा प्रदेश कहलाता है। महाभारत में भीमदिग्विजय में पूर्व दिशा में पुण्ड्र देश का उल्लेख है तथा बराहसंहिता में पौण्ड्रदेश का