भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

हुए हैं जिनमें से तीन ग्रन्थ वैद्यक के है। इनमें से प्रथम नावनीतक है। दूसरे ग्रन्थ में विस्तारपूर्वक लशुन के गुण दिये हैं तथा तीसरा एक ७२ पृष्ठ का ग्रन्थ है जिसमें अनेक ओषधियों के योग दिये हुए हैं। यह पहले ही कहा जा चुका है कि इनकी लिपि के प्राचीन होने से इनका निर्माण काल और प्राचीन होना चाहिये। मुद्रित नावनीतक में भी प्रारम्भ से ही विस्तारपूर्वक काशिराज द्वारा सुश्रुत को लशुन के विधान का उपदेश दिया गया है। उसमें लशुन की उत्पत्ति तथा कुछ प्रयोगों में भेद होने पर भी बहुत अंशों में काश्यपीय लशुन कल्प की छाया मिलती है। भाषा की रचना को देखने पर भी नावनीतक की अपेक्षा काश्यप के लेख में प्राचीनता झलकती है। चरकसंहिता में भी लशुन का प्रयोग दिया है। इस प्रकार प्राचीनकाल के चिकित्साग्रन्थों में भी मिलनेवाले लशुन के उपयोग को देखकर अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न नहीं होनी चाहिये। लशुन के गुणों की अधिकता के कारण 'रसेन ऊनम्' (केवल एक रस की कमी) इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसे 'रसोन' कहते हैं। चिकित्सा में यह विशेष उपयोगी है। धार्मिक दृष्टि से यद्यपि स्मृतिग्रन्थों में इसे ब्राह्मणों (द्विजों) के लिये अवश्य गर्हित माना है किन्तु चिकित्सा के ग्रन्थों में इसकी बहुत महिमा बतलाई है। इस काश्यपसंहिता के कल्पाध्याय में महर्षि कश्यप ने अमृत के उद्गार (डकार) से इसकी उत्पत्ति को बतलाकर केवल स्थान दोष से दुर्गन्धित होने के कारण धर्मशास्त्र की मर्यादा के अनुसार द्विजों द्वारा स्पष्टरूप से अग्राह्य होने पर भी लोकोपकार की दृष्टि से इसकी गुणमहिमा तथा कल्प का वर्णन किया है। जातिविशेष द्वारा निषिद्ध सुरा आदि तथा सबके लिये अभक्ष्य हस्तिमांस तथा गदहे के मूत्र आदि के भी गुणों को दृष्टि में रखते हुए आर्षग्रन्थों में भी भिन्न-भिन्न रोगों में इनका उल्लेख किया गया है। गुणों के वर्णन मात्र से हम यह कभी नहीं कह सकते कि वे उपदेशक बिलकुल धर्मभावना से शून्य थे। तथा इसका यह भी कभी अभिप्राय नहीं है कि धर्मपरायण व्यक्तियों को भी इसका सेवन अवश्य करना चाहिये, क्योंकि कहा भी है—

न शास्त्रमस्तीत्येतावत् प्रयोगे कारणं भवेत् । रसवीर्यविपाका हि श्वमांसस्यापि वैद्यके ।।
(वात्स्यायनीये कामसूत्रे सां. अ. अ. २)

(अर्थात् केवल शास्त्र में वर्णित होने से ही किसी वस्तु का उपयोग करना आवश्यक नहीं क्योंकि वैद्यक में तो कुत्ते के मांस के भी रस, वीर्य, विपाक आदि गुणों का वर्णन मिलता है) यद्यपि श्येनयाग हिंसा की दृष्टि से अनुपादेय है इस दोष को स्वीकार करके भी इस लोक के उत्तम फलों को चाहने वालों की इष्टसिद्धि के लिये 'श्येनेनाभिचरन् यजेत' यह वैदिक विधान मिलता ही है। 'यो हि हिंसितुमिच्छेत् तस्यायमभ्युपायः' द्वारा मीमांसा भाष्य के टीकाकार शवरस्वामी ने भी इसका समर्थन किया है। लशुन का उल्लेख गौतमधर्म सूत्र (१५-३०), मनुस्मृति (५-५-१९), याज्ञवल्क्य स्मृति (१. १७६) तथा महाभारत (८. २०३४, १३. ४३६३) आदि में भी मिलता है।

हिंगु (हींग-Asafoetada) को देखकर भी अर्वाचीनता की शंका उत्पन्न नहीं हो सकती। क्योंकि हींग का अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय ग्रन्थों में उपयोग मिलता है। धार्मिक ग्रन्थों में भी श्राद्ध आदि में हींग का पितृप्रिय (पितरों को प्रिय) के रूप में उल्लेख मिलता है। चरक, सुश्रुत तथा काश्यप संहिता में भी स्थान-स्थान पर ओषधियों के साथ इसका उपयोग मिलता है। काश्यपसंहिता आदि में हींग के लिये बाह्लीक शब्द का भी प्रयोग किया गया है। इसलिये संभवतः बाह्लीक देश (बलख-अफगानिस्तानका प्रदेश) बालों से भारतीयों ने इसका उपयोग एवं परिचय प्राप्त किया हो। इसीलिये उस देश के नाम के अनुसार ही इसका नाम प्रतीत होता है। परन्तु आत्रेय तथा कश्यप आदि द्वारा बाह्लीक भिषक् कांसायन तथा बाह्लीकों के पुनः-पुनः उल्लेख से प्रतीत होता है कि भारत तथा बाह्लीक देश का परस्पर सम्पर्क तथा इन देशों के वैद्यों का परस्पर परिचय अत्यन्त प्राचीन काल से था। बाह्लीकप्रदेश यवनों (यूनानियों) के आक्रमण से पूर्व भी ईरानियन जाति के साम्राज्य में प्रतिष्ठित बलख नामक प्रदेश था। उस इरानजाति की उन्नति के समय उस जाति के वैद्य तथा उनकी ओषधियों का भारत के प्राचीन ग्रन्थों में मिलना संगत ही है।