भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २७१

सूक्ष्म विचार शक्ति से विस्तृत दृष्टिकोण वाले प्राचीन आचार्य जिस-जिस विषय में भी प्रवृत्त होते हैं उस-उस विषय के अन्तस्तल तक प्रवेश करके यथावत् ज्ञान कराते हैं। कौमारभृत्य के विषय में प्रवृत्त हुए आचार्य कश्यप ने अन्य आचार्यों द्वारा सर्वसाधारण विषयों की तरह बालकों (विशेषकर अत्यन्त छोटे बालकों) के सम्बन्ध में अनेक उपयोगी विषयों का संकेत किया है।

वात, पित्त कफ आदि तीनों दोषों का निर्देश वैदिक साहित्य में भी मिलता है। ऋग्वेद में 'त्रिधातु शर्म वहतं शुभस्पती' द्वारा त्रिधातु शब्द का उल्लेख किया है। इस शब्द की सायन ने वात, पित्त, कफ रूप त्रिदोषपरक व्याख्या की है। ब्लूमफील्ड नामक विद्वान् ने भी उसी व्याख्या को स्वीकार किया है। जीमर आदि कुछ विद्वानों ने इसका दूसरा ही अर्थ किया है। किन्तु पी. सी. राय¹ महोदय लिखते हैं कि अथर्ववेद में आये हुए वातगुल्म तथा 'वातीकृता' इत्यादि पदों में दूसरे अर्थ की सङ्गति न होने से तथा सर्वत्र एक ही रूप के औचित्य के कारण यह शब्द त्रिदोषपरक ही होना चाहिये। इसका दूसरा अर्थ करना सङ्गत नहीं है। यह त्रिदोषपद्धति ग्रन्थों में भी आत्रेय, कश्यप तथा सुश्रुत आदि से लेकर आज तक धाराप्रवाह रूप से चली आ रही है। सुश्रुतसंहिता में अनेक स्थानों पर वात, पित्त कफ आदि तीनों दोषों अथवा धातुओं को देहसंभव तथा रोगोत्पत्ति में कारण माना गया है। सुश्रुत में कहीं-कहीं त्रिदोष² के साथ रक्त को भी चतुर्थ कारण माना है। प्राचीन महावग्ग के प्राचीन बौद्ध वैद्यक ग्रन्थ तथा ब्रावर द्वारा उपलब्ध नावनीतक आदि ग्रन्थों में भी त्रिदोषपद्धति का ही अवलम्बन किया प्रतीत होता है। महावग्ग तथा विनयपिटक में जीवक की चिकित्सापद्धति में भी यही त्रिदोषप्रक्रिया मिलती है। कात्यायन के वार्तिक में भी वात, पित्त तथा कफ का व्यवहार दिखाई देता है। ४६० वर्ष ईस्वी पूर्व प्राचीन हिपोक्रिटस नामक पाश्चात्त्य चिकित्सक के जन्म से पहले भी भारत में त्रिदोषपद्धति विद्यमान थी। उसके चिकित्सा विज्ञान में पित्त, कफ, रक्त तथा जल आदि चारों को जो दोष के रूप में दिया है, वह भी उसका हृदय भारतीय प्राचीन त्रिदोषपद्धति से अनुरक्त होने के कारण सुश्रुत के विचारों की विकसित अवस्था प्रतीत होती है।

प्राचीन विज्ञान में अग्नि³ तथा सोम अथवा उष्ण⁴ और शीत ये दो मौलिक तत्त्व माने गये हैं जो कि स्पष्टरूप से सब पदार्थों में ओतप्रोत हैं। जिससे वैदिक यज्ञप्रक्रिया में प्रारम्भ से ही अग्नि तथा सोम की उपासना की परिपाटी चली आ रही है। शारीरिक परिस्थिति में भी शीत तथा उष्ण के प्रतिनिधि सोम तथा अग्निरूप शुक्र तथा शोणित को शरीर की उत्पत्ति का कारण माना है इसीलिये सुश्रुत में गर्भ को 'अग्नीषोमीय' कहा है। प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने वात के योगवाही होने से पित्त अथवा कफ के साथ मिल जाने पर भी अर्थ तथा क्रिया की विकसित दृष्टि के कारण सत्त्व, रज तथा तम की तरह अग्नि, वायु तथा सोमरूप वात, पित्त, कफ तीनों धातु देह की धारक तथा विकृत होने पर दोषरूप होकर रोगों के कारण के रूप में मानी है, इसी सिद्धान्त के अनुसार स्थापित त्रिदोष-पद्धति को ही कश्यप आत्रेय तथा भेड आदि प्राचीन आचार्यों ने ग्रहण किया था। ज्यों-ज्यों क्रमशः विचारों में प्रगति आती है त्यों-त्यों नये-नये सिद्धान्त उदित होते जाते हैं। इसीलिये सुश्रुत ने पहले वात, पित्त, कफ इन तीन दोषों को ही प्रधानरूप से रोगों का कारण बतलाकर भी पुनः विकृत रक्त के द्वारा भी बहुत से अनर्थों (रोगों) को देखकर तीनों दोषों के समान चतुर्थ रक्त को भी प्रधान कारण स्वीकार किया है। हिपोक्रिटस के चिकित्सा विधान में भी पित्त, कफ, रक्त तथा जल इन चारों को जो दोषरूप में माना है, वह भी उसका हृदय भारतीय प्राचीन त्रिदोषपद्धति से अनुरक्त होने के कारण सुश्रुत के विचारों की विकसित अवस्था प्रतीत होती है। इस प्रकार ये विकसित हुए विचार कालक्रम से प्राचीन पद्धति के ही परिष्कृत रूप प्रतीत होते हैं।

काश्यपसंहिता के कल्पस्थान (पृ. १७४) में में अद्भुत एवं विस्तृत लशुन कल्प का प्रयोग किया हुआ है। चीन देश के कासगर नामक स्थान में बावर नामक पाश्चात्त्य अन्वेषक को भूगर्भ से बौद्ध स्तूप के साथ सात ग्रन्थ उपलब्ध


१. १-४ की टि. उपो. संस्कृत पृ. ९४-९५ देखें।