काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
रोगों में अन्य उपद्रवों के उत्पन्न हो जाने पर पूर्व रोग या उपद्रव की पृथक्-पृथक् चिकित्सा के सिद्धान्त को न मानकर दोनों की साथ-साथ चिकित्सा के विषय में अपनी सम्मति दी है। (पृ. ३९)।
प्रसव के विलम्ब होने में (Delayed delivery) अन्य आचार्यों के व्यायाम तथा मुसल आदि के द्वारा आघात करने के पक्ष का युक्तिपूर्वक खण्डन किया गया है (पृ. ८५)।
अत्यन्त छोटे बालकों में अश्मरी के उद्धरण तथा तीक्ष्ण ओषधियों के प्रयोग का विशेष रूप से निषेध किया गया है (पृ. १२२)।
बालकों में बस्तिकर्म के अच्छी प्रकार प्रयुक्त किये जाने पर वैद्य बालक तथा उसके पिता आदि सबके लिये वह श्रेयस्कर है तथा ठीक प्रकार से प्रयुक्त न की जाने पर अनर्थ करती है, इस लिये बालकों में किस समय से लेकर बस्तिकर्म करना चाहिये, इस विषय में अनेक आचार्यों तथा अपने मत को देकर विशेष विचार किया गया है (पृ. १४७)।
बालकों के फक्कारोग में तीन पहियों के रथ के निर्माण का उल्लेख मिलता है (पृ. १४१)
एकनाभिकयोः कस्मात् तुल्यं मरणजीवितम् । रोगारोग्यं सुखं दुःखं न तु तृप्तिः समानजा ।।
(पृ. १९४)
इत्यादि वाक्यों द्वारा यमल (जुडवां बालक-Twins) के विषय में विचित्र प्रश्न तथा युक्तिपूर्वक उत्तर दिया है विषमज्वर के निर्देश में तृतीयक, चातुर्थिक आदि ज्वरों के उस-उस दिन होने के कारणों का वर्णन किया है (पृ. २२९)।
अन्य सब आचार्यों द्वारा बालकों के छठे मास में अन्नप्राशन का विधान देने पर भी इस संहिता के आचार्य ने उस संस्कार का निर्देश करके छठे मास में केवल फलों के सेवन तथा १२ मास के बाद अन्न चाहने पर थोड़ा-थोड़ा अन्न देने का विधान दिया होने से, क्षीण अग्निबल वाले अत्यन्त छोटे बालक को मृदु पाकवाले फलों के रस तथा एक वर्ष के बाद अन्न का उपयोग लिखा है। आधुनिक पाश्चात्य विद्वान् भी इसी प्रकार अत्यन्त छोटे बालकों को फलों का उपयोग कराते हैं तथा १२ मास के बाद ही वे अन्न के उपयोग के पक्ष में हैं (खि. स्था. अ. १३)।
वेदनाध्याय में वाणी के द्वारा अपनी वेदना को प्रकट करने में असमर्थ बालकों की भिन्न-भिन्न चेष्टाओं के द्वारा अमुक-अमुक रोग तथा अमुक-अमुक अङ्गों की वेदनाओं के आनुमानिक ज्ञान का वर्णन मिलता है (पृ. ३३)।
आप्ततश्रोपदेशेन प्रत्यक्षकरणेन च । अनुमानेन च व्याधीन् सम्यग् विद्याद्विचक्षणः ।।
चरकसंहिता विमान स्थान के चतुर्थ अध्याय के उपर्युक्त श्लोक द्वारा निदान, पूर्वरूप तथा रूप (लक्षण) आदियों को जानने के लिये प्रत्यक्ष आदि उपाय दिये हैं। सुश्रुत ने भी दर्शन, स्पर्शन तथा प्रश्न आदि उपायों का उल्लेख किया है। इस प्रकार प्राचीन सम्प्रदाय में दर्शन, स्पर्शन तथा प्रश्न आदियों के द्वारा निदान आदि पञ्चरूपों की विवेचना करके रोगज्ञान का निर्देश किया है। नाडीविज्ञान का उल्लेख चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन ग्रन्थों तथा इस काश्यपसंहिता में भी नहीं मिलता है। नाडीपरीक्षा का उल्लेख अर्वाचीन ग्रन्थों में ही मिलने से यह विषय पीछे से प्रचलित हुआ प्रतीत होता है। नाडीविज्ञान के भारत से चीन में जाने के कारण यह विज्ञान भारतीय ही प्रतीत होता है। यह विज्ञान भारत में ही आविर्भूत हुआ है अथवा किसी दूसरे देश से यहां आकर प्रचलित हुआ है, यह विषयान्तर होने से इसके विषय में हम अधिक विचार नहीं करेंगे। अस्तु, प्राचीन ग्रन्थों में इस विषय के न मिलने से इसे प्राचीन कहना कठिन है। अत्यन्त छोटे बालकों में अपने कष्ट को दूसरों को यथावत् समझाने के लिये वाक्शक्ति के उदय न होने से उसकी भिन्न-भिन्न चेष्टाओं से रोगों को पहचानने की प्रक्रिया इस काश्यपसंहिता के वेदनाध्याय (पृ. ३३) में तथा अन्यत्र भी स्थान-स्थान पर मिलती है।