काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 299, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
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| करुणसारि | (कालानुसारी) | मेत | (मेदा) |
|---|---|---|---|
| पितरी | (विदारी) | खादिर | (खदिर) |
| सूक्ष्मेल | (सूक्ष्मेला) | मोतर्ते | (अजमोद) |
| प्रियङ्कु | (प्रियङ्गु) | कोरोशा | (गोरोचन) |
| विरङ्ग | (विडङ्ग) | पिस्सौ | (विश्वा) |
| उपद्रव | (उपद्रव) | सुमां | (सोम) |
इस प्रकार अनिश्चित पूर्व समय से इतनी दूर विद्यमान प्राचीन कूच जाति का आर्यजाति के रूप में स्पष्टरूप से उल्लेख होने से तथा उसी के अनुसार बाद में वहां पहुंचे हुए भारतीयों का उनके द्वारा आत्मीय के रूप में सन्मान का उल्लेख होने से कूच जाति भारतीय आर्यजाति सिद्ध होती है। इस प्रकार भारतीय आर्य जाति के रूप में निश्चित हुई कूच जाति की भाषा में भारतीय ओषधिवाचक शब्दों के विकृत एवं अविकृत रूप में मिलने से यह कहा जा सकता है कि या तो भारतीय जाति के उस देश में जाने के साथ ही ये शब्द भी वहां पहुंचे होंगे अथवा समयान्तर से ये शब्द वहां पहुँचे होंगे। दोनों ही अवस्थाओं में भारतीय आयुर्वेद का इतने दूर तथा इतने प्राचीन काल में प्रचार होना उसकी प्राचीनता को सिद्ध करता है।
इरान देश के निवासी पारसियों के अवेस्ता नामक मूलग्रन्थ का अथर्ववेद से तथा उसकी भाषा का देववाणी (संस्कृत) से विशेष सादृश्य दिखाई देता है। उनके उपास्य देवता अहुर का भारतीयों द्वारा परिचित असुर से उच्चारण मात्र का अन्तर है। अग्नि की उपासना, गौपूजन, सूर्योपासना, होमप्राधान्य मित्र आदि देवताओं सम्बन्धी अनेक विषयों में भारतीय झलक मिलती है। इतिहासकार भी लिखते हैं कि इरान जाति भारतीय जाति से ही विभक्त हुई है। इरान देश में एकमेनियन्स (Achaemenians) राजा के कुल में तथा प्रथम डेरियस (Darius ई. पू. ५२१) नामक राजा के समय में डेमोकेडियस् (Demokedes) नामक तथा कुछ समय बाद स्टेस्यिस (Ctesias) तथा अपोलोनीड्स् (Apollonides) नामक ग्रीक वैद्य थे। इरान तथा ग्रीस देश की चिकित्सा के विषय में परस्पर विचार करने पर इरान देश की चिकित्सा में ग्रीस देश की चिकित्सा का प्रभाव था, इस¹ विषयक उल्लेख भी मिलता है। इरान देश में एसेनियन् राजा के राजवंश में ग्रीक वैद्यों की तरह भारतीय वैद्य भी थे। स्पीगल² नामक विद्वान् ने लिखा है कि उस देश के तथा दूसरे देश के वैद्यों (चिकित्सकों) में परस्पर प्रतिस्पर्धा भी थी। इस प्रकार इरान देश की चिकित्सा के जिन-जिन अंशों में असाधारण ग्रीक विषय मिलते हैं, उस-उस अंश में ग्रीक-चिकित्सा का प्रभाव माना जा सकता है तथापि वैद्यक के विषय में वहां जो-जो भारतीय आयुर्वेद के रोग तथा शारीर सम्बन्धी विचार समानरूप से मिलते हैं अथवा ग्रीक आदि साधारण भी भारतीय विचार वहां मिलते हैं उनमें भारतीय चिकित्सा तथा भारतीय वैद्यों का ही प्रभाव समझना चाहिये। श्रीयुत कीथ (A. B. Keith) महाशय ने ग्रीस वैद्यक में भारतीय आयुर्वेद विषयों की जो समानता दिखाई देती है वहां भी साक्षात् अथवा परम्परा से (Direct or Indirect) भारतीय प्रभाव ही है जिसका आगे निरूपण किया जायगा। इरान तथा भारत देश में वैसे भी परस्पर समीपता है। उसी इरान देश के राजा प्रथम डेरियस की सहायता के रूप में ईस्वी पूर्व ४७९ समय में भारतीय सेना का ग्रीस के सैनिकों के साथ युद्ध³ का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार इरान तथा
१. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १०७ में देखें।
२. स्पीगल कहता है कि यह स्वाभाविक है कि अधिक आबादी वाले नगरों में विदेशी चिकित्सकों को देशी चिकित्सकों के साथ प्रायः प्रतिस्पर्धा रहती थी। ससेनियनों के समय भी ग्रीक वैद्य राजकुल में मिलते हैं तथा स्पीगल की सम्मति में भारतीय वैद्य भी वहां अवश्य थे। (Eran Alterth) E. R. E. Vol 4 P. 759.
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १०७ में देखें।