भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२८४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

चीन राज्य ईस्वी पूर्व २०० वर्ष सामयिक होने से किसी-किसी व्यक्ति का मत है कि कौटिल्य अर्थशास्त्र में चीन का उल्लेख होने से कौटिल्य शास्त्र प्राचीन नहीं है परन्तु उसके विपरीत अवेस्ताग्रन्थ में निर्दिष्ट पांच जातियों में चीन का भी उल्लेख होने से चीन देश प्राचीन ही है। जयचन्द्र¹ विद्यालंकार ने लिखा है कि श्री मोदी के अनुसार चीन नाम का माण्डलिक राज्य ईस्वी पूर्व ९०० शताब्दी में था।

तुर्फान देश के दक्षिण में काराशर नामक स्थान में प्राचीन समय में कुछ प्राचीन कूच जातियां रहती थीं। ईस्वी सन् के प्रारंभ से पूर्व कब उनका वहां आगमन हुआ, इस विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं होता है। सब लोग उस कूच जाति को आर्यों की शाखा मानते हैं। बाद में २-३ शताब्दी में व्यापारियों के साथ बौद्ध-धर्म प्रचार के लिये आये हुए भारतीय भिक्षुओं को देखकर उन्होंने अपने पूर्वदेश के भारतीय होने के नाते उनका बहुत सम्मान किया—ऐसा उनका ²इतिवृत्त मिलता है।

इस जाति तथा उस देश के विषय में चीनी भाषा में लिखित प्राचीन इतिहास में लिखा है कि द्वितीय शताब्दी में मध्य एशिया के आसपास के प्रदेशों को विजय करने की इच्छा से जब चीन राज्य ने उसपर आक्रमण करने की इच्छा की, उस समय उस प्रदेश में बलवान् कूचजाति रहती थी। उसको विजय न कर सकने पर दोनों देशों में परस्पर मैत्री संबन्ध स्थापित हो गया, ईस्वी सन् के प्रारंभ के बाद २१६-३१६ समय में वहां बौद्धधर्म पूर्णरूप से प्रचलित था। कुमारजीव नामक बौद्धभिक्षुक वहीं रहता था। अन्य भी बहुत से बौद्धभिक्षुक वहां पहुंचे थे। बहुत से बौद्धस्तूप तथा मन्दिर भी वहां बनाये गये थे। वे अभी तक भी भूगर्भ से उपलब्ध होते हैं। भारतीय व्यापारी तथा बौद्धधर्म प्रचारक इसी मार्ग से चीन देश में आते जाते थे। ईस्वी सन् के प्रारंभ से पहले ही दक्षिण देश वालों के लिये चीन में यही व्यापारिक मार्ग था। ह्युन्सङ्ग नामक चीनी यात्री भी इसी मार्ग से ही भारत में आया था। इस प्रकार इसके चीन तथा भारत से प्राचीन संबन्ध का वर्णन मिलता है। यदि इसकी खुदाई की जाय तो अब भी वहां प्राचीन भारत से संबन्ध रखने वाले बहुत से चिह्न मिलने की आशा है। वहां ब्रह्मदेश की लिपि में लिखे हुए बहुत से प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ तथा भारतीय संस्कृत भाषा से कूचभाषा में अनूदित काष्ठपट्टिकाओं पर खुदे हुए तथा लिखे हुए अनुवाद ग्रन्थ भी मिले हैं। स्टाइन³ नामक विद्वान् ने लिखा है कि वहां भूगर्भ से अन्य भी बहुत सी प्राचीन वस्तुएं उपलब्ध हुई हैं।

भाषा विज्ञान के पण्डित ए. सी. उलनर ने उस कूच भाषा की संस्कृत के साथ तुलना करते हुए कुछ भारतीय आयुर्वेदिक ओषधिवाचक संस्कृत शब्द वहां से ढूंढकर दिये हैं जो कुछ तो अविकृत (मूल) अवस्था में हैं तथा कुछ में उच्चारण अथवा थोड़े बहुत स्वरूप का भेद है। वे शब्द निम्न हैं जो कि रायल एशियाटिक सोसाइटी पत्रिका⁴ में प्रकाशित हुए हैं—

कूच भाषासंस्कृतकूच भाषासंस्कृत
माञ्च्छ(मञ्जिष्ठा)शालवर्णी(शालपर्णी)
करञ्जपीज(करञ्जबीज)किरोत(गिलोय)
अपमार्क(अपामार्ग)कुन्तर्क(गुन्द्रक)
सारिप(शारिवा)चिपक(जीवक)
मग्गी(मार्गी)शंश्षपो(शिंशपा)
किञ्चेलं(किञ्चल्क)पिप्पाल(पिप्पली)
तकरु(तगर)अश्वकान्ता(अश्वगन्धा)
पङ्करच(भृङ्गराज)तेचवती(तोजोवती)

१. १-४ की टि. सं. उपो. पृ. १०५-१०६ का. १-२ देखें।