भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

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है। वहां भी असीरिया देश की तरह भूत, प्रेत तथा देवताओं के प्रकोप से रोगोत्पत्ति मानी जाती थी। $^{१}$(George faucart) नामक विद्वान् लिखता है कि उनके चिकित्साग्रन्थ मन्त्र-बाहुल्य थे तथा धार्मिक पुरोहित ही चिकित्सक भी थे। $^{२}$(Cf. Berthelot) भी लिखता है कि प्राचीन मिश्रदेश में भी अथर्ववेद के अनुरूप ही मन्त्र-तन्त्र सहित चिकित्साविज्ञान तथा रसायनशास्त्र का व्यवहार होता था। $^{३}$श्री सुरेन्द्रनाथ दास गुप्त ने भी लिखा है कि प्राचीन मिश्र देश में तैल, घृत तथा वानस्पतिक ओषधियों का भी व्यवहार मिलता है।

रोम देश की प्राचीन इट्रस्कन (Etruscan) जाति तथा ग्रीस देश की प्राचीन जाति के प्राचीन इतिहास में भी रोगनिवारण के लिये देवताओं की उपासना, प्रार्थना तथा बलि आदि मान्त्रिक उपचार मिलते हैं।

केल्टिक जाति के भी वैद्यक तथा धर्म का परस्पर घनिष्ठ संबन्ध था। उस जाति के ड्रुइड नामक धर्मगुरु ही चिकित्सक थे। (T. barns)$^{४}$ लिखता है कि अथर्ववेद की पद्धति के समान उनमें भी मान्त्रिक तथा औषधसंबन्धी दोनों चिकित्साएं प्रचलित थीं।

यूरोपीय ट्यूटन (Teuton) जाति की प्राचीन चिकित्सा में मर्सबर्ग (Mersseburg) के मान्त्रिक प्रयोगों (Charms) के साथ कुछ भारतीय वैदिक मन्त्रों का सादृश्य है। कृमिरोग तथा अस्थिभग्न चिकित्सा में तो यह सादृश्य बिलकुल स्पष्ट दिखाई देता है—ऐसा एडालबार्ट$^{५}$ कून् (Adalbart Kuhn) भी लिखता है।

K. Sudhoff तथा J. Jolly$^{६}$ नामक विद्वान् भी लिखते है कि इस जाति में प्राचीन काल में भूत, देवप्रकोप तथा पापों को रोगों का कारण, दैवप्रकोप से उत्पन्न व्याधि में पशुबलि द्वारा प्रतीकार, रोग परिहार के लिये वृक्षों की त्वचाओं पर मन्त्र लिख कर हाथ में धारण करना, मन्त्रपाठ, यन्त्रधारण, देवमूर्तियों को स्नान और जलपान कराना तथा धूप आदि के द्वारा भूतादियों को दूर करना इत्यादि विधियां मिलती हैं। इसका अनुसन्धान करने पर इनमें भी आथर्वण तथा भारतीय आयुर्वेद प्रक्रिया का सादृश्य मिलता है। लिथुनिया आदि जातियों के शब्द विशेष, आचार व्यवहार तथा चिकित्सासंबन्धी विषयों में भारतीय छाया मिलती है। जौली (J. Jolly)$^{७}$ ने यह भी लिखा है कि उत्तरी अमेरिका की रेड इन्डियन च्यारोकी (Cherokees) जाति की प्राचीन मान्त्रिक चिकित्सा में भी अथर्ववेद के मन्त्रों की बहुत समानता मिलती है।

चीन देश के साढ़े चार हजार वर्ष प्राचीन ग्रन्थ में ज्वर के दस हजार भेदों तथा आमाशय के १४ विभागों का निर्देश किया है। नाडी परीक्षा का उसमें विशेष विधान दिया है। ईस्वी पूर्व ४०० वर्ष से लेकर प्रतिवर्ष नये उत्पन्न होने वाले रोगों का उसमें एक निघण्टुपुत्र (Index) दिया हुआ है। चीन देश के चिकित्सा ग्रन्थों में आर्द्रक, दाडिममूल, वत्सनाभ (Aconite), गन्धक, पारद, अनेक प्रकार के प्राणियों के मलमूत्र तथा असंख्य वृक्षों के पत्र एवं मूल आदियों का औषधरूप में उल्लेख किया है। चीन देश में आजकल भी वृक्षों के पत्रमूल आदि अनेक द्रव्य औषध रूप में बिकते हैं। चेचक के टीके (Vaccination) का ज्ञान भी वहां प्राचीन काल में था। $^{८}$श्री सुरेन्द्रनाथ दास ने लिखा है कि चिकित्सा शास्त्र के इतिहास (History of Medicine) के रचयिता ग्यारिसन् के अनुसार चीन देश वालों ने चिकित्सा विज्ञान भारत से ही प्राप्त किया था।


१. १ एवं ५ तक की टि. सं. उपो. पृ. १०४-१०५ में देखें।
६. व्रण तथा अस्थिभग्न की चिकित्सा मन्त्रों के द्वारा की जाती थी जिसकी A. Kuhn ने जर्मनी के प्राचीन मर्सबर्ग मान्त्रिक प्रयोगों के साथ तुलना की है। (J. Jolly. E. R. E. Vol 4 P. 754)।
७. अथर्ववेद के मान्त्रिक प्रयोगों की च्यारो जाति के पवित्र विधान तथा उत्तरी अमेरिका के रेड इन्डियन में प्रचलित अन्य मान्त्रिक प्रयोगों के साथ पूर्णरूप से तुलना हो सकती है। (E. R. E. Vol 4 P. 754 by J. Jolly)
८. १ की टि. सं. उपो. पृ. १०५ में देखें।