भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२८२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

मन्त्रों का प्रयोग तथा रोगों को दूर करने के लिये ओषधियों का प्रयोग भी मिलता है। इसके बाद धीरे-धीरे मन्त्रों द्वारा उपचार की प्रथा कम होकर ओषधियों द्वारा उपचार की प्रथा बढ़ती गई। आजकल भी कुछ अंश में ग्रन्थों तथा व्यवहार में भी मान्त्रिक विद्या का उपचार के रूप में प्रयोग मिलता है।

असीरिया तथा बेबिलोनिया देश में भी प्राचीन काल में भारतीयों के आथर्वण तथा तान्त्रिक प्रयोगों के समान ही उपाय प्रयुक्त किये जाते हुए दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिये, अपवित्र पुरुष के सहवास, सम्पर्क, संभाषण एवं उच्छिष्ट भोजन आदि तथा भूत, प्रेत और पिशाच आदियों से रोगों का होना, विकराल एवं भयंकर मूर्तियों की कल्पना, रोगों को दूर करने के लिये मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित जल का पीना तथा औषध का सेवन करना, ताबीज का बांधना, पिष्टि तथा धूलि (Powder) से रोगियों को ढकना, विशेष-विशेष वृक्षों के पत्तों द्वारा रोगियों को हवा करना, रोगों को उत्पन्न करने वाले दुष्ट देवताओं के लिये बकरे तथा सूअर आदि की बलि देना, तान्त्रिक पद्धति के समान विरोधी व्यक्ति के केश, नख तथा पांवो की धूलि की अभिमन्त्रित करके प्रतीकार करना, ऋग्वेद में मिलने वाले मार्दूक देवता के समान ही मर्दूक नाम वाले देवता की उपासना द्वारा रोगों का परिहार इत्यादि। भोजन से पूर्व प्रातःकाल ओषधि का सेवन, विरेचन की महिमा, तैल के द्वारा विरेचन, उदर रोग में पहाड़ी नमक तथा लशुन का उपयोग, प्रमेह रोग में मूत्र की परीक्षा, दांतों के रोगों में कृमियों का कारण होना—इत्यादि और भी आयुर्वेद के अनुरूप अनेक विचार एवं प्रयोग उनके यहां मिलते हैं। जिस प्रकार आथर्वण सम्प्रदाय में शान्ति, पुष्टि आदि के प्रयोग करने वाले धार्मिक आचार्य ही मान्त्रिक प्रक्रिया एवं औषधों के प्रयोग से रोगों को दूर करते थे उन्हें अथर्वा कहते थे। उसी प्रकार मिश्र आदि देशों के प्राचीन इतिहास में भी मिलता है कि जो धर्मगुरु होते थे वे ही चिकित्सक भी होते थे, उन्हें (Priest Doctor) कहते थे, इसीलिये उनके देवालय (मन्दिर) ही चिकित्सालय होते थे। इन स्थानों में ओषधियों के उल्लेख संबन्धी प्राचीन लेख भी मिलते हैं।

हैरोडोटस् नामक विद्वान् लिखता है कि बैबिलोनिया देश में चिकित्सा के लिये रोगियों को बाजार तथा जनसमुदाय में रखने के वृत्तान्तों के मिलने से प्रतीत होता है कि उस समय वहां चिकित्साविज्ञान की विशेष उन्नति नहीं थी परन्तु इसके प्रतिवाद रूप में¹ क्याम्बल थोम्सन नामक विद्वान् ईस्वी पूर्व ७०० समय के अर्डनना (Arda-nana) नामक वैद्य का उपलब्ध हुआ परिचय पत्र उपस्थिति करके कहते है कि बेबिलोनिया देश के निवासियों का चिकित्साविज्ञान कम नहीं था तथा बतलाता है कि हेम्बूर्वन (Hemmurabri) राजा के समय ऐसा राजनियम था कि विपरीत शल्यचिकित्सा करने वाले शल्यचिकित्सक (Surgeous) दण्ड के भागी होते थे। उसी के द्वारा नेत्रचिकित्सा में ७-८ दिन में आराम हो जाने, नासिकाव्रण में बहिः उपचार के द्वारा होने वाले रुधिर स्राव में आन्तरित ओषधियों द्वारा उपचार इत्यादि अनेक सफलताओं का उल्लेख मिलने से ज्ञात होता है कि उस देश में प्राचीन काल से ही चिकित्साविज्ञान उन्नत अवस्था में था।

असीरिया देश में प्राचीन काल में भी शस्त्रचिकित्सा विशेषरूप से प्रचलित थी ऐसा² Herbert Loewe ने लिखा है।

मिश्र देश के प्राचीन पेपर्याख्य त्वक्पत्र में १५० तथा एबर्स (Ebers) नामक त्वक्पत्र में ज्वर, उदर रोग, जलोदर, दन्तशोथ, आदि १७० प्रकार के रोगों का वर्णन मिलता है। उस देश के बारहवें वंश के समय लिखी हुई एक पुस्तक में किसी स्त्री के रजोविकार एवं अर्बुद आदि रोगों तथा आजकल मिलने वाले नेत्ररोगों के भेद दिये हुए हैं। उसी में सूक्ष्म रोगों की भी गणना की होने से रोगों की उपेक्षा नहीं कही जा सकती अपितु रोगों के विषय में वहां के विद्वानों का ज्ञान बहुत उन्नत था ऐसा प्रतीत होता है। हैरोडोटस् नामक विद्वान् भी नील नदी के आसपास के प्रदेश को स्वास्थ्यप्रद बतलाता


१. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. १०४ देखें।