काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
भारतीयों का प्राचीन काल में दूर-दूर देशों में पहुंचने तथा उनसे परिचय का वर्णन मिलता है। वैदिक काल में भी भुज्यु आदि का अन्य द्वीपों में जाने का वृत्तान्त मिलता है। प्राचीन इतिहास का अनुसन्धान करने पर ययाति राजा के अनुद्रुह्य तथा तुर्वसु आदि पुत्रों को आज्ञा न मानने के कारण पिता द्वारा अन्य देशों में निकाल देना, पाण्डवों द्वारा दूर-दूर देशों की विजय, महाभारत की लड़ाई में दूर-दूर देश के राजाओं का एकत्रित होना, भारतीय राजाओं का गान्धार आदि पश्चिम प्रान्तों के साथ वैवाहिक संबन्ध, पुराण में नील नदी के नाम का उल्लेख, पाश्चात्त्य देश के प्राचीन इतिहास तथा मुद्रा आदियों में भी समान नामोंवाले कुछ राजाओं के नामों का महाभारत तथा हरिवंश पुराण में मिलना, तथा मनुसंहिता में भी अन्यदेशीय जाति के मूलस्रोत का वर्णन इत्यादि द्वारा प्राचीन भारत का अन्यदेशों के साथ संबन्ध प्रकट होता है। बाद में भी (ई. पू. २१७) (Tsin Shih Huanungti) नामक राजा के राज्य में भारत से १८ भिक्षुओं का चीनदेश में जाने का वर्णन तथा ईसवी पूर्व २०० में Changkin नामक चीनी व्यक्ति के भारत में आने के वृत्तान्त का श्रीयुत¹ कालिदास नाग ने उल्लेख किया है।
प्राचीन समय के यातायात के विषय में अनेक विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं। अस्तु, इसका स्पष्टीकरण तो समय ही करेगा। तथापि यह निश्चित है कि प्राचीन भारतीय आर्यों तथा प्राचीन पाश्चात्य जातियों की सभ्यताओं में अत्यन्त प्राचीन काल में भी परस्पर घनिष्ठ संबन्ध अवश्य था। इस सभ्यता के संबन्ध को छोड़कर अब हम अपने प्रकृत विषय (वैद्यक) पर आते हैं।
संसार में जितने भी प्राचीन चिकित्सा साहित्य हैं उनमें ऋग्वेद के बाद का अथर्ववेद में आया हुआ वैद्यक साहित्य सबसे प्राचीन माना जाता है। भारतीय चिकित्साविज्ञान का उत्पत्तिस्थान होने के कारण अथर्ववेद वैज्ञानिकों की दृष्टि में भी अमूल्य ग्रन्थ है²।
अथर्ववेद में आये हुए रोगों की मन्त्र तथा ओषधि दोनों द्वारा चिकित्सा का विधान दिया हुआ है। इसी को दृष्टि में रखते हुए ही कौशिकसूत्रकार ने भी कहीं-कहीं रोगों में केवल मन्त्रों का उपयोग तथा जल का प्रयोग किया है। तथा किन्हीं-किन्हीं रोगों में मन्त्रों के साथ-साथ ओषधियों का उपयोग भी किया है। रोगोत्पत्ति के कारणभूत दुष्ट देवता तथा ग्रहस्कन्द आदियों का भी मन्त्रों में वर्णन मिलता है। अथर्ववेदीय चिकित्सा में उन ग्रह आदियों को दूर करने के लिये
काल में उपासना की जाने वाली स्त्रीदेवता की ही मूर्ति प्रतीत होती है। शक्ति की उपासना करने वाला सम्प्रदाय भी भारत में प्राचीन काल से चला आ रहा है। महाभारत, रामायण तथा पुराण आदियों में भी दुर्गा आदि देवियों की उपासना का इतिहास मिलता है। वेदों की तरह प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध तन्त्र आदि अनेक शास्त्रों में भी शक्ति की महिमा उसकी उपासना तथा उसके उपासक महर्षियों का वर्णन मिलता है। पूर्व तथा पश्चिम में प्राकार की तरह फैले हुए हिमालय में उत्तर तथा दक्षिण भाग में जाने के साधनों के लिये घाटियों के द्वारा रूप में विद्यमान उद्यान (स्वात नदी का प्रदेश), जालन्धर, पूर्णगिरि तथा कामरूप देश में चार शक्ति (देवी) के महापीठ हैं। इसके अतिरिक्त अन्य भी सैंकड़ों पीठ तथा उपपीठ भारत में प्राचीन काल से हैं। शक्ति के भेदरूप काली आदि की उत्पत्ति तथा उनके चरित्र के इतिहास भी भारतीय ही हैं। जो लोग शक्ति की उवासना के सम्प्रदाय को दो हजार वर्ष से अर्वाचीन बतलाते हैं उनके प्रतिवाद के लिये महेञ्जोदारो में उपलब्ध इस प्रकार की प्राचीन मूर्तियां भी पर्याप्त हैं। इस प्रकार उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में सेतुबन्ध रामेश्वर तक व्याप्त हुआ भारत में उत्पन्न शक्ति की उपासना का सम्प्रदाय अपने गुणों के कारण शाखाओं तथा उपशाखाओं द्वारा अन्य देशों में भी फैल गया है। इसलिये स्थान-स्थान पर मिलने वाली स्त्री देवताओं की मूर्तियों का भिन्न-भिन्न नामों द्वारा व्यवहार होने पर भी वे भारतीय सभ्यता के प्रभाव को फैलाती हुई प्रतीत होती है।
१. १-२ की टि. उपो. संस्कृत पृ. १०३ देखें।